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Friday, January 1, 2010

सौन्दर्य निखार के नुसखें


  • चेहरे पर बादाम के तेल की मालिश करने से इसके रोमकूप खुलते है।

  • चेहरे पर गुलाबी पन लाने के लिए नहाने से पहले कच्‍चे दूध मे निंबू का रस व नमक मिला कर मलें।

  • शहद मे ज़रा-सी हलदी मिला कर चेहरे पर लगाएं इससे चेहरे की मैल निकलने से चेहरा साफ व ताज़गी भरा बना रहेगा।

  • केले को मैश करके उस मे एक चम्‍मच दूध मिलाएं। इसे चेहरे पर लगा कर ठंडे पानी से छिंटे मारें। ऐसा १०-१५ मिनट करने के पश्‍चात चेहरे को थपथपा कर सुखा लें झुर्रियां दुर होंगी।

  • एक चमच सौफ को पानी मे अच्छी तरह उबालें। जब पाने गाढा हो जाए तो उतनी मात्रा मे ही शहद मिला लें इसे चेहरे पर लगाने के १० मिनट बाद चेहरा धो लें। झुर्रियां दुर होकर चेहरे पर चमक आएगी।

  • शहद को त्वचा पर मलने से नमी नष्ट नही होती । तरबूजे के गूदे को चेहरे व गर्दन पर मलें । थोडी देर बाद इसे ठंडे पानी से धो लें । नियमित करने से चेहरे के दाग दूर होते हैं

  • तुलसी के पत्तों का रस निकाल कर उसमे बराबर मात्रा मे नीबूं का रस मिला कर लगाएं । चेहरे की झांईयां दूर होती है

  • चेहरे, गले व बांहों की त्वचा के लिए नीम की पत्ते व गुलाब के पंखुडियां समान मात्रा मे लेकर 4 गुना मात्रा पानी मे भीगो दें । सुबह इस पानी को इतना उबालें कि पानी एक तिहाई रह जाए । अब यदि पानी 100 मी ली हो, तो लाल चंदन का बारीक चूर्ण 10 ग्राम मिला कर घोल बनाएं व फ़्रिज मे रख दें । एक घंटे बाद इस पानी मे रुई डुबो कर चेहरे पर लगाएं । कुछ मिनट बाद रगड कर चेहरे की त्वचा साफ़ कर लें । अगर आंखों के नीचे काले घेरें हों तो सोते समय बादाम रोगन उंगली से आंखों के नीचे लगाएं और 5 मिनट तक उंगली से हल्के हल्के मलें । एक सप्ताह के प्रयोग से ही त्वचा में निखार आ जाता है और आंखों के नीचे के काले घेरें भी खत्म होते हैं ।

Monday, December 28, 2009

खेत बंजर, मकान खंडहर, पराए हुए घर
डा. वीरेंद्र बत्र्वाल/नीरज डोभाल, देहरादून/पौड़ी लगता नहीं कि इन सूने गांवों में आज से दो-तीन दशक पहले बारहमासी रौनक रहती होगी। सर्दी के दिनों में अनुष्ठानों और शादियों के मौकों का तो कहना ही क्या था, जब गांवों में सतरंगी बहार आ जाती थी, लेकिन आज यहां के अधिकतर मकान खंडहर हो चुके खेत, खेत उजाड़ हैं। सरकार गांवों से पलायन रोकने के दावे कर सुखद सपने का अहसास करा रही हो, लेकिन अपनी थाती की इस दुर्दशा पर यहां के बुजुर्गो की आंखों में निराशा के आंसू झरते हैं। पलायन ने लोगों को अपनी माटी से बिछड़ा दिया है। रोजगार, शिक्षा और सुविधाओं की लालसा ने पहाड़ के गांव के गांव खाली कर दिए हैं। अफसोसजनक यह कि यह सिलसिला अलग राज्य बनने के बाद भी थमा नहीं। राज्य बनने के बाद जिस युवा को सरकारी नौकरी मिली, वह भी सबि धाणि देरादूण की तर्ज पर शहर में ही बस गया। आज नतीजा यह है कि पहाड़ के गांवों के अधिकतर घर महज साल में दो-तीन बार ही उनके मालिकों द्वारा गेस्ट हाउस की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं, शादी-विवाह के मौकों पर। जमीन का तो कोई पूछने वाला नहीं। पौड़ी गढ़वाल की थनगड़ घाटी हो या टिहरी गढ़वाल की डागर और लोस्तू-बडियारगढ़ पट्टियों के गांव। पलायन के दर्द के उकेरते ये सूने गांव भविष्य की भयावह तस्वीर बयां करते हैं। थनगड़ घाटी के 45 गांवों में कभी खूब चहल-पहल रहती थी। प्रकृति की वादियों में बसी यह घाटी एक जमाने फल और दाल उत्पादन में अग्रणी पंक्ति में थी, लेकिन अब पलायन ने इन गांवों की तस्वीर बदल दी है। जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर घंडियाल कस्बे के पश्चिमी ओर विस्तृत भूभाग पर फैली थनगड़ घाटी के ये पलायन की पीड़ा भोग रहे हैं। घाटी में बसे इन गांवों की आबादी सात हजार हंै। यहां के लोग सड़क से पीठ पर बोझा ढोकर दस किमी पैदल दूरी तय करते हैं। बाजार, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र और बस पकड़ने के लिए लोग मीलों पैदल चलते हैं। सरकार ने सड़कें बनाई, पर आधी-अधूरी। विद्युतीकरण किया, लेकिन समस्या लो वोल्टेज। विद्यालय दूर होने से बालिका शिक्षा का बुरा हाल। प्राइमरी के बाद उन्हें घर की जिम्मेदारियां सौंप दी जाती हैं और बचपन चूल्हा-चौका और छोटे भाई-बहनों की देखभाल में कट रहा है। कुदरत ने इस क्षेत्र को इनायत तो बख्शी है, लेकिन लोग कृषि व पशुपालन से लगातार दूर होते जा रहे हैं। खेती अब बूढ़ों और औरतों के जिम्मे है। ग्रामीण जगमोहन रावत व कल्जीखाल ब्लाक के ज्येष्ठ उप प्रमुख विश्व प्रकाश डंगवाल कहते हैं कि बीहड़ जंगलों के बीच बसे इन गांवों में जंगली जानवरों का भी खतरा है। यही पीड़ा टिहरी गढ़वाल की डागर पट्टी के दूरस्थ गांवों-टोला,ग्वाड़ व राडागाड की है। सड़क से दस किमी दूर इन गांवों में इसी दायरे में कोई चिकित्सा सुविधा नहीं है। सिरदर्द जैसी मामूली बीमारी पर भी दवा के लिए मीलों पैदल। सड़क सुविधा के लिए सरकार की दर पर दस्तक देते-देते लोग थक चुके हैं।?माध्यमिक शिक्षा की दशा भी ठीक नहीं। इन असुविधाओं के बीच शहरों में थोड़ा बहुत गुजारा करने लायक युवक अपने बच्चों और माता-पिता को साथ रखना ही उचित समझते हैं।

VIVEK PATWAL, Mobile no. 9811511501,

Thursday, December 24, 2009

प्यासों को फिर दिखाया सपना

पौड़ी गढ़वाल। पौड़ी शहर की प्यास शायद आने वाले तीन साल बाद ही बुझ पाएगी। जल निगम ने लाचारी व्यक्त की है कि वे फिलहाल आने वाले दो सालों तक नानघाट पेयजल योजना से पानी की सप्लाई शुरू नहीं पाएगा।

पौड़ी शहर को प्रतिदिन 5.18 एमएलडी पानी उपलब्ध कराने वाली महत्वाकांक्षी नानघाट पेयजल परियोजना का कार्य बेहद सुस्त चाल से चल रहा है। योजना के गत चार सालों मात्र 40 फीसदी कार्य ही पूरे हो पाए हैं और अब रिवाइज इस्टीमेट भेजने के बाद जल निगम ने अमूमन परियोजना कार्य बंद ही कर दिया है। उम्मीद है कि परियोजना की लागत 44 करोड़ से बढ़कर 79 करोड़ हो जाएगी। आम जनता का कहना है कि पौड़ी की समस्या को देखते हुए जल निगम अब मनमर्जी के स्टीमेट शासन को भेज रहा है और शासन में भी कोई ऐसा नहीं है कि निगम की मनमर्जी पर नकेल कस सके। पौड़ी में पानी की हालात पर नजर दौड़ाए तो यहां एक व्यक्ति मात्र दस लीटर पानी में काम चला रहा है। इस दस लीटर में न सिर्फ उसका परिवार खाना बना रहा है, बल्कि पूरा परिवार स्नान भी कर रहा है। आंकडे़ बताते हैं कि पौड़ी की करीब 60 हजार से अधिक की जनसंख्या मात्र 27 लाख लीटर पानी में गुजर बसर कर रही है। वर्ष 2003 में पौड़ी के वह सबसे बड़ा दिन था, जब 43.57 करोड़ की लागत से नानघाट पेयजल योजना का निर्माण शुरू हुआ। उस समय उम्मीद थी कि वर्ष 2006 में नानघाट का पानी पौड़ी पहुंच जाएगा, लेकिन अभी तक परियोजना का निर्माण मात्र 40 फीसदी ही पूरा हुआ और अब पौड़ी इसे स्वीकार कर चुकी है कि परियोजना को अधिकारी चट कर गए। बहरहाल जल निगम ने अब परियोजना की लागत बढ़ाकर दुगनी कर दी है और कार्य भी बहुत धीमा कर दिया है। अधिशासी अभियंता जल निगम आरजी सिंह का कहना है कि योजना का कार्य वर्ष 2006 तक पूरा होना था, लेकिन वन विभाग की सहमति न मिलने से परियोजना का निर्माण समय पर शुरू नहीं हो पाया और अब जल निगम पूरी मेहनत से कार्य कर रहा है। 79.15 किलोमीटर लंबी इस पेयजल योजना पर अभी तक 26 किलोमीटर तक कार्य हो चुका है, शेष 53.15 का निर्माण अभी बाकी है।

एसएसबी के निदेशक राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित

श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल)। सशस्त्र सीमा बल अकादमी श्रीनगर के निदेशक और महानिरीक्षक राजेन्द्र सिंह नेगी को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए वर्ष 2009 के राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया।

एसएसबी मुख्यालय दिल्ली में आयोजित एक भव्य समारोह में केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने नेगी को यह सम्मान प्रदान किया। नारायणबगड़ जिला चमोली के मौणा गांव में 12 दिसम्बर 1949 को जन्मे राजेन्द्र सिंह नेगी के नेतृत्व में सशस्त्र सीमा बल ने उत्तर पूर्वी राज्यों में उग्रवादियों के खिलाफ कारगर कार्यवाही की। श्री नेगी के ही नेतृत्व बीनातौली में एसएसबी के एक नए प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की गयी, जहां अन्य सुरक्षा बलों को भी प्रशिक्षण दिया जाता है। श्रीलंका में भारतीय सेना के साथ ऑपरेशन पवन में राजेन्द्र सिंह नेगी भारतीय दल के प्रथम पंक्ति के नायकों में शामिल रहे। श्रीलंका में उनके उत्तम कार्यो को देखते हुए ही नेगी को वर्ष 1990-91 में श्रीलंका अवार्ड से भी नवाजा गया। दिल्ली में राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित होने के बाद श्रीनगर पहुंचने पर सशस्त्र सीमा बल अकादमी में राजेन्द्र सिंह नेगी का जोरदार स्वागत भी किया गया।

तीरंदाजी प्रतियोगिता के लिए राज्य की टीम चयनित

गोवा में सात जनवरी से शुरू होने वाली इंडियन राउंड अखिल भारतीय तीरंदाजी प्रतियोगिता हेतु उत्तराखंड के टीम का चयन किया गया है। कण्डोलिया मैदान में आयोजित चयन ट्रायल में टीम के लिए प्रदेश के विभिन्न स्थानों के छह खिलाडिय़ों को चुना गया।

उत्तराखंड तीरंदाजी संघ के महासचिव जसपाल सिंह नेगी की देखरेख में आयोजित इस चयन ट्रायल में विभिन्न स्थानों से आए 20 तीरंदाजों ने प्रतिभाग किया। चयन ट्रायल में किए गए प्रदर्शन के अनुसार छह खिलाडिय़ों का राज्य की टीम के लिए चुना गया।

तीरंदाजी संघ के महासचिव जसपाल सिंह नेगी ने बताया कि चयन ट्रायल में कुमाऊं रेजीमेंट सेंटर रानीखेत के विक्रम सिंह, उम्मेद सिंह और चंद्रपाल सिंह क्रमश: पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। गढ़वाल रेजीमेंट सेंटर लैंसडौन के नत्थी सिंह, प्रीतम सिंह और सतेंद्र सिंह क्रमश: चौथे, पांचवे और छठे स्थान पर रहे। चयन ट्रायल कोटद्वार के तीरंदाज संदीप ढुकलान, गढ़वाल राइफल लैंसडौन के रमेश प्रसाद, कुमाऊं रेजीमेंट सेंटर के अरंगम गुरूंग द्वारा कराया गया। इस मौके पर उत्तराखंड तीरंदाजी संघ के सह सचिव डीडीएस पटवाल, यशवंत नेगी, केशर सिंह असवाल समेत कई लोग मौजूद थे। संघ के पदाधिकारियों के अनुसार टीम में चयनित सभी खिलाड़ी 7 से 9 जनवरी तक गोवा में आयोजित इंडियन राउंड की अखिल भारतीय तीरंदाजी प्रतियोगिता में प्रदेश की ओर से प्रतिभाग करेंगे।
अमर उजाला से साभार

Monday, December 21, 2009

-पुरानी टिहरी डूबने के साथ ही डूब गई सांस्कृतिक गतिविधियां भी

-मास्टर प्लान शहर में न वह रौनक न पहले जैसा मेलजोल

-उत्तराखंड के इंटर व डिग्र्री कालेजों में दिया जायेगा अब पायलट प्रशिक्षण

-उत्तराखंड के इंटर व डिग्र्री कालेजों में दिया जायेगा अब पायलट प्रशिक्षण -

सेना की भर्ती

-18 से 42 वर्ष तक के अभ्यर्थी करेंगे भागीदारी-सात राज्यों से केआरसी में तीन जनवरी को शुरू होगी भर्ती रानीखेत(अल्मोड़ा): कुमाऊं रेजीमेंट रानीखेत में उत्तराखंड समेत सात राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए आगामी 3 जनवरी से 111 पैदल वाहिनी (प्रादेशिक सेना) के विभिन्न पदों की भर्ती शुरू होगी। इस भर्ती में 42 वर्ष की उम्र तक के अभ्यर्थी हिस्सा ले सकेंगे। रानीखेत में होने वाली 111 पैदल वाहिनी (प्रादेशिक सेना) कुमाऊं की भर्ती के लिए शारीरिक परीक्षा की तिथि 3 जनवरी, 2010 निर्धारित की गई है। यह शारीरिक परीक्षा इस तिथि को कुमाऊं रेजीमेंट सेंटर रानीखेत में प्रात: 6:30 बजे से होगी। जीएसओ-1 (ट्रेनिंग) कैप्टन अनंत थापन ने बताया है कि शारीरिक दक्षता परीक्षा में उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की डाक्टरी व कागजातों की जांच 4 से 6 जनवरी तक होगी। इस भर्ती में उत्तराखंड समेत उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, झाारखंड, छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश के अभ्यर्थी हिस्सा लेंगे। इसके लिए आयु सीमा 18 से 42 वर्ष निर्धारित की गई है। यह भर्ती सिपाही (सामान्य), क्लर्क, हाउस कीपर (सफाई वाला) व स्टीवर्ड (मेस वेटर) के पदों के लिए होगी। सिपाही के लिए शैक्षिक योग्यता 45 प्रतिशत अंकों के साथ मैट्रिक पास, क्लर्क के लिए 50 प्रतिशत अंकों के साथ इंटर पास, मेस वेटर के लिए दसवीं पास व हाउस कीपर के लिए आठवीं पास रखी गई है। अभ्यर्थियों से अपने साथ शैक्षिक प्रमाण पत्रों समेत निवास, चरित्र प्रमाण पत्र, 12 पासपोर्ट साइज फोटो, खेलकूद प्रमाण पत्र इत्यादि लाने को कहा गया है। -

Friday, December 18, 2009

-जिन्हें बिसराया, वे ही संवार सकते हैं रीढ़
- उत्तराखंड में महत्व न मिलने से हाशिये पर गए बेडु, मेलू, घिंघोरा जैसे जंगली फल - स्वादिष्ट होने के साथ ही पौष्टिकता से भी लबरेज - लोक संस्कृति में रचे-बसे ये फल बन सकते हैं आर्थिकी का जरिया , देहरादून उत्तराखंड में महत्व न मिलने से बेडू, तिमला, काफल, मेलू, घिंघोरा, अमेस, हिंसर, किनगोड़ जैसे जंगली फल हाशिये पर चले गए। स्वादिष्ट एवं सेहत की दृष्टि से महत्वपूर्ण इन फलों को बाजार से जोडऩे पर ये आर्थिकी संवारने का जरिया बन सकते हैं, मगर अभी तक इस दिशा में कोई पहल होती नहीं दीख रही। उत्तराखंड में पाए जाने वाले जंगली फल यहां की लोकसंस्कृति में गहरे तक तो रचे बसे हैं, मगर इन्हें वह महत्व आज तक नहीं मिल पाया, जिसकी दरकार है। अलग राज्य बनने के बाद जड़ीबूटी को लेकर तो खूब हल्ला मचा, मगर इन फलों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझाी गई। देखा जाए तो ये जंगली फल न सिर्फ स्वाद, बल्कि सेहत की दृष्टि से कम अहमियत नहीं रखते। बेडू, तिमला, मेलू, काफल, अमेस, दाडि़म, करौंदा, जंगली आंवला व खुबानी, हिसर, किनगोड़, तूंग समेत जंगली फलों की ऐसी सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं, जिनमें विटामिन्स और एंटी ऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा है। विशेषज्ञों के अनुसार इन फलों की इकोलॉजिकल और इकॉनामिकल वेल्यू है। इनके पेड़ स्थानीय पारिस्थितिकीय तंत्र को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, जबकि फल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। बात सिर्फ इन जंगली फलों को महत्व देने की है। अमेस (सीबक थार्म) को ही लें तो चीन में इसके दो-चार नहीं पूरे 133 प्रोडक्ट तैयार किए गए हैं और वहां के फलोत्पादकों के लिए यह आय का महत्वपूर्ण स्र्रोत बन गया है। उत्तराखंड में यह फल काफी मिलता है, पर इस दिशा में अभी तक कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। काफल को छोड़ अन्य फलों का यही हाल है। काफल को भी जब लोग स्वयं तोड़कर बाहर लाए तो इसे थोड़ी बहुत पहचान मिली, लेकिन अन्य फल तो अभी भी हाशिये पर ही हैं। जबकि, इन फलों को बाजार से जोड़ा जाए तो ये सूबे की आथर््िाकी का महत्वपूर्ण जरिया बन सकते हैं। जंगली फलों में पोषक तत्व काफल अन्य फलों की अपेक्षा 10 गुना ज्यादा विटामिन सी अमेस विटामिन सी खुबानी विटामिन सी, एंटी ऑक्सीडेंट आंवला विटामिन सी, एंटी ऑक्सीडेंट सेब विटामिन ए, एंटी ऑक्सीडेंट तिमला, बेडू विटामिन्स से भरपूर ''उत्तराखंड में मिलने वाले जंगली फल पौष्टिकता की खान हैं, लेकिन इन्हें अब तक महत्व नहीं मिल पाया। प्रयास यह हो कि इन्हें आगे बढ़ाया जाए। जंगली फलों की क्वालिटी डेेवलप कर इनकी खेती की जाए। इसके लिए मिशन मोड में वृहद कार्ययोजना बनाकर कार्य करने की जरूरत है। इससे जहां पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा, वहीं आर्थिकी भी संवरेगी'' - पद्मश्री डा.अनिल जोशी, संस्थापक शोध संस्था हेस्को। ''जंगली फल उपेक्षित जरूर रहे हैं, लेकिन अब इन्हें पर्याप्त महत्व दिया जाएगा। प्रथम चरण में मेलू (मेहल), तिमला, आंवला, जामुन, करौंदा, बेल समेत एक दर्जन जंगली फलों की पौध तैयार कराने का निर्णय लिया गया है। एनजीओ के जरिए यह नर्सरियों में तैयार होगी। आज नहीं तो कल इन फलों को क्रॉप का दर्जा मिलना है। फिर ये तो आर्थिकी के लिए अहम हैं।''- डा.बीपी नौटियाल, निदेशक, उद्यान विभाग उत्तराखंड।

स्व-राज्य तो मिल गया, लेकिन सु-राज का अभी इंतजार-


लंबे संघर्ष के बाद उत्तराखंड के लोगों को स्व-राज्य तो मिल गया, लेकिन सु-राज का अभी इंतजार है। कर्मचारी बेफिक्र हैं और अधिकारी मस्त। जनता बेचारी क्या करे, किससे गुहार लगाए। कुछ दिनों पहले राजधानी में ही एएनएम ने अस्पताल को किराए पर चढ़ा दिया, किसी को खबर नहीं लगी। कलेक्ट्रेट में मां की बजाए बेटा नौकरी करता रहा, यहां भी महकमे के जिम्मेदार लोगों ने साथी कर्मचारी के लिए 'सद्भावना' का परिचय दिया। वो तो डीएम के निरीक्षण के दौरान पोल खुल गई, वरना न जाने कब तक यह सब चलता रहता। ये तो राजधानी में सामने आए कुछ 'नमूने' हैं। ये हाल उस जगह का है, जहां स्वयं सरकार विराजमान है। अब दूर-दराज के इलाकों की बात करें। वहां तो स्थितियां पूरी तरह अनुकूल हैं, यही वजह है कि वहां 'अपनी मर्जी अपना राज' वाले अंदाज में काम चल रहा है। बिन बताए गैरहाजिर रहने का ट्रेंड तो अब पुराना पड़ चुका है। इससे भी आगे निकल मुलाजिमों ने नए तरीके ईजाद कर लिए हैं। नए तरीके ऐसे कि देखने वाले भी दंग रह जाएं। इसके लिए माह में एकाध बार से ज्यादा उपस्थिति दर्ज कराने की जरूरत नहीं है। चकराता क्षेत्र में शिक्षा विभाग के निरीक्षण में इन तरीकों का खुलासा हुआ। शिक्षकों ने स्कूल में बाकायदा ठेके पर बेरोजगारों को नियुक्त किया हुआ है। ये बेरोजगार ही उनकी जगह पर स्कूल का संचालन कर रहे हैं। अलग राज्य बनने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि जो खामियां अविभाजित उत्तर प्रदेश में थीं, उनसे मुक्ति मिल जाएगी, वजह यह मानी जा रही थी छोटी प्रशासनिक इकाइयां ज्यादा सक्रियता से जनता तक पहुंचेगी, लेकिन यह मंशा अभी तक फलीभूत न हो सकी। आखिर यह सब कब तक चलेगा। यदि नौ साल बाद भी जनता को उन्हीं समस्याओं से जूझाना पड़ रहा है तो यह गंभीर मसला है। अब यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह स्वस्थ माहौल बनाए और ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई करे, जिससे दूसरे भी सबक ले सकें। तभी जाकर अवाम का विश्वास बहाल हो सकेगा।


(नई टिहरी) सपनों के शहर में अपनों की तलाश

-पुरानी टिहरी डूबने के साथ ही डूब गई सांस्कृतिक गतिविधियां भी -मास्टर प्लान शहर में न वह रौनक न पहले जैसा मेलजोल नई टिहरी,---- ऐतिहासिक पुरानी टिहरी शहर डूबने के साथ ही कभी राष्ट्रीय स्तर तक इसकी पहचान के रूप में जानी जाने वाली सांस्कृतिक गतिविधियां भी खत्म हो गईं। इसके एवज में मास्टर प्लान के तहत बसाए गए नई टिहरी शहर में न तो पुरानी टिहरी जैसी रौनक है, न ही सांस्कृतिक और खेल गतिविधियां। कंक्रीट के इस नीरस शहर में मनोरंजन के लिए लोग तरस जाते हैं। पुरानी टिहरी, जिसे गांव का शहर भी कहा जाता था, में हर तरफ चहल-पहल रहती थी। सांस्कृतिक, खेल व अन्य सामाजिक गतिविधियों से गुलजार इस शहर में वक्त कब गुजर गया, पता ही नहीं चलता था। सांस्कृतिक कार्यक्रम, विभिन्न खेल प्रतियोगिताएं या मेले शहर में समय-समय पर कोई न कोई आयोजन होता रहता था। रामलीला, बसंतोत्सव, मकर संक्रांति पर लगने वाला मेला शहर की रौनक में चार चांद लगा देते थे। दीपावली या अन्य पर्वों पर सामूहिक कार्यक्रम शहर में होते थे, लेकिन बांध की झाील में पुरानी टिहरी के डूबने के साथ ही शहर की यह पहचान भी खत्म हो गई। पुरानी टिहरी के बाशिंदों को मास्टर प्लान के तहत बने नई टिहरी शहर में बसाया गया, लेकिन इसमें वह बात कहां, जो उस शहर में थी। न रौनक, न वह मेल- जोल और न ही वे सांस्कृतिक गतिविधियां, जब भी याद आती है, नई टिहरी में बस गए बुजुर्गों की आंखें नम हो जाती हैं। हों भी क्यों नहीं, आखिर नई टिहरी में पनप रही बंद दरवाजे की संस्कृति और आधुनिक रहन-सहन का बढ़ता चलन लोगों के दिलों की दूरियां बढ़ा रहा है। सांस्कृतिक दृष्टि से शून्य इस शहर में वर्ष 2001 में उत्तरांचल शरदोत्सव हुआ। उसके बाद एकाध बार नगरपालिका द्वारा शरदोत्सव का आयोजन तो किया गया, लेकिन इसके बाद यहां न कोई सांस्कृतिक और न ही कोई सामूहिक कार्यक्रम आयोजित हुए हैं। मास्टर प्लान में कल्चर सेंटर का प्राविधान था, लेकिन इसके लिए भी कोई पहल अब तक नहीं हुई है। पुरानी टिहरी जैसा मेल-जोल भी यहां नहीं। वहां लोग पैदल घूमने निकलते, तो परिचितों से मुलाकात होती और फिर परिवार, समाज, राजनीति जैसे मसलों पर रायशुमारी भी होती, लेकिन नई टिहरी की भौगोलिक संरचना ऐसी है कि यहां पैदल चलना भी आसान नहीं है, सीढिय़ों के इस शहर में चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते लोग हांफ जाते हैं। सामाजिक सांस्कृतिक संस्था त्रिहरी से जुड़े महिपाल नेगी कहते हैं कि नई टिहरी में सांस्कृतिक केन्द्र की स्थापना होनी चाहिए। सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए समाज को आगे आना चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी निराशा जताई कि अब लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत की जड़ों को भूलने लगे हैं।

Tuesday, December 15, 2009

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल (१३दिसंबर,१९०१ - २४ जुलाई,१९४४)
पाली ग्राम (उत्तराखंड) में हिन्दी का जन्मा लाल कर शोध हिन्दी में पहली बार सबको दिखाई नई राह बने प्रथम भारतीय् जिन्होने डी.लिट हिन्दी में पाई नाम इस साहित्य्कार का था डा.पीताम्बर दत्त बडथ्वाल हिन्दी काव्य मे निर्गुणवाद पर कर गये वो शोध संस्कृत,अवधी,ब्रजभाषा अरबी व फारसी का था उनको बोध संत,सिद्ध,नाथ और भक्ति का किया उन्होने विश्लेषण दूर दृष्टि के थे वे परिचायक,निबंधकार और थे वे समी़क्षक हिन्दी को नया आयाम दे गया ये हिन्दी का सेवक कर गया दुनिया मे नाम हिन्दी का ये लेखक छात्र करते है शोध आज भी पढ उनकी रचनाये कह गये जो वो उसे लोग आज भी अपनाये अल्प आयु मे कह गया अलविदा वो हिन्दी का नायक दे गया धरोहर हमे गोरखबाणी और नाथ सिद्धो की रचनाओ का आज भले ही भूल चुका है उन्हे हिन्दी का साहित्य समाज हिन्दी का सम्मान करे|

Wednesday, December 9, 2009

पहाड़ी मड़ुआ का दीवाना हुआ यूरोप

पहाड़ी मड़ुआ का दीवाना हुआ यूरोप

यहां गरीबों का निवाला वहां अमीरों का स्नेक्स अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नजर उत्तराखण्ड की पैदावार पर अब यूरोप को भी पहाड़ी मड़ुआ का स्वाद रास आ गया है। यही कारण है कि नमकीन बनाने वाली एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की निगाह अब उत्तराखण्ड में मडुआ की पैदावार पर है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गरीबों का मुख्य निवाला मडुआ ही रहा है। मडु़आ की रोटी भले ही काले रंग रंग की दिखती हो पर इसके स्वाद व पोषक तत्व के बूते इसने यूरोप के बाजार में भी जगह बना ली है। मगर हैरत की बात यह है कि जहां की यह पैदावार हैं उस क्षेत्र में आज तक व्यवसायिक उपयोग नहीं किया जा सका। बताते हैं कि एक मल्टीनेशनल कम्पनी ने महराष्ट्र व गुजरात में पैदा होने वाले मडुआ (वहां का स्थानीय नाम-नाचनी) के चिप्स, नमकीन, मठरी आदि का निमार्ण कर जब विदेशी बाजार में उतारा तो वहां के लोग इसके स्वाद के दीवाने हो गये। यही कारण है कि अब उत्तराखण्ड में मडुआ की पैदावार पर विदेशी कम्पनियों की नजर गई है। नमकीन बनाने वाली मुम्बई की मल्टीनेशनल कम्पनी सावंत स्नेक्स के प्रतिनिधि राकेश बंदोपाध्याय इन दिनों नैनीताल जिले में मडुआ का प्रबंधन करने आये हैं। वे गांवों में पहुंच कर ग्रामीणों को पैदावार बढ़ाने के प्रति प्रेरित करने के अलावा उनके पास उपलब्ध मडुआ खरीद भी रहे हैं। समाज कल्याण विभाग में अपने एक जानने वाले के माध्यम से गांवों तक पहुंच बना रहे श्री बंदोपाध्याय ने बताया कि मडुआ के स्नेक्स की मांग विदेशों में काफी बढ़ी है। इसकी पैदावार बढ़ाकर किसानों के सामने अब अच्छी कमाई का रास्ता खुल गया है। उन्होंने बताया कि मडुआ स्वास्थ्य के दृष्टि से भी उत्तम है इसी कारण विदेशों में चाव से खाया जा रहा है। इसमें 71 फीसदी कार्बोहाइड्रेड, 12 फीसदी प्रोटीन तथा 5 फीसदी वसा पाया जाता है। साथ ही फाइबर की मात्रा अधिक होने के कारण मडुआ से कैलौरी अधिक मिलती है।

-यहां बर्तन नहीं पत्थरों पर होता है भोजन

-चमोली जिले में हर साल जेठ (जून) महीने में होता है उफराईं देवी की डोली यात्रा का आयोजन -यात्रा के दौरान मौडवी नामक स्थान पर पत्थर पर दिया जाता है प्रसाद गोपेश्वर(चमोली)-गढ़वाल न सिर्फ देवभूमि के रूप में जाना जाता है, बल्कि यहां की रीतियों व परंपराओं की विशिष्टताओं के चलते इसे खास पहचान भी हासिल है। ऐसी ही एक अनूठी परंपरा के तहत नौटी-मैठाणा गांव के लोगों सहित मौडवी में उफराईं देवी की डोली यात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालु प्रसाद के रूप पका भोजन बर्तनों या पत्तलों में नहीं, बल्कि पत्थरों पर खाते हैं। उल्लेखनीय है कि क्षेत्रीय भूमियाल उफराईं देवी की डोली यात्रा हर वर्ष जेठ के महीने मैठाणी पुजारियों द्वारा निर्धारित शुभ दिन पर आयोजित की जाती है। इसके तहत ग्रामीण देवी की डोली को गांव के उत्तर-पश्चिम में ऊंची चोटी पर स्थित उफराईं के स्थान तक ले जाते हैं। यात्रा में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। नौटी-मैठाणा गांव स्थित मंदिर से लगभग छह हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित उफरांई ठांक (स्थान) में स्थित मंदिर तक जाते हुए रास्ते में मौडवी नामक स्थान पर श्रद्धालुओं के लिए सामूहिक भोज तैयार किया जाता है। यहां से ठांक स्थित मंदिर में देवी के लिए भोग ले जाया जाता है। मंदिर में देवी को भोग लगाने व पूजा- अर्चना के बाद श्रद्धालु डोली के साथ वापस मौडवी आते हैं। यहां देवी के प्रसाद के रूप में तैयार दाल- चावल को शुद्धिकरण व देवी की डोली द्वारा परिक्रमा के बाद श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। खास बात यह है कि भक्त इस प्रसाद को बर्तनों या पत्तलों पर नहीं, बल्कि पत्थरों पर रखकर खाते हैं। उल्लेखनीय है कि मुख्यालय से लगभग सत्तर किलोमीटर की दूरी पर तहसील कर्णप्रयाग के चांदपुर पट्टी स्थित ऐतिहासिक गांव नौटी-मैठाणा में भूमियाल उफराईं देवी का प्राचीन मन्दिर है। प्राचीनकाल में मंदिर के रखरखाव के लिए हिन्दू राजाओं ने गूंठ (महान मंदिरों के लिए स्वीकृत भूमि-राजस्व) का प्रावधान भी किया था। इस ऐतिहासिक मन्दिर में स्थापना के बाद से ही नित्य सुबह-शाम की पूजा अनवरत रूप से होती चली आ रही है। मंदिर के पुजारी भुवन चन्द्र व मदन प्रसाद ने बताया कि यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि भूमियाल होने के चलते गांव के सभी घरों में किसी भी शुभ कार्य के आयोजन से पूर्व देवी मां की पूजा के लिए विशेष प्रावधान है। ग्रामीण पंकज कुमार ने बताया कि जून के महीने देवी की डोली यात्रा सांस्कृतिक विरासत होने के साथ-साथ वर्तमान में पर्यटन की दृष्टि से भी अनुकूल है। उनका कहना है कि वर्ष में एक बार देवी मां का प्रसाद पत्थर में खाने के लिए गांव के लोगों सहित बाहर नौकरी कर रहे ग्रामीण भी पहुंचते हैं। विशेष रूप से बच्चों व युवाओं को इस दिन का खासा इंतजार रहता है, क्योंकि उनके लिए यह अलग अनुभव होता है।
पहाड़ से साभार .....

Tuesday, October 20, 2009

राजेंदर प्रसाद चमोली

नरु-बिजुला रची प्रेम कहानी
उत्तरकाशी। पहली नजर का प्यार, इकरार, प्यार को पाने की कोशिश, दो इलाकों की परंपरागत दुश्मनी, रार और फिर प्यार करने वालों की जीत, यानी हर वो मसाला इस कहानी में है, जो बालीवुड फिल्मों के लिए अनिवार्य माना जाता है। अंतर है तो सिर्फ इतना कि बालीवुड में बनने वाली फिल्में काल्पनिक कहानियों पर आधारित होती हैं, जबकि यह एक सच्ची कहानी है। बात हो रही है उत्तरकाशी के दो भाइयों नरु और बिजुला की। इन दोनों ने आज से करीब छह सौ साल पहले प्यार की खातिर कुछ ऐसा किया, जो प्रेम डगर पर पग धरने वालों के लिए नजीर बन गया।

कहानी शुरू होती है पंद्रहवीं सदी से। उत्तरकाशी के तिलोथ गांव में रहने वाले दो भाई नरु और बिजुला गंगा घाटी में अपनी वीरता के लिए विख्यात थे। उन दिनों गंगा घाटी और यमुना घाटी के लोगों में परस्पर परंपरागत तौर पर दुश्मनी थी। इस बीच बाड़ाहाट के मेले ने नरु और बिजुला की जिंदगी बदलकर रख दी। दरअसल दोनों भाई मेले में गए थे, यहां उन्हें एक युवती दिखी, नजरें मिली और दोनों भाई उसे दिल दे बैठे। आंखों ही आंखों में युवती भी इकरार का इजहार कर वापस लौट गई। भाइयों ने युवती के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि युवती यमुना पार रवांई इलाके के डख्याट गांव की रहने वाली थी। इसके बाद दोनों भाई डख्याट गांव पहुंचे तथा युवती को तिलोथ लेकर आए।

उधर, डख्याट से युवती को उठाने की सूचना मिलते ही यमुना घाटी रवांई के कई गांवों के लोग इकट्ठा हो गए। उन्हें यह मंजूर नहीं था कि गंगा घाटी वाला उनकी बेटी को उठा ले जाए। सैकड़ों लोग हथियार लेकर नरु- बिजुला को तलाशने लगे। उनका पीछा करते हुए यह लोग ज्ञानसू पहुंचे और रात को यहीं विश्राम किया। ज्ञानसू में रवांई के लोगों के जमा होने की सूचना मिलते ही नरु-बिजुला ने अपने गांव की महिलाओं को अन्न-धन के भंडार समेत डुण्डा के उदालका गांव की ओर रवाना कर दिया और दोनों खुद ही रवांई वालों से लोहा लेने ज्ञानसू पहुंच गए। बताया जाता है कि इस लड़ाई में नरु-बिजुला ने रवांई घाटी के सैकड़ों लोगों की पिटाई कर उन्हें भागने पर विवश कर दिया। इसके बाद दोनों ने अपनी पत्नी के साथ सुखद जीवन जिया। नरु-बिजुला की पीढि़यां आज भी तिलोथ गांव में रहती हैं। इस परिवार के बुजुर्ग बलदेव सिंह गुसाई ने जब यह कहानी सुनाई, तो उनकी आंखों की चमक और चौड़ा होता सीना गवाही दे रहा था कि उन्हें नरु-बिजुला का वंशज होने पर उन्हें गर्व है। उन्होंने बताया कि ज्ञानसू की लड़ाई गंगा-यमुना घाटी की अंतिम लड़ाई थी। एक खास बात यह कि तिलोथ में नरु-बिजुला का छह सौ साल पुराना चार मंजिला भवन आज भी सुरक्षित है। आठ हाल व आठ छोटे कक्ष वाले भवन की हर मंजिल के चारों ओर खूबसूरत अटारियां बनी हैं। इसकी मजबूती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तरकाशी में 1991 में आया भीषण भूकंप भी इसे नुकसान नहीं पहुंचा सका। हालांकि सरकार इस हवेली के संरक्षण को कुछ नहीं कर रही है। नरु-बिजुला परिवार के सतीश गुसांई ने इसे लेकर मई, 2009 में जिलाधिकारी उत्तरकाशी को पत्र दिया, जिस पर डीएम ने संस्कृति निदेशालय से इस ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित करने जरूरत जताई। संस्कृति निदेशालय के सहायक निदेशक योगेश पंत ने पुरातत्व विभाग को आदेश दिए कि भवन का निरीक्षण कर आख्या भेजें, लेकिन पुरातत्व विभाग ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है।

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