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Saturday, January 29, 2011

उत्तराखण्ड में पर्यटन और तीर्थाटन

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उत्तराखण्ड में पर्यटन और तीर्थाटन
सुदर्शन सिंह रावत | फुरसती, साहसिक, और धार्मिक पर्यटन उत्तराखण्ड की अर्थव्यस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसे जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान और बाघ संरक्षण-क्षेत्र और नैनीताल, अल्मोड़ा, कसौनी, भीमताल, रानीखेत, और मसूरी जैसे निकट के पहाड़ी पर्यटन स्थल जो भारत के सर्वाधिक पधारे जाने वाले पर्यटन स्थलों में हैं। पर्वतारोहियों के लिए राज्य में कई चोटियाँ हैं, जिनमें से नंदा देवी, सबसे ऊँची चोटी है और १९८२ से अबाध्य है। अन्य राष्टीय आश्चर्य हैं फूलों की घाटी, जो नंदा देवी के साथ मिलकर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
चारधाम
उत्तराखण्ड में, जिसे "देवभूमि" भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म के कुछ सबसे पवित्र तीर्थस्थान है, और हज़ार वर्षों से भी अधिक समय से तीर्थयात्री मोक्ष और पाप शुद्धिकरण की खोज में यहाँ आ रहे हैं। गंगोत्री और यमुनोत्री, को क्रमशः गंगा और यमुना नदियों के उदग्म स्थल हैं, केदारनाथ (भगवान शिव को समर्पित) और बद्रीनाथ (भगवान विष्णु को समर्पित) के साथ मिलकर उत्तराखण्ड के छोटा चार धाम बनाते हैं, जो हिन्दू धर्म के पवित्रतम परिपथ में से एक है। हरिद्वार के निकट स्थित ऋषिकेश भारत में योग क एक प्रमुख स्थल है, और जो हरिद्वार के साथ मिलकर एक पवित्र हिन्दू तीर्थ स्थल है।

हरिद्वार में प्रति बारह वर्षों में कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें देश-विदेश से आए करोड़ो श्रद्धालू भाग लेते हैं।राज्य में मंदिरों और तीर्थस्थानों की बहुतायत है, जो स्थानीय देवताओं या शिवजी या दुर्गाजी के अवतारों को समर्पित हैं, और जिनका सन्दर्भ हिन्दू धर्मग्रन्थों और गाथाओं में मिलता है। इन मन्दिरों का वास्तुशिल्प स्थानीय प्रतीकात्मक है और शेष भारत से थोड़ा भिन्न है। जागेश्वर में स्थित प्राचीन मन्दिर (देवदार वृक्षों से घिरा हुआ १२४ मन्दिरों का प्राणंग) एतिहासिक रूप से अपनी वास्तुशिल्प विशिष्टता के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। तथापि, उत्तराखण्ड केवल हिन्दुओं के लिए ही तीर्थाटन स्थल नहीं है। हिमालय की गोद में स्थित हेमकुण्ड साहिब, सिखों का तीर्थ स्थल है। मिंद्रोलिंग मठ और उसके बौद्ध स्तूप से यहाँ तिब्बती बौद्ध धर्म की भी उपस्थिति है। 

उत्तराखंड में पर्यटन स्थल
उत्तराखण्ड में बहुत से पर्यटन स्थल है जहाँ पर भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से पर्यटक आते हैं, जैसे नैनीताल और मसूरी। राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं:
    केदारनाथ
    नैनीताल
    गंगोत्री
    यमुनोत्री
    बद्रीनाथ
    अल्मोड़ा
    ऋषिकेश
    हेमकुण्ड साहिब
    नानकमत्ता
    फूलों की घाटी
    मसूरी
    देहरादून
    हरिद्वार
    औली
    चकराता
    रानीखेत
    बागेश्वर
    भीमताल
    कौसानी
    लैंसडाउन

उत्तराखण्ड में परिवहन के साधन

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सुदर्शन सिंह रावत |  उत्तराखण्ड रेल, वायु, और सड़क मार्गों से अच्छे से जुड़ा हुआ है। उत्तराखण्ड में पक्की सडकों की कुल लंबाई २१,४९० किलोमीटर है। लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित सड़कों की लंबाई १७,७७२ कि.मी. और स्थानीय निकायों द्वारा बनाई गई सड़कों की लंबाई ३,९२५ कि.मी. हैं।
जौली ग्रांट (देहरादून) और पंतनगर (ऊधमसिंह नगर) में हवाई पट्टियां हैं। नैनी-सैनी (पिथौरागढ़), गौचर (चमोली) और चिनयालिसौर (उत्तरकाशी) में हवाई पट्टियों को बनाने का कार्य निर्माणाधीन है। 'पवनहंस लि.' ने 'रूद्र प्रयाग' से 'केदारनाथ' तक तीर्थ यात्रियों के लिए हेलीकॉप्टर की सेवा आरम्भ की है।
जॉलीग्रांट हवाई अड्डा, देहरादून
हवाई अड्डे
राज्य के कुछ हवाई क्षेत्र हैं:
जॉलीग्रांट हवाई अड्डा (देहरादून): जॉलीग्रांट हवाई अड्डा, देहरादून हवाई अड्डे के नाम से भी जाना जाता है। यह देहरादून से २५ किमी की दूरी पर पूर्वी दिशा में हिमालय की तलहटियों में बसा हुआ है। बड़े विमानों को उतारने के लिए इसका हाल ही में विस्तार किया गया है। पहले यहाँ केवल छोटे विमान ही उतर सकते थे लेकिन अब एयरबस ए३२० और बोइंग ७३७ भी यहाँ उतर सकते हैं।[२४]
    चकराता वायुसेना तलः चकराता वायुसेना तल चकराता में स्थित है, जो देहरादून जिले का एक छावनी कस्बा है। यह टोंस और यमुना नदियों के मध्य, समुद्र तल से १,६५० से १,९५० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
    पंतनगर हवाई अड्डा (नैनी सैनी, पंतनगर)
    उत्तरकाशी
    गोचर (चमोली)
    अगस्त्यमुनि (हेलिपोर्ट) (रुद्रप्रयाग)
    पिथौरागढ़
रेलवे स्टेशन
राज्य के रेलवे स्टेशन हैं:
    देहरादून: देहरादून का रेलवे स्टेशन, घण्टाघर/नगर केन्द्र से लगभग ३ किमी कि दूरी पर है। इस स्टेशन का निर्माण १८९७ में किया गया था। 
    हरिद्वार जंक्शन
    हल्द्वानी-काठगोदाम रेलवे स्टेशन
    रुड़की
    रामनगर
    कोटद्वार रेलवे स्टेशन
    ऊधमसिंह नगर
बस अड्डे
राज्य के प्रमुख बस अड्डे हैं:
    देहरादून
    हरिद्वार
    हल्द्वानी
    रुड़की
    रामनगर
    कोटद्वार

उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था

सुदर्शन सिंह रावत | उत्तराखण्ड का सकल घरेलू उत्पाद वर्ष २००४ के लिए वर्तमान मूल्यों के आधार पर अनुमानित २८०.३२ अरब रुपए (६ अरब डॉलर) था। उत्तर प्रदेश से अलग होकर बना यह राज्य, पुराने उत्तर प्रदेश के कुल उत्पादन का ८% उत्पन्न करता है। २००३ की औद्योगिक नीति के कारण, जिसमें यहाँ निवेश करने वाले निवेशकों को कर राहत दी गई है, यहाँ पूँजी निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सिडकुल यानि स्टेट इन्फ़्रास्ट्रक्चर एण्ड इण्डस्ट्रियल डिवेलपमण्ट कार्पोरेशन ऑफ उत्तराखण्ड लि. ने उत्तराखण्ड राज्य के औद्योगिक विकास के लिये राज्य के दक्षिणी छोर पर सात औद्योगिक भूसंपत्तियों की स्थापना की है[२२], जबकि ऊचले स्थानों पर दर्जनों पनबिजली बाँधों का निर्माण चल रहा है। फिर भी, पहाड़ी क्षेत्रों का विकास अभी भी एक चुनौती बना हुआ है क्योंकि लोगों का पहाड़ी क्षेत्रों से मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन जारी है।
टिहरी पन बिजली परियोजना का बांध


उत्तराखण्ड में चूना पत्थर, राक फास्फेट, डोलोमाइट, मैग्नेसाइट, तांबा, ग्रेफाइट, जिप्सम आदि के भण्डार हैं। राज्य में ४१,२१६ लघु औद्योगिक इकाइया स्थापित हैं, जिनमें लगभग ३०५.५८ करोड़ की परिसंपत्ति का निवेश हुआ है और ६३,५९९ लोगों को रोजगार प्राप्त है। इसके अतिरिक्त १९१ भारी उद्योग स्थापित हैं, जिनमें २,६९४.६६ करोड़ रुपयों का निवेश हुआ है। १,८०२ उद्योगों में ५ लाख लोगों को कार्य मिला हुआ है। वर्ष २००३ में एक नयी औद्योगिक नीति बनायी गई जिसके अन्तर्गत्त निवेशकों को कर में राहत दी गई थी, जिसके कारण राज्य में पूंजी निवेश की एक लहर दौड़ गयी।

राज्य की अर्थ-व्यवस्था मुख्यतः कृषि और संबंधित उद्योगों पर आधारित है। उत्तराखण्ड की लगभग ९०% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। राज्य में कुल खेती योग्य क्षेत्र ७,८४,११७ हेक्टेयर (७,८४१ किमी²) है। इसके अलावा राज्य में बहती नदियों के बाहुल्य के कारण पनविद्युत परियोजनाओं का भी अच्छा योगदान है। राज्य में बहुत सी पनविद्युत परियोजनाएं हैं जिनक राज्य के लगभग कुल ५,९१,४१८ हेक्टेयर कृषि भूमि में सिंचाई में भी योगदान है। राज्य में पनबिजली उत्पादन की भरपूर क्षमता है। यमुना, भागीरथी, भीलांगना, अलकनन्दा, मन्दाकिनी, सरयू, गौरी, कोसी और काली नदियों पर अनेक पनबिजली संयंत्र लगे हुए हैं, जिनसे बिजली का उत्पादन हो रहा है। राज्य के १५,६६७ गांवों में से १४,४४७ (लगभग ९२.२२%) गांवों में बिजली है।इसके अलावा उद्योग का एक बड़ा भाग वन संपदा पर आधारित हैं। राज्य में कुल ५४,०४७ हस्तशिल्प उद्योग क्रियाशील हैं।

जनसाँख्यिकी

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उत्तराखण्ड के लोग, कुमाऊँनी लोग, और गढ़वाली लोग
सुदर्शन सिंह रावत | २००१ की जनगणना के अनुसार, उत्तराखण्ड की जनसंख्या ८४,८९,३४९ है जिसमें ४३,२५,९२४ पुरुष और ९१,६३,८२५ स्त्रियाँ हैं। इसमें सर्वाधिक जनसंख्या राजधानी देहरादून की ५,३०,२६३ है।[१९] २०११ की जनगणना तक जनसंख्या का १ करोड़ तक हो जाने का अनुमान है। मैदानी क्षेत्रों के जिले पर्वतीय जिलों की अपेक्षा अधिक जनसंख्या घनत्व वाले हैं। राज्य के मात्र चार सर्वाधिक जनसंख्या वाले जिलों में राज्य की आधे से अधिक जनसंख्या निवास करती हैं। जिलों में जनसंख्या का आकार २ लाख से लेकर अधिकतम १४ लाख तक है। राज्य की दशकवार वृद्धि दर १९९१-२००१ में १९.२ प्रतिशत रही। उत्तराखण्ड के मूल निवासियों को कुमाऊँनी या गढ़वाली कहा जाता है जो प्रदेश के दो मण्डलों कुमाऊँ और गढ़वाल में रहते हैं। एक अन्य श्रेणी हैं गुज्जर, जो एक प्रकार के चरवाहे हैं और दक्षिण-पश्चिमी तराई क्षेत्र में रहते हैं।

मध्य पहाड़ी की दो बोलियाँ कुमाऊँनी और गढ़वाली, क्रमशः कुमाऊँ और गढ़वाल में बोली जाती हैं। जौनसारी और भोटिया दो अन्य बोलियाँ, जनजाति समुदायों द्वारा क्रमशः पश्चिम और उत्तर में बोली जाती हैं। लेकिन हिन्दी पूरे प्रदेश में बोली और समझी जाती है और नगरीय जनसंख्या अधिकतर हिन्दी ही बोलती है।
उत्तराखण्ड में धार्मिक समूह
धार्मिक समूह             प्रतिशत[२०]    
हिन्दू                           85.00%
मुसलमान                  11.92%
सिख                          2.49%
ईसाई                         0.32%
बौद्ध                           0.15%
जैन                            0.11%
अन्य                          0.01%

शेष भारत के समान ही उत्तराखण्ड में हिन्दू बहुमत में हैं और कुल जनसंख्या का ८५% हैं, इसके बाद मुसलमान १२%, सिख २.५%, और अन्य धर्मावलम्बी ०.५% हैं। यहाँ लिंगानुपात प्रति १००० पुरुषों पर ९६४, और साक्षरता दर ७२.२८%[२१] है। राज्य के बड़े नगर हैं देहरादून (५,३०,२६३), हरिद्वार (२,२०,७६७), हल्द्वानी (१,५८,८९६), रुड़की (१,१५,२७८), और रुद्रपुर (८८,७२०)। राज्य सरकार द्वारा १५,६२० ग्रामों और ८१ नगरीय क्षेत्रों की पहचान की गई है।
कुमाऊँ और गढ़वाल के इतिहासकारों का कहना है की आरम्भ में यहाँ केवल तीन जातियाँ थी राजपूत, ब्राह्मण, और शिल्पकार। राजपूतों का मुख्य व्यवसाय ज़मीदारी और कानून-व्यस्था बनाए रखना था। ब्राह्मणों का मुख्य व्यवसाय था मन्दिरों और धार्मिक अवसरों पर धार्मिक अनुष्ठानों को कराना। शिल्प्कार मुख्यतः राजपूतों के लिए काम किया करते थे और हथशिल्पी में दक्ष थे। राजपूतों द्वारा दो उपनामों रावत और नेगी का उपयोग किया जाता है।

मण्डल, जिले एवं जनसँख्या

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| सुदर्शन सिरं रावत |
उत्तराखंड में मण्डल और जिले
उत्तराखण्ड के मण्डल और उत्तराखण्ड के जिले

उत्तराखण्ड के जिले
उत्तराखण्ड में १३ जिले हैं जो दो मण्डलों में समूहित हैं: कुमाऊँ मण्डल और गढ़वाल मण्डल।

कुमाऊँ मण्डल के छः जिले हैं
    अल्मोड़ा जिला
    उधम सिंह नगर जिला
    चम्पावत जिला
    नैनीताल जिला
    पिथौरागढ़ जिला
    बागेश्वर जिला

गढ़वाल मण्डल के सात जिले हैं

    उत्तरकाशी जिला
    चमोली गढ़वाल जिला
    टिहरी गढ़वाल जिला
    देहरादून जिला
    पौड़ी गढ़वाल जिला
    रूद्रप्रयाग जिला
    हरिद्वार जिला

प्रमुख नगर
उत्तराखण्ड के प्रमुख नगर और जनसंख्या
१     देहरादून     देहरादून जिला     ४,४७,८०८     
२     हरिद्वार     हरिद्वार जिला     १,७५,०१०     
३     हल्द्वानी     नैनीताल जिला     १,२९,१४०    
४     रुड़की     हरिद्वार जिला     ९७,०६४    
५     काशीपुर     उधमसिंहनगर जिला     ९२,९७८   
६     रुद्रपुर     उधमसिंहनगर जिला     ८८,७२०    
७     ऋषिकेश     देहरादून जिला     ५९,६७१    
८     रामनगर     नैनीताल जिला     ४७,०९९   
९     पिथौरागढ़     पिथौरागढ़ जिला     ४१,१५७   
१०     जसपुर     उधमसिंहनगर जिला     ३९,०४८   
११     नैनीताल     नैनीताल जिला     ३८,५५९
१२     अल्मोड़ा     अल्मोड़ा जिला     ३०,६१३
१३     किच्छा     उधमसिंहनगर जिला     ३०,५१७
१४     मसूरी     देहरादून जिला     २६,०६९
 १५     कोटद्वार     पौड़ी जिला     २५,४००
  १६     पौड़ी     पौड़ी जिला     २४,७४२
१७     श्रीनगर     पौड़ी जिला     १९,८६१
१८     गोपेश्वर     चमोली जिला     १९,८५५
१९     रानीखेत     अल्मोड़ा जिला     १९,०४९
२०     खटीमा     उधमसिंहनगर जिला     १४,३७८
२१     जोशीमठ     चमोली जिला     १३,२०२
२२     बागेश्वर     बागेश्वर जिला     ७,८०३
जनसंख्या २००१ की जनगणना के आधार पर

सरकार और राजनीति

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सुदर्शन सिंह रावत | उत्तराखण्ड सरकार की वर्तमान राज्यपाल है श्रीमती मार्गरेट अल्वा एवं मुख्यमन्त्री हैं डा. रमेश पोखरियाल।[१४] उन्हें २७ जून, २००९ को उत्तराखण्ड के तत्कालीन राज्यपाल बी॰ ऍल॰ जोशी द्वारा राज्य का पाँचवा मुख्यमन्त्री नियुक्त किया गया था। राज्य में अन्तिम चुनाव २१ फ़रवरी, २००७ को हुए थे। उन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ७०-सदस्यीय उत्तराखण्ड विधानसभा में ३४ सीटों से साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। बहुमत से एक सीट की कमी को पूरा करने के लिए भाजपा को उत्तराखण्ड क्रान्ति दल और तीन निर्दलियों का समर्थन लेना पड़ा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आधिकारिक विपक्षी दल है, जिसके पास २१ सीटे हैं।
राज्य की स्थापना से अब तक यहाँ पाँच मुख्यमन्त्री हुए है:
    नित्यानन्द स्वामी
    भगत सिंह कोश्यारी
    नारायण दत्त तिवारी
    भुवन चन्द्र खण्डूरी
    रमेश पोखरियाल निशंक

राज्य स्थापना से लेकर अब तक यहाँ चार राज्यपाल हुए है:
    सुरजीत सिंह बरनाला
    सुदर्शन अग्रवाल
    बी॰ ऍल॰ जोशी
    मार्गरेट अल्वा


मनेरगा मासिक प्रगति रिपोर्ट के जंजाल में फंसी

सुदर्शन सिंह रावत |  उत्तराखंड राज्य में भारत सरकार के महात्मा गांधी नेशनल ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट 'मनरेगा' की प्रगति भविष्य में  तकनीकी संजाल में फंस सकती है। केंद्र सरकार भविष्य में उन्हीं राज्यों को अगली किश्तें जारी करेगी जिनका एमआईएस अपडेट होगा। यह तभी संभव है जब ग्राम पंचायत स्तर पर ऑनलाइन फीडिंग की व्यवस्था हो, जो कम से कम साल भर तक उत्तराखंड में संभव नहीं है। केंद्र से जब  'मनरेगा' में  पैसा नहीं मिलेगा तो जाहिर है कि भारत सरकार द्वारा जो  मजदूरी  भी मजदूर/ग्रामीण को दिया जा रहा एमआईएस जब तक अपडेट नहीं होगा तब तक  नहीं मिलेगी। इसका सीधा असर मजदूर के पेट पर न पड़े इसलिए केंद्र सरकार एमआईएस और एमपीआर (मासिक प्रगति रिपोर्ट) के अंतर को फिलहाल नजर अंदाज कर रही है। दरअसल भारत सरकार ने यह गाइडलाइन बना दी है कि 'मनरेगा' के तहत खर्च होने वाली राशि और सृजित मानव दिवस के एमपीआर और एमआईएस डाटा में असमानता नहीं होनी चाहिए। एमपीआर के सापेक्ष खर्च और सृजित मानव दिवसों का अंतर तभी खत्म किया जा सकता है, जब ग्राम पंचायत स्तर पर ऑनलाइन फीडिंग की व्यवस्था हो। अभी राज्य में 'मनरेगा' के आंकड़े ब्लाक स्तर पर कंप्यूटर में तो फीड किये जा रहे हैं, लेकिन ऑनलाइन नहीं। ब्लाकों से ये कंप्यूट्रीकृत आंकड़े जिला मुख्यालयों पर सीडी या पेन ड्राइव में भेजे जाते हैं, जहां से इन्हें ऑनलाइन फीड किया जाता है। हालांकि राज्य शासन ने जिला स्तर पर अफसरों की नकेल कसने की कवायद छेड़ी है, लेकिन फिर भी तकनीकी दिक्कतें रुकावट बन सकती हैं। ग्राम्य विकास सचिव डॉ. राकेश कुमार लगातार इसका अनुश्रवण कर रहे हैं। इसके कुछ जिलों से बेहतर नतीजे मिलने शुरू भी हुए हैं। उत्तराखंड में 'मनरेगा' के तहत 19 जनवरी तक खर्च राशि का ब्यौरा एमपीआर के सापेक्ष एमआईएस में 67.51 फीसदी ऑनलाइन फीड हुआ। वहीं, सृजित मानव दिवस एमपीआर के सापेक्ष एमआईएस में 57.95 फीसदी फीड किये जा चुके हैं। उत्तराखंड में 19 जनवरी तक एमपीआर में 22529.22 लाख रुपये की राशि के सापेक्ष 15208.66 लाख रुपये के खर्च का ब्यौरा ऑनलाइन है हरिद्वार इस मामले में सबसे फिसड्डी है। यहां खर्च राशि का 39.44 फीसदी ब्यौरा ही एमआईएस में है। सृजित मानव दिवस तो 23.12 फीसदी ही आनलाइन हैं। उधमसिंह नगर ने खर्च राशि का 90 फीसदी और मानव दिवसों का 81 फीसदी से अधिक ब्यौरा दर्ज किया है। खर्च राशि के ब्यौरे को 50 फीसदी से अधिक ऑनलाइन दर्ज करने में नैनीताल, चमोली, देहरादून जिले हैं। उत्तरकाशी, चंपावत, टिहरी, बागेश्वर, पौड़ी, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ अपने आंकड़े 60 से 88 फीसदी तक ऑनलाइन कर चुके हैं

एक ही व्यक्ति बना 11 का प्रस्तावक

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पंचायत चुनाव में एक ही व्यक्ति चार प्रधान और सात पंचायत सदस्यों का प्रस्तावक बनाए जाने से ११ प्रत्याशियों का नामांकन निरस्त हो गए। नामांकन पत्रों की जांच पड़ताल के दौरान उजागर हुए इस पहलू के बाद निर्वाचन अधिकारी ने सभी प्रत्याशियों के नामांकन निरस्त करते हुए नोटिस जारी कर दिया है। दिलचस्प पहलू यह भी है कि निरस्त प्रपत्र में प्रस्तावक की पत्नी का नाम भी शामिल है। इससे गुस्साए प्रत्याशियों और उनके समर्थकाें ने तहसील में निर्वाचन अधिकारी का घिराव कर जबरदस्त हंगामा कर दिया।
गौरतलब है कि पंचायत चुनावों के मद्देनजर इन दिनों नामांकन पत्रों की जांच पड़ताल का काम जोर शोर से चल रहा था। बृहस्पतिवार को यह बात सामने आई थी कि लक्सर क्षेत्र के खेडीकलां निवासी जगपाल न सिर्फ अपनी पत्नी तारावती के चुनाव का प्रस्तावक बना बल्कि वह ग्राम प्रधान के चार तथा बीडीसी के सात सदस्यों का भी प्रस्तावक बन गया। निर्वाचन कानूनों के तहत कार्रवाई करते हुए निर्वाचन अधिकारी ने तमाम नामांकनों का न सिर्फ निरस्त कर दिया बल्कि उनको नोटिस भी जारी कर दिया गया । इसकी जानकारी प्रत्याशियों और उनके समर्थकाें को हुई तो इनमें अफरातफरी मच गई। आनन फानन में प्रत्याशी और उनके समर्थक तहसील पहुंच गए और नामांकन निरस्त होने को गैर कानूनी बताते हुए हंगामा कर दिया। अपने मंसूबों पर पानी फिरता देख गुस्साए प्रत्याशियों और उनके समर्थकाें ने निर्वाचन अधिकारी एमपी त्रिपाठी का भी घिराव कर दिया और नामांकन बहाल करने की मांग करने लगे। लेकिन, निवार्चन अधिकारी ने चुनाव प्रावधानों का हवाला देकर कोई भी कार्रवाई करने से साफ इंकार कर दिया। त्रिपाठी ने बताया कि इस संबंध में जिला निर्वाचन अधिकारी को रिपोर्ट प्रेषित कर दी गयी है।
जिला पंचायत की प्रत्येक सीट पर १३ प्रत्याशी मैदान में
जिला पंचायत चुनाव के रिटर्निंग ऑफीसर अनिल कुमार भोज ने बताया कि जिला पंचायत सदस्य पद के लिए कुल ६३८ नामांकन पत्र जमा कराए गए थे। जांच के दौरान आठ नामांकन पत्र निरस्त कर दिए गए थे। बाकी बचे ६३० प्रत्याशियों मेें से बृहस्पतिवार को ८१ ने अपने नाम वापस ले लिए। अब जिला पंचायत की प्रत्येक सीट पर औसतन १३ प्रत्याशी चुनाव मैदान में रह गए हैं।
प्रधान पद के २२ नामांकन निरस्त
रुड़की/लक्सर। रुड़की ब्लॉक में प्रधान पद के लिए आठ और क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए १३ नामांकन निरस्त किए गए हैं। जबकि लक्सर में प्रधानी के १४ और क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए पांच नामांकन अवैध ठहराए।
पंचायत चुनाव में नामांकन पत्रों की जांच का काम २४ जनवरी से शुरू हुआ था। दो दिन तक चले इसकी जांच में रुड़की ब्लॉक में प्रधान पद के लिए आठ नामांकन पत्र निरस्त किए गए। जिसमें नन्हेड़ा अन्नतपुर न्याय पंचायत से तीन, दौलतपुर न्याय पंचायत और पनियाला न्याय पंचायत से एक-एक तथा खंजरपुर न्याय पंचायत से तीन नामांकन पत्र निरस्त हुए हैं। क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए वार्ड एक से २० तक १० तथा २० से ४० वार्ड तक तीन नामांकन पत्रों समेत कुल १३ निरस्त हुए हैं। जबकि ग्राम पंचायत सदस्य पद के लिए कुल ७४ नामांकन पत्र निरस्त हुए हैं। लक्सर में प्रधानी के लिए १४ और क्षेत्र पंचायत सदस्य के लिए पांच नामांकन निरस्त हुए हैं। ग्राम पंचायत सदस्य पद के लिए ४८ नामांकन निरस्त हुए हैं।
रामपुर रायघटी में नहीं होगा प्रधानी का चुनाव
लक्सर। पंचायत चुनाव में ग्राम सभा रामपुर रायघटी को प्रधान पद का उम्मीदवार नहीं मिल सका। प्रधान के लिए मात्र दो सामान्य लोगों ने अपना नामांकन पत्र जमा कराया था। लेकिन, आरक्षित पद होने पर दोनों ही का नामांकन निरस्त कर दिया गया। रामपुर रायघटी पंचायत में प्रधान पद ओबीसी के लिए आरक्षित है। लेकिन किसी ओबीसी प्रत्याशी द्वारा नामांकन जमा नहीं कराया गया। दो सामान्य वर्ग के लोगों ने प्रधान पद की दावेदारी करते हुए नामांकन कराया था। लेकिन सीट आरक्षित होने से दोनों का नामांकन अवैध करार दिया गया। इस बाबत आरओ एमपी त्रिपाठी का कहना है कि इस सीट पर ओबीसी वर्ग का दावेदार नहीं होने से यहां पर प्रधान पद के लिए चुनाव नहीं हो सकेगा। रिक्त पद होने की स्थिति में प्रपत्र १३ के माध्यम से इसकी सूचना चुनाव आयोग को भेजी जाएगी। दूसरी और बाकरपुर में पति पत्नी एक दूसरे के प्रस्तावक बने गए। यह दोनों क्षेत्र पंचायत का चुनाव लड़ रहे हैं। एक दूसरे का प्रस्तावक बनने पर ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और इनका नामांकन निरस्त करने के लिए ब्लॉक कार्यालय में जमकर हंगामा किया।

प्रधान पद को १४४ नामांकन वापस
मगलौर। बृहस्पतिवार को नामांकन पत्र वापसी का दिन था। नारसन ब्लॉक में प्रधान पद के लिए ६७६ नामांकन पत्र संभावित उम्मीदवारों ने जमा कराए थे। लेकिन बृहस्पतिवार को १४४ लोगों ने अपने नामांकन वापस लिए है। अब पूरे ब्लाक में प्रधान पद के लिए ४२७ उम्मीदवार पंचायत चुनाव में अपने जौहर दिखाएंगे। क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए ४६२ लोगों ने नामांकन पत्र जमा कराए थे। क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए ७४ लोगों ने नामांकन वापस लिया है। अब क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के लिए ३८८ लोग अपना भाग्य आजमाएंगे। वहीं ग्राम पंचायत सदस्य पद के लिए जमा हुए १४७६ में से मात्र ७१ नामांकन ही वापस लिए गए है।
नगला में बनेगा निर्विरोध प्रधान
मंगलौर। नगला सलारु गांव की प्रधान निर्विरोध चुनी जाएंगी। इस पद के लिए मात्र एक ही उम्मीदवार का नामांकन पत्र जमा हो सका था। इसलिए महिला उम्मीदवार निर्विरोध प्रधान चुनी जाएंगी। नगला सलारु गांव में प्रधान पद की सीट महिला पिछड़ा वर्ग में शामिल थी। प्रधान पद के लिए केवल कमलेश पत्नी तेजपाल का नामांकन पत्र ही प्रधान पद के लिए जमा कराया गया था। इस सीट पर किसी अन्य द्वारा नामांकन पत्र जमा नहीं कराया गया था। जिसके कारण इस पंचायत में प्रधानी पद का रास्ता साफ हो गया है। इससे पंचायत के लोगों में उत्साह है। सभी का कहना है कि इससे क्षेत्र का ज्यादा विकास होगा। 
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द्वितीय राजभाषा को पुष्पित करें संस्कृतज्ञ

उत्तरांचल संस्कृत अकादमी की ओर से संस्कृत भवन में बृहस्पतिवार को राष्ट्रीय संस्कृत कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। शाम तक चले कवि सम्मेलन में कवियों ने राष्ट्रभक्ति और संस्कृत सेवापरक सरस कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कवि सम्मेलन का शुभारंभ अतिथियों और आयोजकों ने दीप प्रज्जवलित कर किया। काव्य पाठ प्रारंभ करने से पहले आंध्रप्रदेश से आए संस्कृत विद्वान शतावधानी डा. दौर्बल प्रभाकर शर्मा ने कहा कि उत्तराखंड सरकार ने संस्कृत को द्वितीय राजभाषा घोषित किया गया है, अब इसे पल्लवित और पुष्पित करने का काम संस्कृतज्ञों का है। उन्होंने उपस्थित कवियों और विद्वानों की ओर से पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी दिए। काव्य पाठ प्रारंभ करते हुए आचार्य बुद्धिवल्लभ शास्त्री ने भ्रष्टाचारिगणानां तंत्रं भारतीयगणतंत्रम् कविता के माध्यम से बताया कि किस प्रकार भ्रष्टाचारी लोग हमारे देश को खोखला कर रहे हैं। डा. रामेश्वर दत्त शर्मा ने अंतः काकाः बहिः हंसाः धूर्ताः जानंति वशीकरणमंत्रान् कविता के माध्यम से बताया कि आजकल सज्जनता को नष्ट कर धूर्तता अपने पांव फैला रही है। उत्तरांचल संस्कृत अकादमी के सचिव डा. बुद्धदेव शर्मा ने प्रियैषा संस्कृता भाषा सदा सर्वैः जनैः सेव्या के माध्यम से कहा कि हमारा लक्ष्य है कि संस्कृत भारत राष्ट्रभाषा बने। उत्तराखंड संस्कृत विवि के सहायक आचार्य डा. अरविंद नारायण मिश्र ने सर्वमपि, दृष्टं मेलायाम् पंक्तियों के माध्यम से विश्व संस्कृत पुस्तक मेले की विशेषताओं का वर्णन किया।
इनके अलावा डा. प्रशस्यमित्र शास्त्री, डा. जनार्दन प्रसाद पांडेय, डा. नरेश बत्रा, प्रो. बलेदवानंद सागर, डा. जीतराम, डा. प्रकाश पंत, डा. नवलता और जगदीश चंद्र सेमवाल आदि ने भी काव्यपाठ किया।
इस अवसर पर दिल्ली संस्कृत अकादमी के उपाध्यक्ष डा. श्रीकृष्ण सेमवाल, हरियाणा संस्कृत अकादमी के निदेशक प्रो. रामेश्वरदत्त शर्मा, उत्तराखंड संस्कृत विवि की कुलपति डा. सुधा पांडे, रत्नेश सिंह, डा. हरीश गुरुरानी, देवीप्रसाद उनियाल आदि उपस्थित थे। 
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आदमखोर बाघ मारा गया

उत्तराखंड के रामनगर में वन विभाग के शिकारी दल की गोली से नरभक्षी नर बाघ मारा गया.
ऋषिकेश के रामनगर वन प्रभाग के कुनखेत में गुरुवार दोपहर वन विभाग के शिकारी दल ने नरभक्षी नर बाघ को गोली से मार गिराया. मृत बाघ सात-आठ वर्ष का बताया गया है.
रामनगर वन प्रभाग के डीएफओ रविन्द्र जुयाल ने इसकी पुष्टि की है और बताया है कि इस बाघ ने 26 जनवरी की शाम को रामनगर के मालधन क्षेत्र के 27 वर्षीय पूरणचंद को निवाला बनाया था. उसकी दो टांगें गुरुवार को कुनखेत के जंगल में मिली.
घटनास्थल के आसपास तलाशी में जुटी कार्बेट टाइगर रिजर्व की चार पालतू हथिनियों ने नरभक्षी बाघ को घटनास्थल से सौ मीटर दूर झाड़ियों में खोजकर बाहर खदेड़ा. तभी शिकारियों ने बारह राउंड फायर दागे और नरभक्षी बाघ का अंत कर दिया.
इसमें कुछ पालतू हाथी भी बाघ के हमले में घायल हुए हैं. नरभक्षी बाघ के शव को कार्बेट निदेशालय के परिसर में ले आया गया है, जिसे देखने के लिए वहां हजारों लोग जमा हैं. मृत बाघ के पिछले एक पांव में पुराने घाव भी बताये जा रहे हैं. पोस्टमार्टम की व्यवस्था की जा रही है.
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भिखारियों की फौज पहुंची उत्तराखंड के छोटे- छोटे कस्बों में

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 सोनिया रावत |  उत्तराखंड के छोटे -छोटे कस्बो और शहरों में भी महानगरों की की तर्ज पर भिखारियों ने, डेरा डालना शुरू कर दिया है। भिकारियों ने श्रीनगर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में सक्रिय होकर लोगों का सड़क पर निकलना मुश्किल कर दिया है। भिखारियों ने अपने छोटे- छोटे समूह बना लिए है | इन समूहों में शामिल छोटे-छोटे बच्चे चंद पैसों के लिए पैर पकड़ने और कपड़े खींचने से भी नहीं चूक रहे हैं। कुछ समय पहले तक पहाड़ों में चंद घर-घर जाकर मांगने वाले गरीब व असहाय किस्म के भिखारी ही देखने को मिलते थे, लेकिन, बदलते वक्त के साथ-साथ यहां भी मैदानी नगरों के भिखारियों ने जाल फैलाना शुरु कर दिया है। अकेले श्रीनगर क्षेत्र में ही पिछले दिनों से करीब दो सौ भिखारियों की फौज पहुंची। इसमें बड़े-बूढ़े से लेकर महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। 
बड़े, बूढ़े और महिलाएं घर-घर जाकर भीख मांग रही है और बच्चे सड़क पर घूम-घूमकर पैसे जमा मांग रहे हैं। आलम यह है कि सरकारी कार्यालयों, अस्पताल, विश्वविद्यालय परिसर समेत तमाम जगहों पर इनकी अच्छी खासी तादाद को देखा जा सकता है। भीख मांगने में पारंगत यह बंच्चे पैसों के लिए लोगों के पैर पकड़ने से लेकर कपड़े खींचने तक में नहीं हिचकिचाते। इसके कारण लोगों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं इनके कारण क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगने लगे हैं। वहीं प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार इनके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार पुलिस का है। 'भिखारियों के क्षेत्र में पहुंचने का मामला संज्ञान में नहीं है। हम तुरंत उन क्षेत्रों में जाकर आगे की कार्रवाई करेंगे। गणतंत्र दिवस को देखते हुए यह मामला सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है|

Friday, January 28, 2011

कोटद्वार में बनेगा आयुष शोध संस्थान

आयुर्वेद के जनक महर्षि चरक की कर्मस्थली 'चरेख डांडा' में शासन ने गत वर्ष भले ही अंतर्राष्ट्रीय आयुर्वेदिक आयुष संस्थान खोलने की घोषणा की हो, पर चरेख में संस्थान के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध न होने से अब शासन ने चरेख में संस्थान की इकाई खोलने की निर्णय लिया है। संस्थान की स्थापना कोटद्वार व आसपास के क्षेत्रों में होगी। इसके लिए क्षेत्र में 50 एकड़ भूमि की तलाश शुरू कर दी गई है।
गत वर्ष जून माह में प्रदेश सरकार ने 'चरेख डांडा' में अंतर्राष्ट्रीय आयुष शोध संस्थान बनाने की घोषणा की। शासन के निर्देश पर चरेख डांडा में संस्थान खोलने को भूमि की तलाश भी शुरू कर दी गई। प्रशासन ने चरेख डांडा में 'देवता तोक' नामक स्थान पर भूमि का चयन कर लिया। चयनित भूमि में से कुछ भूमि केसर-हिंद भूमि थी, जबकि कुछ ग्रामीणों की नापभूमि थी। प्रशासन ने भूमि चयन संबंधी रिपोर्ट शासन को भेज दी है। इसके बाद शासन की टीम ने चयनित भूमि का स्थीय निरीक्षण किया और चयनित भूमि को अपर्याप्त बताते हुए आवश्यक भूमि उपलब्ध कराने की मांग प्रशासन से की।
उधर, टीम के दौरे के बाद ग्रामीणों का मन भी बदल गया और ग्रामीण भूमि देने में आनाकानी करने लगे। उनका कहना था कि देवता तोक के इर्द-गिर्द की तमाम भूमि उपजाऊ है और इस भूमि में पैदा फल-सब्जी उनकी आर्थिकी का मुख्य जरिया है। इधर, शासन ने गत सितंबर माह में चरेख डांडा में पर्याप्त भूमि न मिलने की स्थिति में कोटद्वार व आसपास के क्षेत्रों में संस्थान की स्थापना को भूमि तलाश के निर्देश दे दिए। प्रमुख सचिव राजीव गुप्ता की ओर से 30 सितंबर को डीएम को प्रेषित पत्र में अंतर्राष्ट्रीय आयुष शोध संस्थान की इकाई स्थापित करने को चरेख डांडा में दस हेक्टेयर भूमि व विस्तृत अंतर्राष्ट्रीय आयुष शोध संस्थान की स्थापना को कोटद्वार व आसपास के क्षेत्रों में 50 एकड़ भूमि चयनित करने के निर्देश दे दिए।
गुरुवार को एसडीएम जीसी गुणवंत ने चरेख का दौरा किया और ग्रामीणों से वार्ता कर दस हेक्टेयर भूमि का चयन किया। ग्रामीण भी देवता तोक से सटे झंपो, पालीबाटा व भदवाड़ तोक में अपनी नापभूमि देने में रजामंद हो गए हैं।
क्या कहते हैं अधिकारी
चरेख डांडा में अंतर्राष्ट्रीय आयुष शोध संस्थान की इकाई के लिए भूमि चयनित होने के उपरांत कोटद्वार में विस्तृत अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान के लिए भूमि की तलाश शुरू कर दी जाएगी। इस संबंध में एसडीएम (कोटद्वार) को भूमि उपलब्ध कराने को कहा गया है।
-डॉ. पीडी चमोली, जिला आयुर्वेद अधिकारी
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उत्तराखण्ड का भोगोल भाग - दो

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सुदर्शन सिंह रावत | इस प्रदेश की नदियाँ भारतीय संस्कृति में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उत्तराखण्ड अनेक नदियों का उद्गम स्थल है। यहाँ की नदियाँ सिंचाई व जल विद्युत उत्पादन का प्रमुख संसाधन है। इन नदियों के किनारे अनेक धार्मिक व सांस्कृतिक केन्द्र स्थापित हैं। हिन्दुओं की पवित्र नदी गंगा का उद्गम स्थल मुख्य हिमालय की दक्षिणी श्रेणियाँ हैं। गंगा का प्रारम्भ अलकनन्दा व भागीरथी नदियों से होता है। अलकनन्दा की सहायक नदी धौली, विष्णु गंगा तथा मंदाकिनी है। गंगा नदी, भागीरथी के रुप में गौमुख स्थान से २५ कि.मी. लम्बे गंगोत्री हिमनद से निकलती है। भागीरथी व अलकनन्दा देव प्रयाग संगम करती है जिसके पश्चात वह गंगा के रुप में पहचानी जाती है। यमुना नदी का उद्गम क्षेत्र बन्दरपूँछ के पश्चिमी यमनोत्री हिमनद से है। इस नदी में होन्स, गिरी व आसन मुख्य सहायक हैं। राम गंगा का उद्गम स्थल तकलाकोट के उत्तर पश्चिम में माकचा चुंग हिमनद में मिल जाती है। सोंग नदी देहरादून के दक्षिण पूर्वी भाग में बहती हुई वीरभद्र के पास गंगा नदी में मिल जाती है। इनके अलावा राज्य में काली, रामगंगा, कोसी, गोमती, टोंस, धौली गंगा, गौरीगंगा, पिंडर नयार(पूर्व) पिंडर नयार (पश्चिम) आदि प्रमुख नदियाँ हैं।[९]
हिमशिखर
हिमालयी श्रृंखला का उत्तराखण्डी शिखर
राज्य के प्रमुख हिमशिखरों में गङ्गोत्री (६६१४ मी.), दूनगिरि (७०६६), बन्दरपूँछ (६३१५), केदारनाथ (६४९०), चौखम्बा (७१३८), कामेट (७७५६), सतोपन्थ (७०७५), नीलकण्ठ (५६९६), नन्दा देवी (७८१८), गोरी पर्वत (६२५०), हाथी पर्वत (६७२७), नंदा धुंटी (६३०९), नन्दा कोट (६८६१) देव वन (६८५३), माना (७२७३), मृगथनी (६८५५), पंचाचूली (६९०५), गुनी (६१७९), यूंगटागट (६९४५) हैं।[९]
हिमनद
राज्य के प्रमुख हिमनदों में गंगोत्री, यमुनोत्री, पिण्डर, खतलिगं, मिलम, जौलिंकांग, सुन्दर ढूंगा इत्यादि आते हैं।[९]
झीलें
राज्य के प्रमुख तालों व झीलों में गौरीकुण्ड, रूपकुण्ड, नन्दीकुण्ड, डूयोढ़ी ताल, जराल ताल, शहस्त्रा ताल, मासर ताल, नैनीताल, भीमताल, सात ताल, नौकुचिया ताल, सूखा ताल, श्यामला ताल, सुरपा ताल, गरूड़ी ताल, हरीश ताल, लोखम ताल, पार्वती ताल, तड़ाग ताल (कुमाऊँ क्षेत्र) इत्यादि आते हैं।[९]
दर्रे
उत्तराचंल के प्रमुख दर्रों में बरास- ५३६५ मी.,(उत्तरकाशी), माना - ६६०८ मी.(चमोली), नोती-५३००मी. (चमोली), बोल्छाधुरा- ५३५३मी.,(पिथौरागड़), कुरंगी-वुरंगी-५५६४ मी.( पिथौरागड़), लोवेपुरा-५५६४ मी. (पिथौरागड़), लमप्याधुरा-५५५३ मी. (पिथौरागढ़), लिपुलेश-५१२९ मी. (पिथौरागड़), उंटाबुरा, थांगला, ट्रेलपास, मलारीपास, रालमपास, सोग चोग ला पुलिग ला, तुनजुनला, मरहीला, चिरीचुन दर्रा आते हैं।[९]
मौसम
उत्तराखण्ड का मौसम दो भागों में विभाजित किया जा सकता है: पर्वतीय और कम पर्वतीय या समतलीय। उत्तर और उत्तरपूर्व में मौसम हिमालयी उच्च भूमियों का प्रतीकात्मक है, जहाँ पर मॉनसून का वर्ष पर बहुत प्रभाव है। राज्य में वार्षिक औसत वर्षा वर्ष २००८ के आंकड़ों के अनुसार १६०६ मि.मी. हुई थी। अधिकतम तापमान पंतनगर में ४०.२ डिग्री से. (२००८) अंकित एवं न्यूनतम तापमान -५.४ डिग्री से. मुक्तेश्वर में अंकित है।

उत्तराखण्ड का भूगोल

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सुदर्शन सिंह रावत | उत्तराखण्ड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल २८° ४३’ उ. से ३१°२७’ उ. और रेखांश ७७°३४’ पू से ८१°०२’ पू के बीच में ५३,४८३ वर्ग किमी है, जिसमें से ४३,०३५ कि.मी.२ पर्वतीय है और ७,४४८ कि.मी.२ मैदानी है, तथा ३४,६५१ कि.मी.२ भूभाग वनाच्छादित है।[१३] राज्य का अधिकांश उत्तरी भाग वृहद्तर हिमालय श्रृंखला का भाग है, जो ऊँची हिमालयी चोटियों और हिमनदियों से ढका हुआ है, जबकि निम्न तलहटियाँ सघन वनों से ढकी हुई हैं जिनका पहले अंग्रेज़ लकड़ी व्यापारियों और स्वतन्त्रता के बाद वन अनुबन्धकों द्वारा दोहन किया गया। हाल ही के वनीकरण के प्रयासों के कारण स्थिति प्रत्यावर्तन करने में सफलता मिली है। हिमालय के विशिष्ठ पारिस्थितिक तन्त्र बड़ी संख्या में पशुओं (जैसे भड़ल, हिम तेंदुआ, तेंदुआ, और बाघ), पौंधो, और दुर्लभ जड़ी-बूटियों का घर है। भारत की दो सबसे महत्वपूर्ण नदियाँ गंगा और यमुना इसी राज्य में जन्म लेतीं हैं, और मैदानी क्षेत्रों तक पहुँचते-२ मार्ग में बहुत से तालाबों, झीलों, हिमनदियों की पिघली बर्फ से जल ग्रहण करती हैं।
फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
उत्तराखण्ड, हिमालय श्रृंखला की दक्षिणी ढलान पर स्थित है, और यहाँ मौसम और वनस्पति में ऊँचाई के साथ-२ बहुत परिवर्तन होता है, जहाँ सबसे ऊँचाई पर हिमनद से लेकर निचले स्थानों पर उपोष्णकटिबंधीय वन हैं। सबसे ऊँचे उठे स्थल हिम और पत्थरों से ढके हुए हैं। उनसे नीचे, ५,००० से ३,००० मीटर तक घासभूमि और झाड़ीभूमि है। समशीतोष्ण शंकुधारी वन, पश्चिम हिमालयी उपअल्पाइन शंकुधर वन, वृक्षरेखा से कुछ नीचे उगते हैं। ३,००० से २,६०० मीटर की ऊँचाई पर समशीतोष्ण पश्चिम हिमालयी चौड़ी पत्तियों वाले वन हैं जो २,६०० से १,५०० मीटर की उँचाई पर हैं। १,५०० मीटर से नीचे हिमालयी उपोष्णकटिबंधीय पाइन वन हैं। उचले गंगा के मैदानों में नम पतझड़ी वन हैं और सुखाने वाले तराई-दुआर सवाना और घासभूमि उत्तर प्रदेश से लगती हुई निचली भूमि को ढके हुए है। इसे स्थानीय क्षेत्रों में भाभर के नाम से जाना जाता है। निचली भूमि के अधिकांश भाग को खेती के लिए साफ़ कर दिया गया है।
भारत के निम्नलिखित राष्ट्रीय उद्यान इस राज्य में हैं, जैसे जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (भारत का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान) रामनगर, नैनीताल जिले में, फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान और नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान, चमोली जिले में हैं और दोनो मिलकर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं, राजाजी राष्ट्रीय अभ्यारण्य हरिद्वार जिले में, और गोविंद पशु विहार और गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान उत्तरकाशी जिले में हैं। 


शहीदों के बलिदानों को किया याद

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सुदर्शन सिंह रावत | पिथौरागढ़ | सीमांत जिले में गणतंत्र दिवस धूमधाम से मनाया गया। पूरे जिले में प्रभात फेरियां निकाली गई। दिनभर  सांस्कृतिक आयोजन और खेलकूद प्रतियोगिताएं हुई। जिला पुलिस लाइन में भी आकर्षक परेड का आयोजन किया गया | 
पुलिस लाइन में जिले के प्रभारी मंत्री भौर्याल ने झंडारोहण किया और परेड की सलामी ली। उन्होंने कहा कि उन शहीदों को हमेशा याद रखा जाना चाहिए जिनके बलिदान से इस गणतंत्र की स्थापना हो सकी। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों व उनकी विधवाओं, उत्कृष्ठ कार्य करने वाले पुलिस कर्मियों और राष्ट्रीय स्तर पर जनपद का नाम गौरवान्वित करने वाले खिलाडि़यों को भी सम्मानित किया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ और आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा भूकंप से संबंधित मॉक ड्रिल किया गया। जिला कार्यालय में जिलाधिकारी एनएस नेगी ने ध्वजारोहण कर गणतंत्र का संकल्प दोहराया। अपर जिलाधिकारी विनोद गिरी गोस्वामी, उप जिलाधिकारी आरडी पालीवाल उपस्थित थे। संचालन प्रवीण डीनिया ने किया। गणतंत्र दिवस पर विभिन्न विभागों द्वारा सरकारी योजनाओं पर आधारित झांकी निकालकर लोगों को जानकारियां दी गई। नगर पालिका सभागार में विद्यार्थियों की शिक्षणेत्तर प्रतियोगिताएं कराई गई। रामलीला मैदान पर बेबी शो प्रतियोगिता कराई गई। जिला आयकर कार्यालय में आयकर अधिकारी इस्तफा अली खां ने झंडारोहण किया। उन्होंने लोगों से पूरी निष्ठा के साथ देश के विकास के लिए कार्य करने का आह्वान किया। अधिवक्ता आरसी जोशी, नगेन्द्र सिंह कुंवर उपस्थित थे। राजकीय इंटर कालेज आठगांवशिलिंग में प्रधानाचार्य डा. चंद्रशेखर जोशी ने झंडारोहण किया। मुख्य अतिथि रति बिष्ट ने विद्यार्थियों से अनुशासित होकर आगे बढ़ने का आह्वान किया। कर्नल एमएस वल्दिया, पीटीए अध्यक्ष केशर सिंह वल्दिया उपस्थित थे। इंटर कालेज बीसाबजेड़ में प्रबंध समिति अध्यक्ष बहादुर सिंह सौन की अध्यक्षता में ध्वजारोहण प्रबंधक देवेन्द्र भट्ट ने किया। राजकीय पालीटेक्निक कनालीछीना में प्रधानाचार्य सुमित कुमार सिंह ने झंडारोहण किया। विद्यार्थियों ने परिसर में सफाई अभियान चलाया। आइटीबीपी की 14वीं वाहिनी में वरिष्ठ चिकित्साधिकारी डा. पदमा भट्ट ने झंडारोहण किया। उन्होंने जवानों को उन शहीदों की याद दिलाई जिनकी शहादत से देश को आजादी मिली। वाहिनी परिसर में विभिन्न खेल प्रतियोगिताएं हुई। विजेताओं को डा. भट्ट ने पुरस्कृत किया।
धारचूला: तहसील पर उप जिलाधिकारी डा. अभिषेक त्रिपाठी, धौली गंगा जल विद्युत परियोजना में महाप्रबंधक एस कालगांवकर, विकासखंड में लक्ष्मण सिंह बोरा और उद्योग व्यापार मंडल अध्यक्ष बीएस थापा ने झंडारोहण किया। इससे पूर्व जीआइसी, जीजीआइसी, रं कम्युनिटी स्कूल, मिशन स्कूल, नेशनल पब्लिक स्कूल, प्राइमरी पाठशाला बूंदी, नाभी, गुंजी, रांगकांग, गायत्री विद्या मंदिर, हाट देवल के बच्चों ने नगर में प्रभातफेरी निकाली। उनको स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. जोगा सिंह मर्तोलिया द्वारा दिये गये कोष से मिष्ठान वितरित किया गया। तहसील रोड पर सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। मुख्य अतिथि एसडीएम अभिषेक त्रिपाठी, विशिष्ट अतिथि नगर पंचायत अध्यक्ष अशोक नबियाल, उद्योग व्यापार मंडल अध्यक्ष बीएस थापा, नवीन खर्कवाल, महिराज गब्र्याल उपस्थित थे। समापन पर पुरस्कार बांटे गये। नगर में बैडमिंटन प्रतियोगिता का आयोजन हुआ।
गंगोलीहाट: तहसील पर एसडीएम पीसी दुम्का ने झंडारोहण किया। ब्लाक में प्रमुख कमला वर्मा व खंड विकास अधिकारी गोपाल गिरी गोस्वामी, स्वास्थ्य केन्द्र में डा. एमएस रावत और जीआइसी में प्रधानाचार्य बीपी पांडेय ने झंडारोहण किया। उधर गणाई में भाजपा व कांग्रेस ने भी पार्टी कार्यालयों में झंडे फहराए। विभिन्न विद्यालयों में सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं हुई।
डीडीहाट: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देव सिंह डसीला ने रामलीला मैदान में आयोजित समारोह में झंडारोहण किया। उप जिलाधिकारी बीएल राणा, तहसीलदार अवधेश कुमार, प्रमुख हरेन्द्र चुफाल, नपं अध्यक्षा मुन्नी देवी, एड. रघुनाथ चौहान, कांग्रेस जिलाध्यक्ष पुष्पा देऊपा, दीवान भंडारी, धन सिंह कफलिया, कै. लक्ष्मण जंगपांगी, दान सिंह खड़ायत, प्रमोद दिगारी, गोविन्द बल्लभ भट्ट, लोकेश भड़, किशोर जंगपांगी, अजीत डसीला, मीनाक्षी पांगती, डिगर खड़ायत, गंगा सिंह, सत्यवान मर्तोलिया आदि मौजूद थे।
मुनस्यारी: तहसील पर उप जिलाधिकारी जेएस राठौर ने झंडारोहण किया। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। सामाजिक कार्यकर्ता कुंदन सिंह टोलिया और कुंदन सिंह पांगती ने निर्धन लोगों में कंबल बांटे। इसके अलावा खेलकूद प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गई। रस्साकशी में महिला मंगल दल घोरपट्टा और पुरुष वर्ग की प्रतियोगिता में ब्लाक कार्यालय के कर्मचारी अव्वल रहे। डा.हेमंत मर्तोलिया, डा. आकोटी, श्रीराम धर्मशक्तू, डा.कैलाश बृजवाल, डा.रेनी पांगती, प्रधान संगठन अध्यक्ष देवेन्द्र सिंह, हयात राम, तुलसी देवी, बाला सिंह, किशन बृजवाल, सुरेन्द्र बृजवाल, सुरेन्द्र बृजवाल, मनोज धर्मशक्तू, दीपू बृजवाल, अमर सिंह कोरंगा मौजूद थे।
बेरीनाग: ब्लाक में खंड विकास अधिकारी रमेश राम आर्या, तहसील में प्रभारी तहसीलदार एमएस नयाल, एसबीआई शाखा प्रबंधक एलएस मपवाल, जल संस्थान में अवर अभियंता महेश रौतेला, थाना परिसर में निरीक्षक बीसी पंत ने झंडारोहण किया। क्षेत्रीय युवक समिति ने अध्यक्ष प्रदीप महरा के नेतृत्व में सफाई अभियान चलाया। जल संरक्षण व पौधरोपण को लेकर भी कार्यक्रम आयोजित हुए। विभिन्न स्कूलों में बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए।
110 वर्षीय बाबा बनखंडी ने किया झंडारोहण

पिथौरागढ़: असुरचूला मंदिर परिसर में 110 वर्षीय बाबा बिरजानंद सरस्वती उफ बनखंडी बाबा ने झंडारोहण किया। उन्होंने भारत के गणतंत्र को महान बताते हुए कहा कि दुनिया के लिए भारत का गणतंत्र एक मिसाल है।

समृद्धि के द्वार खोलेगी सतावर की खेती

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सतावर की खेती राज्य के किसानों के लिए समृद्धि के द्वार खोल रही है। फार्मा कंपनियों में इसके बढ़ते उपयोग के कारण बाजार में इसकी खासी मांग है। राज्य के मैदानी क्षेत्रों के साथ-साथ पहाड़ी क्षेत्रों में भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। हाई एप्टीट्यूड प्लान्ट फिजियोलॉजी और रिसर्च सेंटर (हेप्रेक) के विशेषज्ञ पहाड़ों के लिए अनुकूल सतावर की किस्मों पर काम कर रहे हैं।
600 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर उगने वाली सतावर का बॉटनिकल नाम स्प्रेगस रेसीमोसस है। मूली के आकार का दिखने वाली सतावर का प्रयोग पशुओं की दवा, महिलाओं की दवा और शक्तिव‌र्द्धक दवाओं को बनाने में किया जाता है। महिलाओं की एनीमिया, हार्मोनल डिसऑडर और संतानोंत्पत्ति सम्बन्धी बीमारियों में इसका प्रयोग लाभकारी है। आयुर्वेद में इसका उपयोग वात पित्त और कफ में लाभकारी बताया जाता है। नारायण तेल, विष्णु तेल जैसे आयुर्वेदिक उत्पादों में इसका बहुतायत से प्रयोग किया जाता है। इसकी कोंपलों का सूप शक्तिव‌र्द्धक माना जाता है और बड़े-बड़े होटलों में महंगे दामों पर बिकता है। वर्तमान में पूरे देश में सतावर की सालाना मांग दो हजार से पांच हजार मीट्रिक टन तक है। जबकि इसके आधे का उत्पादन भी नहीं हो पा रहा है। सतावर की अधिकांश आपूर्ति नेपाल से की जाती है। राज्य के नेपाल सीमा से लगे टनकपुर, वनवसा, चंपावत और उधमसिंहनगर के कई हिस्सों में इसकी खेती की जा रही है। इसकी एक फसल के तैयार होने में 18 से 20 माह तक का समय लगता है। हेप्रेक के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. विजयकांत पुरोहित, रिसर्च एसोसिएट डॉ. राजीव वशिष्ठ और डॉ. राजेन्द्र चौहान राज्य के उच्च शिखरीय क्षेत्रों में सतावर समेत अन्य जड़ी बूटियों की खेती पर कार्य कर रहे हैं। उनके अनुसार राज्य में सतावर की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं। राज्य के तेज धूप वाली ढ़लानों पर जहां औसत तापमान 20 से 35 डिग्री के बीच होता है, वहां इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। कच्चा सतावर प्रतिकिलो 50 से 70 रुपए में बिक रहा है। जबकि उबालकर सुखाया और साफ किया गया पीला सतावर 300 से 500 रुपए प्रतिकिलो बिक रहा है। डाबर इंडिया लिमिटेड, इंडिया ह‌र्ब्स, रामनगर मोहान की इंडियन मेडिसनल फार्मास्यूटिकल कंपनी लिमिटेड और सहारनपुर की हर्बल ड्रग कंपनी राज्य से सतावर खरीद रही है।
'राज्य में सतावर की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं। इसके अच्छे दामों के कारण किसान भी इसकी खेती में रुचि ले रहे हैं। राष्ट्रीय जड़ी बूटी मिशन के अंतर्गत इसकी खेती के लिए चार से 20 लाख रुपए का अनुदान भी दिया जा रहा है।' - डॉ. विजयकांत पुरोहित, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी हेप्रेक
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उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का इतिहास

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उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन, उत्तराखण्ड राज्य के बनने से पहले की वे घटनाएँ है जो अन्ततः उत्तराखण्ड राज्य के रूप में परिणित हुईं। राज्य का गठन १ नवंबर, २००० को भारत के सत्ताइसवें राज्य के रूप में हुआ। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन बहुत लम्बे संघर्ष और बलिदानों के फलस्वरूप हुआ। उत्तराखण्ड राज्य की माँग सर्वप्रथम १८९७ में उठी और धीरे-धीरे यह माँग अनेक समयों पर उठती रही।१९९४ में इस माँग ने जनान्दोलन का रूप ले लिया और आखिरकार नियत तिथि पर यह देश का सत्ताइसवाँ राज्य बना।

संक्षिप्त इतिहास

उत्तराखण्ड संघर्ष से राज्य के गठन तक जिन महत्वपूर्ण तिथियों और घटनाओं मुख्य ने भूमिका निभाई वे इस प्रकार हैं -
    * आधिकारिक सूत्रों के अनुसार मई १९३८ में तत्कालीन ब्रिटिश शासन मे गढ़वाल के श्रीनगर में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय लेने तथा अपनी संस्कृति को समृद्ध करकने के आंदोलन का समर्थन किया।
    * सन् १९४० में हल्द्वानी सम्मेलन में बद्रीदत्त पाण्डेय ने पर्वतीय क्षेत्र को विशेष दर्जा तथा अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने कुमाऊँ-गढ़वाल को पृथक इकाई के रूप में गठन की मांग रखी। १९५४में विधान परिषद के सदस्य इन्द्रसिंह नयाल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत से पर्वतीय क्षेत्र के लिये पृथक विकास योजना बनाने का आग्रह किया तथा १९५५ में फजल अली आयोग ने पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य के रूप में गठित करने की संस्तुति की।
    * वर्ष १९५७ में योजना आयोग के उपाध्यक्ष टीटी कृष्णमाचारी ने पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं के निदान के लिये विशेष ध्यान देने का सुझाव दिया। १२ मई १९७० को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं का निदान राज्य तथा केन्द्र सरकार का दायित्व होने की घोषणा की और २४ जुलाई १९७९ में पृथक राज्य के गठन के लिये मसूरी में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल की स्थापना की गई। जून १९८७ में कर्ण प्रयाग के सर्वदलीय सम्मेलन में उत्तराखण्ड के गठन के लिये संघर्ष का आह्वान किया तथा नवंबर १९८७ में पृथक उत्तराखण्ड राज्य के गठन के लिये नई दिल्ली में प्रदर्शन और राष्ट्रपति को ज्ञापन एवं हरिद्वार को भी प्रस्तावित राज्य में सम्मिलित् करने की मांग की गई।
    * १९९४ उत्तराखण्ड राज्य एवं आरक्षण को लेकर छात्रों ने सामूहिक रूप से आन्दोलन किया। मुलायम सिंह यादव के उत्तराखण्ड विरोधी वक्तव्य से क्षेत्र में आन्दोलन तेज हो गया। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के नेताओं ने अनशन किया। उत्तराखण्ड में सरकारी कर्मचारी पृथक राज्य की मांग के समर्थन में लगातार तीन महीने तक हड़ताल पर रहे तथा उत्तराखण्ड में चक्काजाम और पुलिस फायरिंग की घटनाएं हुई। उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों पर मसूरी और खटीमा में पुलिस द्वारा गोलियां चलायीं गईं। संयुक्त मोर्चा के तत्वाधान में २ अक्टूबर, १९९४ को दिल्ली में भारी प्रदर्शन किया गया। इस संघर्ष में भाग लेने के लिये उत्तराखण्ड से हजारों लोगों की भागीदारी हुई। प्रदर्शन में भाग लेने जा रहे आन्दोलनकारियों को मुजफ्फर नगर में बहुत पेरशान किया गया और उन पर पुलिस ने फायिरिंग की और लाठिया बरसाईं तथा महिलाओं के साथ अश्लील व्यहार और अभद्रता की गयी। इसमें अनेक लोग हताहत और घायल हुए। इस घटना ने उत्तराखण्ड आन्दोलन की आग में घी का काम किया। अगले दिन तीन अक्टूबर को इस घटना के विरोध में उत्तराखण्ड बंद का आह्वान किया गया जिसमें तोड़फोड़ गोलाबारी तथा अनेक मौतें हुईं।
    * ७ अक्टूबर, १९९४ को देहरादून में एक महिला आन्दोलनकारी की मृत्यु हो हई इसके विरोध में आन्दोलनकारियों ने पुलिस चौकी पर उपद्रव किया।
    * १५ अक्टूबर को देहरादून में कर्फ्यू लग गया और उसी दिन एक आन्दोलनकारी शहीद हो गया।
    * २७ अक्टूबर, १९९४ को देश के तत्कालीन गृहमंत्री राजेश पायलट की आन्दोलनकारियों की वार्ता हुई। इसी बीच श्रीनगर में श्रीयंत्र टापू में अनशनकारियों पर पुलिस ने बर्बरतापूर्वक प्रहार किया जिसमें अनेक आन्दोलनकारी शहीद हो गए।
    * १५ अगस्त, १९९६ को तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने उत्तराखण्ड राज्य की घोषणा लालकिले से की।
    * १९९८ में केन्द्र की भाजपा गठबंधन सरकार ने पहली बार राष्ट्रपति के माध्यम से उ.प्र. विधानसभा को उत्तरांचल विधेयक भेजा। उ.प्र. सरकार ने २६ संशोधनों के साथ उत्तरांचल राज्य विधेयक विधान सभा में पारित करवाकर केन्द्र सरकार को भेजा। केन्द्र सरकार ने २७ जुलाई, २००० को उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक २००० को लोकसभा में प्रस्तुत किया जो १ अगस्त, २००० को लोकसभा में तथा १० अगस्त, २००० अगस्त को राज्यसभा में पारित हो गया। भारत के राष्ट्रपति ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक को २८ अगस्त, २००० को अपनी स्वीकृति दे दी और इसके बाद यह विधेयक अधिनियम में बदल गया और इसके साथ ही ९ नवंबर, २००० को उत्तरांचल राज्य अस्तित्व मे आया जो अब उत्तराखण्ड नाम से अस्तित्व में है।

उत्तराखण्ड का इतिहास

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स्कन्द पुराण में हिमालय को पाँच भौगोलिक क्षेत्रों में विभक्त किया गया है:-

    खण्डाः पञ्च हिमालयस्य कथिताः नैपालकूमाँचंलौ।
    केदारोऽथ जालन्धरोऽथ रूचिर काश्मीर संज्ञोऽन्तिमः॥

अर्थात हिमालय क्षेत्र में नेपाल, कुर्मांचल (कुमाऊँ) , केदारखण्ड (गढ़वाल), जालन्धर (हिमाचल प्रदेश), और सुरम्य कश्मीर पाँच खण्ड है।[७]
एक शिलाशिल्प जिसमें महाराज भगीरथ को अपने ६०,००० पूर्वजों की मुक्ति के लिए पश्चाताप करते दिखाया गया है।

पौराणिक ग्रन्थों में कुर्मांचल क्षेत्र मानसखण्ड के नाम से प्रसिद्व था। पौराणिक ग्रन्थों में उत्तरी हिमालय में सिद्ध गन्धर्व, यक्ष, किन्नर जातियों की सृष्टि और इस सृष्टि का राजा कुबेर बताया गया हैं। कुबेर की राजधानी अलकापुरी (बद्रीनाथ से ऊपर) बताई जाती है। पुराणों के अनुसार राजा कुबेर के राज्य में आश्रम में ऋषि-मुनि तप व साधना करते थे। अंग्रेज़ इतिहासकारों के अनुसार हुण, सकास, नाग, खश आदि जातियाँ भी हिमालय क्षेत्र में निवास करती थी। पौराणिक ग्रन्थों में केदार खण्ड व मानस खण्ड के नाम से इस क्षेत्र का व्यापक उल्लेख है। इस क्षेत्र को देव-भूमि व तपोभूमि माना गया है।

मानस खण्ड का कुर्मांचल व कुमाऊँ नाम चन्द राजाओं के शासन काल में प्रचलित हुआ। कुर्मांचल पर चन्द राजाओं का शासन कत्यूरियों के बाद प्रारम्भ होकर सन १७९० तक रहा। सन १७९० में नेपाल की गोरखा सेना ने कुमाऊँ पर आक्रमण कर कुमाऊँ राज्य को अपने आधीन कर लिया। गोरखाओं का कुमाऊँ पर सन १७९० से १८१५ तक शासन रहा। सन १८१५ में अंग्रेंजो से अन्तिम बार परास्त होने के उपरान्त गोरखा सेना नेपाल वापस चली गई किन्तु अंग्रेजों ने कुमाऊँ का शासन चन्द राजाओं को न देकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन कर दिया। इस प्रकार कुमाऊँ पर अंग्रेजो का शासन १८१५ से आरम्भ हुआ।
संयुक्त प्रांत का भाग उत्तराखण्ड, १९०३

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार केदार खण्ड कई गढ़ों (किले) में विभक्त था। इन गढ़ों के अलग-अलग राजा थे जिनका अपना-अपना आधिपत्य क्षेत्र था। इतिहासकारों के अनुसार पँवार वंश के राजा ने इन गढ़ों को अपने अधीनकर एकीकृत गढ़वाल राज्य की स्थापना की और श्रीनगर को अपनी राजधानी बनाया। केदार खण्ड का गढ़वाल नाम तभी प्रचलित हुआ। सन १८०३ में नेपाल की गोरखा सेना ने गढ़वाल राज्य पर आक्रमण कर अपने अधीन कर लिया। यह आक्रमण लोकजन में गोरखाली के नाम से प्रसिद्ध है। महाराजा गढ़वाल ने नेपाल की गोरखा सेना के अधिपत्य से राज्य को मुक्त कराने के लिए अंग्रेजो से सहायता मांगी। अंग्रेज़ सेना ने नेपाल की गोरखा सेना को देहरादून के समीप सन १८१५ में अन्तिम रूप से परास्त कर दिया। किन्तु गढ़वाल के तत्कालीन महाराजा द्वारा युद्ध व्यय की निर्धारित धनराशि का भुगतान करने में असमर्थता व्यक्त करने के कारण अंग्रेजों ने सम्पूर्ण गढ़वाल राज्य राजा गढ़वाल को न सौंप कर अलकनन्दा-मन्दाकिनी के पूर्व का भाग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन में सम्मिलित कर गढ़वाल के महाराजा को केवल टिहरी जिले (वर्तमान उत्तरकाशी सहित) का भू-भाग वापस किया। गढ़वाल के तत्कालीन महाराजा सुदर्शन शाह ने २८ दिसंबर १८१५ को[८] टिहरी नाम के स्थान पर जो भागीरथी और भिलंगना नदियों के संगम पर छोटा सा गाँव था, अपनी राजधानी स्थापित की।[९] कुछ वर्षों के उपरान्त उनके उत्तराधिकारी महाराजा नरेन्द्र शाह ने ओड़ाथली नामक स्थान पर नरेन्द्रनगर नाम से दूसरी राजधानी स्थापित की। सन १८१५ से देहरादून व पौड़ी गढ़वाल (वर्तमान चमोली जिला और रुद्रप्रयाग जिले का अगस्त्यमुनि व ऊखीमठ विकास खण्ड सहित) अंग्रेजो के अधीन व टिहरी गढ़वाल महाराजा टिहरी के अधीन हुआ।[१०][११][१२]

भारतीय गणतन्त्र में टिहरी राज्य का विलय अगस्त १९४९ में हुआ और टिहरी को तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (उ.प्र.) का एक जिला घोषित किया गया। १९६२ के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठ भूमि में सीमान्त क्षेत्रों के विकास की दृष्टि से सन १९६० में तीन सीमान्त जिले उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ का गठन किया गया। एक नए राज्य के रुप में उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन के फलस्वरुप (उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, २०००) उत्तराखण्ड की स्थापना ९ नवंबर २००० को हुई। इसलिए इस दिन को उत्तराखण्ड में स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है।

सन १९६९ तक देहरादून को छोड़कर उत्तराखण्ड के सभी जिले कुमाऊँ मण्डल के अधीन थे। सन १९६९ में गढ़वाल मण्डल की स्थापना की गई जिसका मुख्यालय पौड़ी बनाया गया। सन १९७५ में देहरादून जिले को जो मेरठ प्रमण्डल में सम्मिलित था, गढ़वाल मण्डल में सम्मिलित कर लिया गया। इससे गढवाल मण्डल में जिलों की संख्या पाँच हो गई। कुमाऊँ मण्डल में नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, तीन जिले सम्मिलित थे। सन १९९४ में उधमसिंह नगर और सन १९९७ में रुद्रप्रयाग , चम्पावत व बागेश्वर जिलों का गठन होने पर उत्तराखण्ड राज्य गठन से पूर्व गढ़वाल और कुमाऊँ मण्डलों में छः-छः जिले सम्मिलित थे। उत्तराखण्ड राज्य में हरिद्वार जनपद के सम्मिलित किये जाने के पश्चात गढ़वाल मण्डल में सात और कुमाऊँ मण्डल में छः जिले सम्मिलित हैं। १ जनवरी २००७ से राज्य का नाम "उत्तराञ्चल" से बदलकर "उत्तराखण्ड" कर दिया गया है।
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Wednesday, January 26, 2011

फायदेमंद है फूलों की खेती करना

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बागवानी और जड़ी बूटियों की खेती के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए भारतीय स्टेट बैंक ने कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में जिले भर से आए 90 किसानों ने प्रतिभाग किया।
मंगलवार को हाइवे स्थित होटल में एसबीआई की तरफ से आयोजित कार्यशाला का क्षेत्रीय प्रबंधक राजीव सक्सेना ने उद्घाटन किया। कार्यशाला में गोविंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर से आए डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि फूलों की खेती की तकनीकी जानकारी होनी बेहद जरूरी है। गुलाब, गेंदा और अन्य फूलों के खेती के लिए खाद की मात्रा और बीमारियों के नियंत्रण की पूरी जानकारी होनी चाहिए। डॉ. केवलानंद ने मैदानी क्षेत्रों में होने वाले फूलों और जड़ी बूटियों के बारे में किसानों को जानकारी दी। क्षेत्रीय प्रबंधक राजीव सक्सेना ने किसानों को बैंक की ऋण योजनाओं की जानकारी दी। कार्यशाला में 90 किसानों ने प्रतिभाग किया। कार्यशाला में एसएस सपरा, अश्रि्वनी वासुदेव आदि उपस्थित रहे।
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उत्तराखंड में आर्थिक स्थिति सुधरेगी संजीवनी औषधि

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सोनिया रावत | कमल नदी के तट पर मंगलवार को, महिला समाख्या परियोजना के सौजन्य से आयोजित जड़ी बूटी संजीवनी  मेले का आयोजन किया गया | मेले में पुरोला, मोरी व नौगांव के 350 गांवों की सैकड़ों महिलाएं उपस्थित रही । तीनों विकासखंडों के 250 महिला समूहों ने गांव-गांव में महिलाओं के स्थानीय जड़ी-बूटी से तैयार संजीवनी औषधियों के बारे में जानकारी दी। मेले में मुख्य अतिथि पूर्व ब्लॉक प्रमुख पीएल हिमानी ने कहा जहां स्थानीय जड़ी बूटियों से तैयार औषधियों को महिला के स्वास्थ्य के लिये संजीवनी व आर्थिक स्थिति सुधारने का जरिया बताया। मेले में जान कारी देते राज्य समन्वयक हेमलता खंडूड़ी ने विगत पांच वर्षों से यमुनाघाटी के पुरोला मोरी व नौगांव प्रखंड के 350 गांवों में परियोजना ने महिला स्वास्थ्य, कन्या भू्रण हत्या रोकने, किशोरी शिक्षा, महिलाओं को सामाजिक जागरूकता की जानकारी दी। वहीं जिला समन्वयक निमी कुकरेती ने कहा कि परियोजना से क्षेत्र के 350 गांव में 250 महिला समूह के सहयोग से 15 संजीवनी केन्द्रों में स्थानीय जड़-बूटी पर आधारित औषधियां तैयार की जा रही हैं, ताकि छोटी-छोटी बीमारियों का उपचार महिलायें गांव में ही कर सकें। मेले में कमल जोशी, राज्य समन्वयक चन्द्रा भंडारी, बलदेव असवाल,उर्मिला थेन, डॉ.आरसी आर्य, हिरामणी, रामप्यारी, नीना देवी, हंसा देवी सुशीला देवी, शांति देवी, किरन रावत, सुनिता भटट, ललीता नौटियाल, हेमलता, महिदेव असवाल आदि मौजूद थे।

पर्यावरण को समर्पित किया जीवन

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नाम- चक्रधर तिवार, उम्र- 68 वर्ष, पता-किसी भी समय गोपेश्वर में सड़क किनारे पौधों की रोपाई अथवा निराई करते मिल जाएंगे। ये उस शख्स का परिचय है, जिसने अपने जीवन का अंतिम पड़ाव पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर रखा है। इस सफर की शुरुआत उन्होंने अकेले ही की, पर आज भी एकला चलो रे की तर्ज पर बिना किसी हमसफर के वे अपने जुनून में मस्त हैं। अब तक सड़क किनारे वे सैकड़ों वृक्षों का रोपण कर चुके हैं। हालांकि, उनके जज्बे और जु़नून को न तो पहचान मिल सकी न सम्मान। बावजूद इसके चक्रधर तिवारी अपना अभियान जारी रखे हुए हैं। इतना ही नहीं आज उनके पसीने से सींचे गए 14 जंगल जवान होकर लहलहा रहे हैं।
चमोली जनपद के टंगसा गाव निवासी चक्रधर तिवारी ने अपना जीवन पर्यावरण को समर्पित कर रखा है। उनमें बचपन से समाज सेवा व पर्यावरण संरक्षण की ललक थी। लिहाजा स्कूल में किसी भी राष्ट्रीय त्योहार के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में वे भाषण के दौरान श्रोताओं को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना नहीं भूलते थे। जब भी श्री तिवारी को मौका मिलता तो वह एक नई पौध जरूर रोपते थे। महज 22 वर्ष की उम्र में वह एक संस्था से जुड़ गए और शराब के खिलाफ आंदोलन के साथ-साथ उन्होंने पर्यावरण के प्रति जागरुकता अभियान भी चलाया। उनके अभियान को मंजिल मिलती तब दिखाई दी, जब वे अपने गांव टंगसा के ग्रामप्रधान निर्वाचित हुए। सिरौं, टंगसा व कठूड़ तीनों राजस्व गांवों के ग्रामीणों को जागरुक कर उन्होंने आस पास के क्षेत्र में छोटे-छोटे 14 मानवकृत वनों को विकसित करने में सफलता हासिल की। पहले खेती बाड़ी कर वह अपना गुजारा कर लेते थे। आयु अधिक होने पर जब शरीर की साम‌र्थ्य कम होने लगी तो वर्ष 2007 में श्री तिवारी ने सोचा कि जिला मुख्यालय गोपेश्वर में सेवानिवृत्त कर्मचारियों का संगठन बनाकर सड़क के किनारे वृक्षारोपण किया जाए, लेकिन उन्हें अफसोस है कि एक सेवानिवृत्त फौजी राजेन्द्र सिंह नेगी के अलावा कोई अन्य व्यक्ति उनकी इस सोच का साथी नहीं बना। फिर भी हौसला रखते हुए उन्होंने राजेन्द्र सिंह के साथ गोपेश्वर में मिशन शुरू किया। इनके रोपे 630 वृक्ष तेजी से फलफूल रहे हैं। उनका कहना है कि पौध रोपण के बाद उनकी देखरेख व सुरक्षा करना एक बड़ी जिम्मेदारी है। शायद यही वजह है कि वो अपने पैसों से पानी का टैंकर मंगवाकर रोपे गए पौधों की सिंचाई करते हैं।
गणतंत्र दिवस पर तिवारी होंगे सम्मानित
गोपेश्वर: जिला प्रशासन ने पर्यावरण प्रेमी चक्रधर तिवारी को गणतंत्र दिवस के दिन सम्मानित करने का निर्णय लिया है। जिलाधिकारी डॉ. पीएस गुसाई ने बताया कि गणतंत्र दिवस की तैयारियों को लेकर हाल ही में आयोजित हुई बैठक में श्री तिवारी को सम्मानित करने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया है।
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अपर पुलिस अधीक्षक पौड़ी जसवंत सिंह को राष्ट्रपति पुलिस पदक

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अंकित जोशी - देहरादून |  गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति पुलिस पदकों की घोषणा कर दी गई है। अपर पुलिस अधीक्षक पौड़ी जसवंत सिंह को राष्ट्रपति पुलिस पदक के लिए चुना गया है। इसके अलावा पुलिस उपमहानिरीक्षक दीपक सेठ, पुलिस उपमहानिदेशक कुमार विश्वजीत, पुलिस अधीक्षक अल्मोड़ा, पूरन सिंह रावत व रमेश चंद्र जोशी को दीर्घ एवं सराहनीय सेवा पुलिस पदक देने की घोषणा की गई है।
पौड़ी में तैनात अपर पुलिस अधीक्षक जसवंत सिंह को 38 वर्ष की अति सराहनीय सेवा के लिए विशिष्ट सेवा राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया है। यह पुलिस विभाग का सर्वोच्च पुरस्कार है। उन्हें पूर्व में भी राष्ट्रपति की ओर से वीरता पुलिस पदक, प्रधानमंत्री की ओर से रक्षा पुलिस पदक एवं मुख्यमंत्री की ओर से पुलिस पदक से अलंकृत किया जा चुका है। 15 वर्ष से अधिक की उत्कृष्ट सेवाओं के लिए अपर सचिव गृह के पद पर तैनात दीपक सेठ, मुख्यालय में तैनात कुमार विश्वजीत समेत तीन अन्य को दीर्घ एवं सराहनीय सेवा पुलिस पदक से सम्मानित किया गया है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर उल्लेखनीय एवं सराहनीय सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक व पुलिस पदक पाने वाले प्रदेश के पुलिस अफसरों को बधाई दी है।

संस्कृत के प्रकांड विद्वान प्रो. डीडी शर्मा को द्मश्री अवार्ड

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सुदर्शन सिंह रावत |  प्रख्यात भाषाविद् व संस्कृत के प्रकांड विद्वान प्रो. डीडी शर्मा को उत्कृष्ट लेखन व शोध के लिए लिए पद्मश्री अवार्ड के लिए चुना गया है।
पंजाब विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत प्रोफेसर डीडी शर्मा दो दर्जन भारतीय व विदेशी भाषाओं में दक्ष हैं। उन्होंने 56 अनुसंधान ग्रंथों एवं 200 से अधिक अनुसंधान पत्रों का प्रकाशन किया है। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में लद्दाख, लाहौर, स्पिति, किन्नौर आदि क्षेत्रों से लेकर पूर्व में नेपाल, सिक्किम व भूटान तक के क्षेत्रों की दर्जनों तिब्बत-बर्मी परिवार की भाषाओं व संस्कृतियों का सर्वेक्षण एवं अध्ययन किया है। इसके लिए उन्हें राष्ट्र की उत्कृष्ट फैलोशिप भी प्राप्त हुई हैं। इसमें जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय फेलोशिप, यूजीसी अमेरिटस फैलोशिप, इंदिरा गांधी मेमोरियल फैलोशिप आदि प्रमुख हैं। 24 अक्टूबर 1923 को नैनीताल जनपद के भीमताल कस्बे में जन्मे प्रो. शर्मा को अनूठे कार्य के लिए पद्श्रमी अवार्ड से नवाजा जाएगा। वह अभी परिवार के साथ हल्द्वानी में रह रहे हैं।

तीन सौ से अधिक महिलाओं को मिलेगा रोजगार

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तीन सौ से अधिक महिलाओं को मिलेगा रोजगार
सुदर्शन सिंह रावत | पौड़ी। जिले में ती सौ से अधिक महिलाओं को जल्द ही रोजगार मिलेगा। जिले में जल्द ही ११६ आंगनबाड़ी और २१३ मिनी आंगनबाड़ी और खुलने जा रहे हैं। बाल विकास विभाग ने इन केंद्रों को स्थापित करने के लिए गांवों का चयन कर शासन को मांग भेज दी है। शासन से भी इन्हें खोलने के लिए जल्दी मंजूरी मिलने की उम्मीद है।
उल्लेखनीय है कि पौड़ी जिले में वर्तमान में १०७४ आंगनबाड़ी और ६२३ मिनी आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इनमें वर्तमान में ८४२ आंगनबाड़ी और ३६७ मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन हो रहा है। शेष २३२ आंगनबाड़ी केंद्रों और २५६ मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन अभी नहीं हो पा रहा है। शासन द्वारा इन्हें स्थापित तो किया जा चुका है, लेकिन अभी इनमें कार्यकत्रियों और सहायिकाओं की तैनाती नहीं हो पाई है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार इनमें कार्यकत्रियों और सहायिकाओं की तैनाती के लिए नियुक्ति प्रक्रिया जारी है। जल्दी ही इनकी नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद है। विभागीय अधिकारी बताते हैं कि जिले में जो ८४४२ आंगनबाड़ी और ३६७ मिनी आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं इन केंद्रों के जरिये हजारों बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं। इनमें आंगनबाड़ी कार्यकत्री और सहायिका के रूप में कार्यरत सैकड़ों महिलाओं को रोजगार भी मिला है।
विभागीय अधिकारी बताते हैं कि विगत कुछ माह पूर्व शासन द्वारा पौड़ी जिले में ११६ आंगनबाड़ी और २१३ मिनी आंगनबाड़ी केंद्र खोलने के लिए संस्तुति की गई थी। जिसके तहत शासन ने विभाग को इन्हें स्थापित करने के लिए गांवों का चयन और सर्वेक्षण करते हुए प्रस्ताव बनाकर शासन को शीघ्र भेजने के निर्देश जारी किए गए थे। लेकिन यह मामला लंबे समय से लंबित चल रहा था। जिला कार्यक्रम अधिकारी उदय प्रताप सिंह ने बताया कि शासन के निर्देशानुसार जिले में संबंधित गांवों का चयन और सर्वेक्षण कर शासन को प्रस्ताव बनाकर भेज दिए हैं। जल्दी ही शासन से इनका संचालन शुरू करने के लिए स्वीकृति मिल जाएगी। इसके बाद इनमें आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

Tuesday, January 25, 2011

गढ़वाल का लोक नृत्य

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जहां का संगीत इतना समृद्ध है, वहां का लोकनृत्य भी उसी श्रेणी का है। इनमें पुरुष व स्त्री, दोनों ही के नृत्य हैं, एवं सम्मिलित नृत्य भी आते हैं। इन लोक नृत्यों में प्रमुख हैं:
लांगविर नुल्याः
बरादा नटि
पान्डव नृत्य
धुरंग एवं धुरिंग
लांगविर नुल्याः


यह एक कलाबाजी नृत्य है जो पुरुषों द्वारा निष्पादित किया जाता है। कलाबाज नर्तक खम्भे के शीर्षक पर चढ जाता है तथा शीर्ष पर अपने पेट को स्वयं संतुलित करता है। खम्भे के नीचे वाधकारों का एक समूह ढोल एवं दमाना बजाता है जबकि खम्भे के शीर्ष पर नर्तक अपने हाथ पैरों से अनेकों करतब दिखाता हुआ घूमता है। यह लोकनृत्य टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में काफी लोकप्रिय है।
 
बरादा नटिः

यह नृत्य देहरादून जिले में चकराता तहसील के जौनसार बाबर क्षेत्र में काफी लोकप्रिय है। यह लोकनृत्य कुछ धार्मिक त्यौहारों या कुछ सामाजिक कार्यकुलों के अवसर पर प्रस्तुत किया जाता है। बालक एवं बालिकाएं दोनों रंग बिरंगी पारम्परिक वेशभूषा में नृत्य में भाग लेते हैं।
पान्डव नृत्यः

महाभारत की कथा से सम्बद्ध पान्डव नृत्य विशिष्ट रुप से गढ़वाल क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय है। पान्डव नृत्य कुछ अन्य नही है वरन नृत्य एवं संगीत के रुप में महाभारत की कहानी का सरल रुप में वर्णन है। इसका प्रदर्शन अधिकांशतः दशहरे एवं दीपावली के अवसर पर किया जाता है। पान्डव नृत्य चमोली जिले में एवं पौडी गढ़वाल में लोकप्रिय है।
धुरंग एवं धुरिंगः

भूटिया जनजाति के लोगों के मुख्य नृत्य धुरंग एवं धुरिंग है जिसका प्रदर्शन मृत्यु के अवसर पर किया जाता है। इस नृत्य का उद्देश्य मृत व्यक्ति की आत्मा को विमुक्त करना जिसके बारे में यह विश्वास है कि आत्मा एक बकरी या अन्य पशु के शरीर में निवास करती है। यह नृत्य हिमाचल प्रदेश के पशुनृत्य या नागालैन्ड के आखेट नृत्य के समान है।

गढ़वाल का लोक संगीत

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गढ़वाल भी समस्त भारत की तरह संगीत से अछूता नहीं है। यहां की अपनी संगीत परंपराएं हैं, व अपने लोकगीत हैं। इनमें से खास हैं:
छोपाटी
चौन फूला एवं झुमेला
बसंती
मंगल
पूजा लोकगीत
जग्गार
बाजुबंद
खुदेद
छुरा

 
छोपाटी
ये लोक संगीत टिहरी गढ़वाल के रावेन- जौनपुर क्षेत्र में लोकप्रिय है। छोपाटी वे प्रेम गीत हैं, जिन्हे प्रश्न एवं उत्तर के सरुप में पुरुष एवं महिलाओं द्वारा गाया जाता है।

चौन फूला एवं झुमेलाः
चौनफूला एवं झुमेला मौसमी रुप है जिन्हे बसंन्त पंचमी से संक्रान्ती या बैसाखी के मध्य निष्पादित किया जाता है। झुमेला को सामान्यतः महिलाओं द्वारा निष्पादित किया जाता है। परन्तु कभी-2 यह मिश्रित रुप में भी निष्पादित किया जाता है। चौनफूला नृत्य को स्त्री एवं पुरुषों द्वारा रात्रि में समाज के सभी वर्गों द्वारा समूहों में किया जाता है। चौनफूला लोक गीतों का सृजन विभिन्न अवसरों पर प्रकृति के गुणगान के लिए किया जाता है। चौनफूला, झुमेला एवं दारयोला लोकगीतों का नामकरण समान नाम वाले लोकनृत्यों के नाम पर हुआ है।
 
बसन्तीः
बसन्त ऋतु के आगमन के अवसर पर जब गढ़वाल पर्वतों की घाटियों में नवीन पुष्प खिलते हैं बसन्ती लोकनृत्यों को गाया जाता है। इन लोकनृत्यों का गायन अकेले या समूहों में किया जाता है।
 
मंगलः
मंगल गीतों को विवाह समारोहों के अवसर पर गाया जाता है। ये गीत अवसर पर गाया जाता है। ये गीत मूलतः पूजा गीत (Hymns) हैं। विवाह समारोह के अवसर पर शास्त्रों के अनुसार पुरोहित के साथ-2 इन गीतों को संस्कृत के श्लोकों में गाया जाता है।
 
पूजा लोक गीतः
ये लोकगीत परिवारिक देवताओं की पूजा से सम्बद्ध है। इस क्षेत्र में तंत्र-मंत्र से सम्बद्ध अन्य पूजा लोकगीत भी गाये जाते हैं जिनका उद्देश्य अपदूतों से मानव समुदाय की रक्षा करना है।

जग्गारः
जग्गार का सम्बन्ध भूत एवं प्रेतात्माओं की पूजा में है तथा कभी-2 ये लोकगीत लोक नृत्यों के साथ मिश्रित रुप में गाये जाते हैं। कभी-2 जग्गार विभिन्न देवी देवताओं के सम्मान में पूजा लोक गीतों के स्वरुप में भी गाये जाते हैं।
 
बाजू बन्दः
ये लोकगीत चरवाहों के मध्य प्रेम एवं बलिदान के प्रतीक हैं। ये गीत पुरुष एवं स्त्री या बालक एवं बालिका के मध्य प्रेम को प्रदर्शित करने के रुप में गाये जाते हैं।
खुदेदः
ये लोकगीत अपने पति से प्रथक हुई महिला की पीडा को वर्णित करते हैं। पीडित महिला अपशब्दों के साथ उन परिस्थितयों को वर्णित करती है जिसके कारण वह अपने पति से प्रथक हुई है सामान्यतः प्रथक्करण का मुख्य कारण पति का रोजगार की खोज में घर से दूर जाना है। लमन नामक अन्य लोक नृत्य विशिष्ट अवसरों पर गाया जाता है जो पुरुष द्वारा अपनी प्रेमिका के लिए बलिदान की इच्छा को व्यक्त करता है। लोकगीतों के इस वर्ग में पवादा एक अन्य लोक गीत है जो दुःख के इस अवसर पर गाया जाता है जब पति युद्ध के मैदान में चला गया होता है।

छुराः
छुरा लोक गीतों को चरवाहों द्वारा गाया जाता है। इन लोकगीतों में वृद्ध व्यक्ति भेडों एवं बकरियों को चराने के अपने अनुभव का ज्ञान अपने बच्चों को देते हैं।
विकिपीडिया.org से साभार

गढ़वाल का इतिहास-श्रीनगर

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उत्तराखण्ड के इतिहास पर एक स्थानीय इतिहासकार तथा कई पुस्तकों के लेखक एस.पी. नैथानी के अनुसार श्रीनगर के विपरीत अलकनन्दा नदी के किनारे रानीहाट के बर्तनों, हड्डियों एवं अवशेषों से पता चलता है कि ३,००० वर्ष पहले श्रीनगर एक सुसभ्य स्थल था जहाँ लोग शिकार के हथियार बनाना जानते थे तथा जो खेती करते थे एवँ बर्तनों में खाना पकाते थे।

मध्य युग
मध्य युग में गढ़वाल पर पँवार वंश का शासन था और इसके ३७वें शासक अजय पाल ने ही श्रीनगर को राजधानी बनाया था। अजय पाल एक अवयस्क राजा था जिसने चान्दपुर गढ़ी में शासन किया जैसा श्री. नैथानी बताते हैं। कुमाऊँ के चन्द शासकों से पराजय के बाद उसने श्रीनगर से ५ किलोमीटर दूर देवलगढ़ के गोरखपन्थी गुरू सत्यनाथ के एक शिष्य के रूप में शरण ली। उन्होंने उसे अपनी राजधानी श्रीनगर में बनाने का परामर्श दिया। श्रीनगर के चयन का दूसरा कारण अलकनन्दा की चौड़ी घाटी की स्थिति था। नैथानी के अनुसार वहाँ एक प्राचीन दक्षिण काली का मन्दिर था तथा तत्कालीन मन्दिर के पुजारी ने भविष्यवाणी की थी कि श्रीनगर में बहुत लोग आएँगे। इतने लोग कि उनके लिए दाल छौकने के लिये एक टन हींग की आवश्यकता होगी। भविष्यवाणी सच हुई तथा अजय पाल के अधीन श्रीनगर उन्नतशील नगर बन गया जिसने यहाँ वर्ष १४९३-१५४७ के बीच शासन किया तथा अपने अधीन ५२ प्रमुख स्थलों को एकीकृत किया। उस समय गढ़वाल राज्य का विस्तार तराई के कंखल (हरिद्वार) एवँ सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) तक हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उसके कई वंशजों ने यहाँ शासन किया।
वर्ष १५१७ से १८०३ तक पँवार राजाओं की राजधानी श्रीनगर थी और इस वंश के १७ राजाओं ने यहीं से शासन किया। अजयपाल के बाद सहज पाल एवँ बलभद्र शाह ने इस नगर एवँ राजमहल को संवारने का प्रयास किया, पर राजा मान शाह वास्तव में इस नगर को प्रभावशाली बनाने में सफल हुआ।
यद्यपि स्थाई तौर पर श्रीनगर तथा कुमाऊँ के राजाओं के बीच झड़पे होती रही, पर दोनों पहाड़ी राज्यों को मैदानी ताकतों के अधीन कभी भी न होने का गौरव प्राप्त था। वास्तव में शाहजहाँ के समय यह कहा गया कि पहाड़ी राज्यों पर विजय पाना सबसे कठिन था।

आधुनिक युग
इतिहास के आधार पर श्रीनगर हमेशा ही महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि यह बद्रीनाथ एवं केदारनाथ के धार्मिक स्थलों के मार्ग में आता है। बहुसंख्यक तीर्थयात्री इस शहर से गुजरते हुए यहां अल्पकालीन विश्राम के लिये रूकते रहे हैं। फिर भी नैथानी बताते हैं कि श्रीनगर के राजा ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि साधु-संतों तथा आमंत्रित आगंतुकों को छोड़कर अन्य तीर्थयात्री शहर के बाहर से ही जयें क्योंकि उस समय हैजा का वास्तविक खतरा था। गढ़वाल में एक पुरानी कहावत थी कि अगर हरिद्वार में हैजा है तो वह 6 दिनों में बद्रीनाथ में फैलने का समय होता था (अंग्रेज भी हैजा को नियंत्रित करने में असमर्थ रहे तथा कई लोगों द्वारा इस रोग के विस्तार को रोकने के लिये घरों को जला दिया जाता था तथा लोगों को घरों को छोड़कर जंगल भागना पड़ता था)।
वर्ष 1803 से नेपाल के गोरखा शासकों का शासन (1803-1815) यहां शुरू हुआ। समय पाकर गढ़वाल के राजा ने गोरखों को भगाने के लिये अंग्रेजों से संपर्क किया, जिसके बाद वर्ष 1816 के संगौली संधि के अनुसार गढ़वाल को दो भागों में बांटा गया जिसमें श्रीनगर क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन हो गया। इसके बाद गढ़वाल के राजा ने अलकनंदा पार कर टिहरी में अपनी नयी राजधानी बसायी। श्रीनगर ब्रिटिश गढ़वाल के रूप में वर्ष 1840 तक मुख्यालय बना रहा तत्पश्चात इसे 30 किलोमीटर दूर पौड़ी ले जाया गया। वर्ष 1894 में श्रीनगर को अधिक विभीषिका के सामना करना पड़ा, जब गोहना झील में उफान के कारण भयंकर बाढ़ आई। श्रीनगर में कुछ भी नहीं बचा। वर्ष 1895 में ए के पो द्वारा निर्मित मास्टर प्लान के अनुसार वर्तमान स्थल पर श्रीनगर का पुनर्स्थापन हुआ। वर्तमान एवं नये श्रीनगर का नक्शा जयपुर के अनुसार बना जो चौपड़-बोर्ड के समान दिखता है जहां एक-दूसरे के ऊपर गुजरते हुए दो रास्ते बने हैं। नये श्रीनगर के मुहल्लों एवं मंदिरों के वही नाम हैं जो पहले थे जैसा कि विश्वविद्यालय के एक इतिहासकार डॉ दिनेश प्रसाद सकलानी बताते हैं।
हिमालयन गजेटियर (वोल्युम III, भाग II ) वर्ष 1882 में ई.टी. एटकिंस के अनुसार कहा जाता है कि कभी शहर की जनसंख्या काफी थी तथा यह वर्तमान से कही अधिक विस्तृत था। परंतु अंग्रेजी शासन के आ जाने से कई वर्ष पहले इसका एक-तिहाई भाग अलकनंदा की बाढ़ में बह गया तथा वर्ष 1803 से यह स्थान राजा का आवास नहीं रहा जब प्रद्युम्न शाह को हटा दिया गया जो बाद में गोरखों के साथ देहरा के युद्ध में मारे गये। इसी वर्ष एक भूकंप ने इसे इतना अधिक तबाह कर दिया कि जब वर्ष 1808 में रैपर यहां आये तो पांच में से एक ही घर में लोग थे। बाकी सब मलवों का ढेर था। वर्ष 1819 के मूरक्राफ्ट के दौरे तक यहां कुछ मोटे सूती एवं ऊनी छालटियां के घर ही निर्मित थे और वे बताते हैं कि यह तब तक वर्ष 1803 के जलप्लावन तथा बाद के भूकंप से उबर नहीं पाया था, मात्र आधे मील की एक गली बची रही थी। वर्ष 1910 में (ब्रिटिश गढ़वाल, ए गजेटियर वोल्युम XXXVI) एच.जी. वाल्टन बताता है, “पुराना शहर जो कभी गढ़वाल की राजधानी तथा राजाओं का निवास हुआ करता था उसका अब अस्तित्व नहीं है। वर्ष 1894 में गोहना की बाढ़ ने इसे बहा दिया और पुराने स्थल के थोड़े अवशेषों के अलावा यहां कुछ भी नहीं है। आज जहां यह है, वहां खेती होती है तथा नया शहर काफी ऊंचा बसा है जो पुराने स्थल से पांच फलांग उत्तर-पूर्व है।”
 
भारतीय स्वाधीनता संग्राम
श्रीनगर के लोगों की भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में गहरा जुड़ाव थी तथा वर्ष १९३० के दशक के मध्य यहाँ जवाहर लाल नेहरू एवँ विजयलक्ष्मी पण्डित जैसे नेताओं का आगमन हुआ था।
भारत की स्वाधीनता के बाद श्रीनगर, उत्तर प्रदेश का एक भाग बना और वर्ष २००० में यह नव निर्मित राज्य उत्तराञ्चल का भाग बना, जिसका बाद में नाम उत्तराखण्ड कर दिया गया।
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उत्तराखण्ड

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सुरेंदर प्रसाद | देहरादून |
उत्तराखण्ड (पूर्व नाम उत्तराञ्चल), उत्तर भारत में स्थित एक राज्य है जिसका निर्माण ९ नवम्बर २००० को कई वर्षों के आन्दोलन के पश्चात [२] भारत गणराज्य के सत्ताइसवें राज्य के रूप में किया गया था। सन २००० से २००६ तक यह उत्तराञ्चल के नाम से जाना जाता था। जनवरी २००७ में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया।[३] राज्य की सीमाएँ उत्तर में तिब्बत और पूर्व में नेपाल से लगी हैं। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तर प्रदेश इसकी सीमा से लगे राज्य हैं। सन २००० में अपने गठन से पूर्व यह उत्तर प्रदेश का एक भाग था। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों और प्राचीन साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप में किया गया है। हिन्दी और संस्कृत में उत्तराखण्ड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है। राज्य में हिन्दू धर्म की पवित्रतम और भारत की सबसे बड़ी नदियों गंगा और यमुना के उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री और यमुनोत्री तथा इनके तटों पर बसे वैदिक संस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं।
देहरादून, उत्तराखण्ड की अन्तरिम राजधानी होने के साथ इस राज्य का सबसे बड़ा नगर है। गैरसैण नामक एक छोटे से कस्बे को इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भविष्य की राजधानी के रूप में प्रस्तावित किया गया है किन्तु विवादों और संसाधनों के अभाव के चलते अभी भी देहरादून अस्थाई राजधानी बना हुआ है।राज्य का उच्च न्यायालय नैनीताल में है।
राज्य सरकार ने हाल ही में हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये कुछ पहल की हैं। साथ ही बढ़ते पर्यटन व्यापार तथा उच्च तकनीकी वाले उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए आकर्षक कर योजनायें प्रस्तुत की हैं। राज्य में कुछ विवादास्पद किन्तु वृहत बाँध परियोजनाएँ भी हैं जिनकी पूरे देश में कई बार आलोचनाएँ भी की जाती रही हैं, जिनमें विशेष है भागीरथी-भीलांगना नदियों पर बनने वाली टिहरी बाँध परियोजना। इस परियोजना की कल्पना १९५३ मे की गई थी और यह अन्ततः २००७ में बनकर तैयार हुआ। उत्तराखण्ड, चिपको आन्दोलन के जन्मस्थान के नाम से भी जाना जाता है।

जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

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| सुदर्शन सिंह रावत की रिपोर्ट |
यह भारत का एक प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान हैं ।यह गौरवशाली पशु विहार है। यह रामगंगा की पातलीदून घाटी में ५२५.८ वर्ग किलोमीटर में बसा हुआ है। कुमाऊँ के नैनीताल जनपद में यह पार्क विस्तार लिए हुए है।

स्थिति
दिल्ली से मुरादाबाद - काशीपुर - रामनगर होते हुए कार्बेट नेशनल पार्क की दूरी २९० कि.मी. है। कार्बेट नेशनल पार्क में पर्यटकों के भ्रमण का समय नवम्बर से मई तक होता है। इस मौसम में की ट्रैवल एजेन्सियाँ कार्बेट नेशनल पार्क में सैलानियों को घुमाने का प्रबन्ध करती हैं। कुमाऊँ विकास निगम भी प्रति शुक्रवार के दिल्ली से कार्बेट नेशनल पार्क तक पर्यटकों को ले जाने के लिए संचालित भ्रमणों (कंडक टेड टूर्स) का आयोजन करता है। कुमाऊँ विकास निगम की बसों में अनुभवी गाइड होते हैं जो पशुओं की जानकारी, उनकी आदतों को बताते हुए बातें करते रहते हैं

पशु
यहाँ पर शेर, हाथी, भालू, बाघ, सुअर, हिरन, चीतल, साँभर, पांडा, काकड़, नीलगाय, घुरल और चीता आदि 'वन्य प्राणी' अधिक संख्या में मिलते हैं। इसी तरह इस वन में अजगर तथा कई प्रकार के साँप भी निवास करते हैं। जहाँ इस वन्य पसु विहार में अनेक प्रकार के भयानक जन्तु पाये जाते हैं, वहाँ इस पार्क में ६०० से लगभग रंग - बिरंगे पक्षियों की जातियाँ भी दिखाई देती हैं। यह देश एक ऐसा अभयारण है जिसमें वन्य जन्तुओं की अनेक जातियाँ - प्रजातियों के साथ पक्षियों का भी आधिक्य रहता है। आज विश्व का ऐसा कोई कोना नहीं है, जहाँ के पर्यटक इस पार्क को देखने नहीं आते हों।

पार्क :
अंग्रेज वन्य जन्तुओं की रक्षा करने के भी शौकीन थे। सन् १९३५ में रामगंगा के इस अंचल को वन्य पशुओं के रक्षार्थ सुरक्षित किया गया। उस समय के गवर्नर मालकम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम 'हेली नेशनल पार्क' रखा गया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इस पार्क का नाम 'रामगंगा नेशनल पार्क' रख दिया गया। स्वतंत्रता के बाद विश्व में जिम कार्बेट नाम एक प्रसिद्ध शिकारी के रुप में फैल गया था। जिम कार्बेट जहाँ अचूक निशानेबाज थे वहाँ वन्य पशुओं के प्रिय साथी भी थे। कुमाऊँ के कई आदमखोर शेरों को उन्होंने मारकर सैकड़ों लोगों की जानें बचायी थी। हजारों को भय से मुक्त करवाया था। गढ़वाल में भी एक आदमखोर शेर ने कई लोगों की जानें ले ली थी। उस आदमखोर को भी जिम कार्बेट ने ही मारा था। वह आदमखोर गढ़वाल के रुद्र प्रयाग के आस-पास कई लोगों को मार चुका था। जिम कार्बेट ने 'द मैन ईटर आॅफ रुद्र प्रयाग' नाम की पुस्तकें लिखीं।

भारत सरकार ने जब जिम कार्बेट की लोकप्रियता को समझा और यह अनुभव किया कि उनका कार्यक्षेत्र बी यही अंचल था तो सन् १९५७ में इस पार्क का नाम 'जिम कार्बेट नेशनल पार्क' रख दिया गया और जिम कार्बेट नेशनल पार्क जाने वाले पर्यटक इसी मार्ग से जाते हैं। नैनीताल से आनेवाले पर्यटक इस संग्रहालय को देखकर ही आगे बढ़ते हैं।

जिम कार्बेट :
जिम कार्बेट का पूरा नाम जेम्स एडवर्ड कार्बेट था। इनका जन्म २५ जुलाई १८७५ ई. में हुआ था। जिम कार्बेट बचपन से ही बहुत मेहनती और नीडर व्यक्ति थे। उन्होंने कई काम किये। इन्होंने ड्राइवरी, स्टेशन मास्टरी तथा सेना में भी काम किया और अनेत में ट्रान्सपोर्ट अधिकारी तक बने परन्तु उन्हें वन्य पशुओं का प्रेम अपनी ओर आकर्षित करता रहा। जब भी उन्हें समय मिलता, वे कुमाऊँ के वनों में घूमने निकल जाते थे। वन्य पशुओं को बहुत प्यार करते। जो वन्य जन्तु मनुष्य का दुश्मन हो जाता - उसे वे मार देते थे।

जिम कार्बेट के पिता 'मैथ्यू एण्ड सन्स' नामक भवन बनाने वाली कम्पनी में हिस्सेदारा थे। गर्मियों में जिम कार्बेट का परिवार अयायरपाटा स्थित 'गुर्नी हाऊस' में रहता था। वे उस मकान में १९४५ तक रहे। ठंडियों में कार्बेट परिवार कालढूँगी वाले अपने मकान में आ जाते थे। १९४७ में जिम कार्बेट अपनी बहन के साथ केनिया चले गये थे। वे वहीं बस गये थे। केनिया में ही अस्सी वर्ष की अवस्था में उनका देहान्त हो गया।

आज का जिम कार्बेट पार्क :
आज यह पार्क इतना समृद्ध है कि इसके अतिथि-गृह में २०० अतिथियों को एक साथ ठहराने की व्यवस्था है। यहाँ आज सुन्दर अतिथि गृह, केबिन और टेन्ट उपलब्ध है। खाने का उत्तम प्रबन्ध भी है। ढिकाल में हर प्रकार की सुविधा है तो मुख्य गेट के अतिथि-गृह में भी पर्याप्त व्यवस्था है।
रामनगर के रेलवे स्टेशन से १२ कि.मी. की दूरी पर 'कार्बेट नेशनल पार्क' का गेट है। रामनगर रेलवे स्टेशन से छोटी गाड़ियों, टैक्सियों और बसों से पार्क तक पहुँचा जा सकता है।
बस सेवाएँ भी उपलब्ध हैं। दिल्ली से ढिकाला तक बस आ-जा सकती है। यहाँ पहुँचने के लिए रामनगर कालागढ़ मार्गों का भी प्रयोग किया जा सकता है।

गढ़वाल में गढ़वाल - ग्लेशियरों में ट्रेकिंग

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गढ़वाल की पहाड़ियों भारत में बेहतरीन ग्लेशियरों और कुछ सबसे प्रसिद्ध बारहमासी rivers.Like पवित्र भागीरथी, अलकनंदा, यमुना, टोंस, आदि इन सभी नदियों के स्रोतों का स्रोत से कुछ के घर कर रहे हैं भागीरथी, Jamundar के लिए गौमुख की तरह अलग ग्लेशियरों अलकनंदा नदी टन के लिए और Alkapuri ग्लेशियर नदियों के ग्लेशियर.

दुनिया भर के पर्यटकों की हर साल हजार करने के लिए इन प्रसिद्ध ग्लेशियर देखना गढ़वाल आते हैं.

नंदा देवी ग्लेशियर:
नंदा देवी उत्तर और दक्षिण नंदा देवी के दो महत्वपूर्ण ग्लेशियरों, लगभग 19 lems की लंबाई के साथ प्रत्येक रहे हैं. ऋषि गंगा नदी जलग्रहण में स्थित है. इन ग्लेशियरों के दक्षिणी ढाल ofNanda देवी चोटी (7108 मी) पर उत्पन्न. आसपास के क्षेत्र में अन्य महत्वपूर्ण ग्लेशियरों त्रिशूल, Kururntoli, Nandakna Bartoli और रमानी हैं. इन ग्लेशियरों और अच्छी तरह से विकसित कर रहे हैं आकार और लंबाई में बड़े हैं. कई पिघल का पानी नदियों इन ग्लेशियरों से ही शुरू और नदी ऋषि गंगा, जो बाद में Raini, 25 किमी की दूरी पर धौली गंगा में मिलती है फार्म. जोशीमठ से. इन ग्लेशियरों जोशीमठ से approachable Malari सड़क के रास्ते पर हैं. लता, के बारे में 25 किलोमीटर. जोशीमठ से, पिछले roadhead है.
Nanda Devi Glacier
लता से, एक लगाम पथ पाइन, भोज और अन्य treesand अल्पाइन Meadows तक लता खड़ग के एक घने जंगल के माध्यम से निम्नानुसार है. लता खड़ग से मार्ग संकीर्ण घाटियों, खड़ी पहाड़ी ढलानों और बर्फ पैच के माध्यम से कुछ समय के माध्यम से गुजरता को ग्लेशियरों थूथन तक पहुँचने.

गंगोत्री ग्लेशियर:
गंगोत्री ग्लेशियर गढ़वाल हिमालय, उत्तरकाशी जिले में स्थित में एक प्रसिद्ध ग्लेशियर है. ग्लेशियर चोटियों के Chaukhamba श्रेणी के उत्तरी ढलान पर निकलती है. यह एक ही घाटी ग्लेशियर, लेकिन कई अन्य ग्लेशियरों कि वह तंग आ चुके हैं और बर्फ की एक विशाल जन फार्म का एक संयोजन नहीं है. (6772m) Bhrigupanth, कीर्ति Stambh (6285), सुमेरू पर्वत (6380) क्रमशः और Ratavana Bamak, Chaturangi Bamak और Swachand Bamak Srikailash के पूर्वोत्तर ढाल, यार पर्वत, Satopanth और चोटियों के एक संयुक्त राष्ट्र के namec समूह पर झूठ.

ग्लेशियर 28 किलोमीटर की अवधि के भीतर है. और एक गौमुख (4000m) terminates. एक सज्जन ढलान पर कुछ बर्फ की दीवारों और के लिए छोड़कर ग्लेशियर प्रवाह
Gangotri Glacier
ग्लेशियर, जहां निचले हिस्से (थूथन ऊपर) के रूप में, ग्लेशियर मलबे जो इसकी सतह के लिए एक mudd उपस्थिति प्रदान द्वारा कवर किया जाता है के ऊपरी क्षेत्रों में विकसित दरारों.

ग्लेशियर आसानी से अच्छी तरह से गंगोत्री मंदिर तक मोटर योग्य सड़क मार्ग से और वहाँ एक 17 किलोमीटर से जुड़े पहुंचा जा सकता है. लंबे लगाम पथ भागीरथी गौमुख, ग्लेशियर के थूथन के लिए नदी के दाहिने किनारे चलता है.


पार्श्व ग्लेशियर:

इस पार्श्व टिहरी जिले में स्थित ग्लेशियर नदी Bhilangna का स्रोत है. ग्लेशियर Jogin (6466 मीटर) समूह में, Sphetic (6905 मीटर) Pristwar, Barte Kauter (6579 मीटर) Kird (6902 मीटर) Stambh और मेरु की बर्फ चोटियों से घिरा हुआ है. ग्लेशियरों के किनारे पर moraines बजरी मिट्टी की दीवारें खड़ी की तरह लग रहे हो.

यात्रा जो Ghuttu से शुरू देहरादून, टिहरी, Mussorie और ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से मोटर द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है. एक से 45 किलोमीटर की यात्रा की है. और मोटी Kharsao जंगल और खुले सुंदर रसीला घास Meadows के साथ दूरदराज के गांवों से गुजरती हैं. Bhilangna घाटी में प्रवेश प्रदान करता है
lateral Glacier
शिविर के लिए उत्कृष्ट स्पॉट. टेंट और पर्याप्त प्रावधान के लिए अग्रिम में ऋषिकेश, टिहरी और देहरादून से व्यवस्था की जरूरत है.

Bandar पंच ग्लेशियर:
Bandarpunch यमुना नदी बेसिन का एक महत्वपूर्ण ग्लेशियर है. ग्लेशियर 12 किलोमीटर है. लंबे Bandarpunch (6,316 मीटर) शिखर, Bandarpunch पश्चिम (6102m) और Khatling शिखर (6387m) की उत्तरी ढलान पर स्थित है. ग्लेशियर तीन दंगल ग्लेशियरों का ही बना है और बाद में यमुना नदी में शामिल हो. ग्लेशियर एक सौम्य ढाल पर स्थित है और पार्श्व moraines, जो glacier.The ग्लेशियर के अंतिम सतह के स्तर का संकेत देहरादून से Sankri-Saur से संपर्क कर सकते हैं बस से और Sankri-Saur से तालुका, 11 किलोमीटर दूर होने से घिरा है. byjeep या हल्के वाहन है, तो Osia, 14 किलोमीटर. Osia Ruinsara ताल से, ग्लेशियर थूथन के ठीक नीचे स्थित है, सबसे अच्छा शिविर स्थल है. एक Ruinsara से ग्लेशियर और आसपास के क्षेत्र की यात्रा कर सकते हैं.
Bandar PunchGlacier

Chorbari Bamak:
Chorbari Bamak ग्लेशियर यूपी ग्लेशियर के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है 6 कि.मी. दूर है. लंबे समय से और originates केदार-dorne Bhartekhunta, और कीर्ति Stambh और इस पहाड़ी श्रृंखला के outhern ढलान से पानी विभाजन जो अलग है

ग्लेशियरों और Chorbari ग्लेशियर गंगोत्री समूह. कई फांसी ग्लेशियरों और हिमस्खलन chutes ग्लेशियर खिलाओ. ग्लेशियर के निचले हिस्से मोटी मलबे द्वारा कवर किया जाता है और पार्श्व moraines के विशाल भंडार से घिरा. ग्लेशियर इसके संचय क्षेत्र (600 मीटर) से शुरू होता है और जहाँ एक बर्फ / बर्फ पिघल धारा निकलती से 3800 मीटर की ऊंचाई पर terminates, मंदाकिनी को फोन किया और रूद्रप्रयाग में अलकनंदा में विलीन हो जाती है.

ग्लेशियर roa द्वारा रूद्रप्रयाग Guptkashi और Soneprayag fron. Gaurikund, एक पैर यात्रा पहाड़ी पर चलाता है के माध्यम से (तक पहुंचा जा सकता है Gaurikund Kedamath मंदिर से मंदिर तक Kedamath ढलानों, वहाँ एक 3km ग्लेशियर थूथन करने के लिए पगडंडी है.. रॉक चेहरे और अधिकार के बीच सरोवर - ग्लेशियर के latera Moraine, वहाँ एक ग्लेशियर पिघल Ganghi कहा जाता है पानी के द्वारा बनाई lak है.

Dokriani Bamak:
Dokriani Bamak (Bamak ग्लेशियर का स्थानीय नाम है) एक और अच्छी तरह से विकसित भागीरथी बेसिन के मध्यम आकार के ग्लेशियर है. ग्लेशियर दो cirques द्वारा बनाई है, द्रौपदी का--डंडा और Jaonli पीक, 5600 मीटर और 6000 मीटर की क्रमश: उत्तरी ढलान पर उद्भव. ग्लेशियर 5 किमी है. लंबी और उत्तर पश्चिम दिशा में बहती है 3800 की ऊंचाई पर मी समाप्त ग्लेशियर पिघल रहा है पानी से होने वाले धारा Dingad जो बाद में कई / बर्फ पिघल अन्य बर्फ मिलती नदियों और अंत में बुक्की गांव के पास भागीरथी नदी में विलीन हो जाती है कहा जाता है. कई अच्छी तरह से विकसित Meadows और Proglacial 2 कि.मी. दूर स्थित झीलों हैं. ग्लेशियर के नीचे थूथन. इन Meadows, झीलों और अन्य संरचनाओं खुद हमें अतीत के इतिहास और ग्लेशियर के व्यवहार बताने के लिए और भी अच्छा शिविर साइटों प्रदान करते हैं.

ग्लेशियर आसानी से उत्तरकाशी से पहुंचा जा सकता है. 56 कि.मी. की दूरी लगभग. उत्तरकाशी से गंगोत्री के लिए सड़क पर, बुक्की गांव 2 कि.मी. दूर है. बस से भागीरथी नदी के दाहिने किनारे पर स्थित टर्मिनस. Dokriani ग्लेशियर के रास्ते पर, एक के लिए चलना है
23 किलोमीटर. सड़क (बुक्की गांव) से. भागीरथी नदी पार करने के बाद एक पगडंडी प्रवाह के साथ खड़ी पर्वत Tela शिविर (2500 मीटर) से ऊपर ढलानों. Tela से एक 12 किमी हट गुज्जर के लिए. Dingad धारा के साथ चलाने के लिए एक को कई पार ऊपर और नीचे की पेशकश की लकीरें मार्ग है, छोटे और बड़े कई धाराओं और देवदार, एक प्रकार का फल, ओक, पाइन के घने जंगलों मिश्रित पूर्ण शांति और सौहार्द का वातावरण प्रदान करना आदि. इस तरह दिल को छू सुंदरता एक करके अभिभूत कठिनाइयों के बिना रास्ता पार करती है. गुर्जर हट (उनकी भैंसों के साथ एक ग्रीष्मकालीन शिविर ofGujjars) 3500 मी की ऊंचाई पर स्थित है, सिर्फ 5 किलोमीटर दूर. Dokriani ग्लेशियर के नीचे. गुर्जर हट घाटी के प्रवेश द्वार है. घाटी अलग देश ग्लेशियर द्वारा गठित और बर्फ से ढके चोटियों से घिरा सुविधाओं के साथ एक सज्जन ढलान है. यह जगह शिविर के लिए अच्छा है और एक को ग्लेशियर और आसपास के इलाकों में चलने के लिए और छोटे चोटियों चढ़ाई कर सकते हैं. केवल गुर्जर झोपड़ियां और वाडिया इंस्टिट्यूट ofHimalayan भूविज्ञान के एक बेस (ग्लेशियर थूथन के पास) शिविर देहरादून रास्ते पर झूठ. एक क्षेत्र का दौरा करने के लिए अपने भोजन, तंबू और हल्के गर्म कपड़ों के लिए खुद व्यवस्था करनी पड़ती है. सर्वश्रेष्ठ यात्रा के मौसम गर्मियों और शरद ऋतु भर में है. उपरोक्त दो ग्लेशियरों के अलावा, केदार Rudugaira, और कुछ अन्य Jaonii ग्लेशियरों जो उसी तरह से सुलभ हो रहे हैं

दूनागिरी ग्लेशियर:
दूनागिरी ग्लेशियर एक धौली हिमनद जहां विभिन्न आकृति और आकार के 500 से अधिक हिमनद, डी और संकीर्ण घाटियों में झूठ की गंगा प्रणाली के महत्वपूर्ण ग्लेशियर से एक है. महत्वपूर्ण ग्लेशियरों यहाँ हैं Changbang, Girthi, एक नितिन ग्लेशियरों होती, दूनागिरी ग्लेशियर 5.5 किलोमीटर है. लंबे, एक पदोन्नति के बीच विस्तार से यह थूथन 4240 मीटर है, जो ग्लेशियर के टर्मिनल बिंदु है 5150 मीटर सिर. एक ग्लेशियर से होने वाले धारा Jum गांव के पास धौली गंगा में विलीन हो जाती है.

ग्लेशियर जुमा से जोशीमठ-Malari सड़क के रास्ते पहुंचा जा सकता है. 8 कि.मी. की दूरी. जुमा से Doondgiri गांव निहित है. दूनागिरी गांव से एक 12 किमी. दूनागिरी नहर के किनारे लंबी पैदल यात्रा रन ग्लेशियर थूथन पहुँचने के लिए. Bagini इस घाटी में एक और ग्लेशियर है. दूनागिरी घाटी में पिछले गांव है. ग्लेशियर tliere के आसपास के क्षेत्र के पास शिविर के लिए एक अच्छी जगह है. अच्छा करने के लिए olace दौरा करने का समय मध्य अक्टूबर के मध्य MAV है.

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