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Saturday, May 2, 2009

जंगल के साथ ही जल गई कई घरों की खुशियां भी

 

पौड़ी गढ़वाल। तमाम दावे, वनों को आग से बचाने की सारी कवायदें, पानी की तरह बहाई गई लाखों रुपये की रकम और इस मौसम में आग मुक्त जंगल के सभी वादे धरे के धरे रह गए। देखते ही देखते धुआं उठा और जंगल जलने लगे पर जिम्मेदार विभागों की नींद नहीं खुली। हाथ पर हाथ बांधे अधिकारी अपनी 'फायर लाइनों' के भरोसे बैठे रहे और आग ने जंगलों के साथ कई घरों की खुशियों को भी जलाकर राख कर दिया। शुक्रवार को पौड़ी में एक ही गांव के पांच लोगों के जंगल की आग में जान गंवाने के बाद वन विभाग की कार्यप्रणाली कठघरे में आ गई है। हादसे ने उन 'फायर लाइनों' की उपयोगिता पर भी सवाल उठा दिए हैं, जिनके भरोसे विभाग हर बार खुद अपनी पीठ थपथपाता रहा है।

हर साल 14 फरवरी से वन महकमा फायर सीजन का शोर मचाता है। लाखों रुपये पानी की तरह बहाकर जंगलों में जर्मन पैटर्न पर 'फायर लाइन' बनाई जाती हैं। दावे किए जाते हैं कि इससे जंगल में आग एक क्षेत्र विशेष से आगे किसी सूरत में नहीं फैलेगी, लेकिन पिछले कुछ सालों से यह दावा धुआं हो रहा है। फायर लाइनें आग पर काबू पाने में बिलकुल नाकाम साबित हो रही हैं। ऐसे में इनकी उपयोगिता पर भी सवाल उठने लगे हैं। इसके बावजूद महकमा इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहा। हर बार बस आग पर काबू की कोशिश की की बात कह अधिकारी समस्या से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन शुक्रवार को हुए हादसे ने महकमे की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान उठा दिए हैं।

शुक्रवार को गगवाड़ा गांव में हुए हादसे ने छह लोगों की जान लेली और सात लोगों को गंभीर रूप से झुलसा दिया। गांव से केवल पांच किलोमीटर दूरी पर कमिश्नरी मुख्यालय और वन महकमे के सिविल सोयम व फारेस्ट विभाग स्थित है, लेकिन फायर लाइन के भरोसे बैठा कोई भी अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। महकमे की उदासीनता देख ग्रामीणों ने खुद ही आग पर काबू पाने का प्रयास किया, लेकिन उनकी इसी कोशिश ने उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया। यहां सवाल उठ रहा है कि अगर विभाग ने यहां फायर लाइन बनाई थी, तो आग बेकाबू क्यों हो गई और लाइन आग को आगे बढ़ने से क्यों नहीं रोक सकी। और अगर लाइन नहीं बनाई गई थी, तो फिर इस हादसे की जिम्मेदारी किसकी है।

हादसे के बाद गगवाड़ा के ग्रामीणों से लेकर पौड़ी तक के लोग इन सवालों के जवाब मांगने लगे हैं। वजह चाहे जो भी रही हो, लेकिन जब घटना के बाबत डीएम समेत वन विभाग के उच्चाधिकारियों से संपर्क की कोशिशें की गई, तो सभी के फोन आउट आफ कवरेज चल रहे थे।

अपणि-बोली-भाषा का बगैर न त अपणि उन्नति हवै कद और न ही समाज की। जु समाज अपणि-बोली भाषा-अर-रिती-रिवाज से शर्म करदू ऊ वैकू पतन कू सबसे बडू कारण छ।
 r.p. chamoli

Thursday, April 30, 2009



ऐसे हुआ उत्तराखण्ड का गठन

है अगर बिश्वास तो मंजिल मिलेगी, शर्त ये बिन रुके चलना पडेगा । १९३८ से पहले गोरखो के आक्रमण व उनके द्वारा किये अत्याचरो से अन्ग्रेजी शाशन द्वारा मुक्ति देने व बाद मे अन्ग्रेजो द्वारा भी किये गये शोषण से आहत हो कर उत्तराखण्ड के बुद्धिजीवियो मे इस क्षेत्र के लिये एक प्रथक राजनैतिक व प्रशासनिक इकाई गठित करने पर गम्भीरता से सहमति घर बना रही थी. समय-समय पर वे इसकी माग भी प्रशासन से करते रहे.१९३८ = ५-६ मई, को कान्ग्रेस के क्षीनगर गढ्वाल सम्मेलन मे क्षेत्र के पिछडेपन को दूर करने के लिये एक प्रथक प्रशासनिक व्यवस्था की भी माग की गई. इस सम्मेलन मे माननीय प्रताप सिह नेगी, जवहरलाल नेहरू व विजयलक्षमी पन्डित भी उपस्थित थे.१९४६: हल्द्वानी सम्मेलन मे कुर्मान्चल केशरी माननीय बद्रीदत्त पान्डेय, पुर्णचन्द्र तिवारी, व गढ्वाल केशरी अनसूया प्रसाद बहुगुणा द्वारा पर्वतीय क्षेत्र के लिये प्रथक प्रशासनिक इकाई गठित करने की माग की किन्तु इसे उत्तराखण्ड के निवासी एवम तात्कालिक सन्युक्त प्रान्त के मुख्यमन्त्री गोविन्द बल्लभ पन्त ने अस्वीकार कर दिया. १९५२: देश की प्रमुख राजनैतिक दल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम महासचिव, पी.सी.. जोशी ने भारत सरकार से प्रथक उत्तराखण्ड राज्य गठन करने का एक ग्यापन भारत सरकार को सोपा. पेशावर काण्ड के नायक व प्रसिध्द स्वतन्त्रता सेनानी चन्द्र सिह गढ्वाली ने भी प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु के समक्ष प्रथक पर्वतीय राज्य की माग क एक ग्यापन दिया. १९५५: २२ मई नई दिल्ली मे पर्वतीय जनविकास समिति की आम सभा सम्पन्न. उत्तराखण्ड क्षेत्र को प्रस्तावित हिमाचल प्रदेश में मिला कर ब्रहद हिमाचल प्रदेश बनाने की मांग.१९५६: प्रथक हिमाचल प्रदेश बनाने की मांग राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा ठुकराने के बाबजूद ग्रहमन्त्री गोविन्द बल्लभ पन्त ने अपने बिशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुये हिमाचल प्रदेश की मांग को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया. किन्तु उत्तराखण्ड के बारे में कुछ नहीं किया. १९६६: अगस्त माह में उत्तरप्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र के लोगों ने प्रधानमन्त्री को ग्यापन भेज कर प्रथक उत्तरखण्ड राज्य की मांग की.१९६७: (१० - ११ जून) : जगमोहन सिंह नेगी एवम चन्द्र भानू गुप्त की अगुवाई में रामनगर कांग्रेस सम्मेलन में पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिये प्रथक प्रशासनिक आयोग का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा. २४-२५ जून, प्रथक पर्वतीय राज्य प्राप्ति के लिये आठ पर्वतीय जिलों की एक ’पर्वतीय राज्य परिषद का गठन नैनीताल में किया गया जिसमें दयाक्र्ष्ण पान्डेय अध्यक्ष एवम ऋशिबल्लभ सुन्दरियाल, गोविन्द सिहं मेहरा आदि शामिल थे. १४-१५ अक्टूबर: दिल्ली में उत्तराखण्ड विकास संगोष्टी का उदघाटन तत्कालिन केन्द्रिय मन्त्री अशोक मेहता द्वारा दिया गया जिसमें सांसद एवम टिहरी नरेश मान्वेन्द्र शाह ने क्षेत्र के पिछडेपन को दूर करने के लिये केन्द्र शासित प्रदेश की मांग की.१९६८: लोकसभा में सांसद एवम टिहरी नरेश मान्वेन्द्र शाह के प्रस्ताव के आधार पर योजना आयोग ने पर्वतीय नियोजन प्रकोष्ठ खोला. १९७०: (१२ मई) तात्कालिक प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं का निदान प्राथमिकता से करने की घोषणा की.१९७१: मा० मान्वेन्द्र शाह, नरेन्द्र सिंह बिष्ट, इन्द्रमणि बडोनी और लक्क्षमण सिंह जी ने अलग राज्य के लिये कई जगह आन्दोलन किये.१९७२: क्ष्री रिषिबल्लभ सुन्दरियाल एवम पूरण सिंह डंगवाल सहित २१ लोगों ने अलग राज्य की मांग को लेकर बोट क्लब पर गिरफ़्तारी दी.१९७३: पर्वतीय राज्य परिषद का नाम उत्तरखण्ड राज्य परिषद किया गया. सांसद प्रताप सिंह बिष्ट अध्यक्ष, मोहन उप्रेती, नारायण सुंदरियाल सदस्य बने.१९७८: चमोली से बिधायक प्रताप सिंह की अगुवाई में बदरीनाथ से दिल्ली बोट क्लब तक पदयात्रा और संसद का घेराव का प्रयास. दिसम्बर में राष्त्रपति को ग्यापन देते समय १९ महिलाओं सहित ७१ लोगों को तिहाड भेजा गया जिन्हें १२ दिसम्बर को रिहा किया गया. १९७९: सांसद त्रेपन सिंह नेगी के नेत्रत्व में उत्तराखण्ड राज्य परिषद का गठन. ३१ जनवरी को भारी वर्षा एवम कडाके की ठंड के बाबजूद दिल्ली में १५ हजार से भी अधिक लोगों ने प्रथक राज्य के लिये मार्च किया.१९७९: (२४-२५ जुलाई) मंसूरी में पत्रकार द्वारिका प्रसाद उनियाल के नेत्रत्व में पर्वतीय जन विकास सम्मेलन का आयोजन. इसी में उत्तराखण्ड क्रांति दल की स्थापना. सर्व क्ष्री नित्यानन्द भट्ट, डी.डी. पंत, जगदीश कापडी, के. एन. उनियाल, ललित किशोर पांडे, बीर सिंह ठाकुर, हुकम सिंह पंवार, इन्द्रमणि बडोनी और देवेन्द्र सनवाल ने भाग लिया. सम्मेलन में यह राय बनी कि जब तक उत्तराखण्ड के लोग राजनीतिक संगठन के रूप एकजुट नहीं हो जाते, तब तक उत्तराखण्ड राज्य नहीं बन सकता अर्थात उनका शोषण जारी रहेगा. इसकी परिणिति उत्तराखण्ड क्रांति दल की स्थापना में हुई. १९८०: उत्तराखण्ड क्रांति दल ने घोषणा की कि उत्तराखण्ड भारतीय संघ क एक शोषण बिहीन, वर्ग बिहीन और धर्म निर्पेक्ष राज्य होगा.१९८२: प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने मई में बद्रीनाथ मे उत्तराखण्ड क्रांति दल के प्रतिनिधि मंडल के साथ ४५ मिनट तक बातचीत की. १९८३: २० जून को राजधानी दिल्ली में चौधरी चरण सिंह ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उत्तराखण्ड राज्य की मांग राष्त्रहित में नही है. १९८४: भा.क.पा. की सहयोगी छात्र संगठन, आल इन्डिया स्टूडेंट्स फ़ैडरेशन ने सितम्बर, अक्टूबर में पर्वतीय राज्य के मांग को लेकर गढवाल क्षेत्र मे ९०० कि.मी. लम्बी साईकिल यात्रा की. २३ अप्रैल को नैनीताल में उक्रान्द ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नैनीताल आगमन पर प्रथक राज्य के समर्थन में प्रदर्शन किया. १९८७: अटल बिहारी बाजपायी, भा.ज.पा. अध्यक्ष ने, उत्तराखण्ड राज्य मांग को प्रथकवादी नाम दिया. ९ अगस्त को बोट क्लब पर अखिल भारतीय प्रवासी उक्रांद द्वारा साम्केतिक भूख हडताल और प्रधान्मन्त्री को ग्यापन दिया. इसी दिन आल इन्डिया मुस्लिम यूथ कांन्वेन्सन ने उत्तराखण्ड आन्दोलन को समर्थन दिया. २३ नबम्बर को युवा नेता धीरेन्द्र प्रताप भदोला ने लोकसभा मे दर्शक दीर्घा में उत्तरखण्ड राज्य निर्माण के समर्थन में नारेबाजी की. १९८८: २३ फ़रवरी : राज्य आन्दोलन के दूसरे चरण में उक्रांद द्वारा असहयोग आन्दोलन एवम गिरफ़्तारियां दी. २१ जून: अल्मोडा में ’नये भारत में नया उत्तराखण्ड’ नारे के साथ ’उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ का गठन. २३ अक्टूबर: जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, नई दिल्ली में हिमालयन कार रैली का उत्तराखण्ड समर्थकों द्वारा बिरोध. पूलिस द्वारा लाठी चार्ज. १७ नबम्बर: पिथौरागड मे नारायण आक्ष्रम से देहारादून तक पैदल यात्रा.१९८९: मु.मं. मुलायम सिह यादव द्वारा उत्तराखण्ड को उ.प्र. का ताज बता कर अलग राज्य बनाने से साफ़ इन्कार. १९९०: १० अप्रैल: बोट क्लब पर उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के तत्वाधान में भा.ज.पा. ने रैली आयोजित की.१९९१: ११ मार्च: मुलायम सिंह यादव ने उत्तराखण्ड राज्य मांग को पुन: खारिज किया. १९९१: ३० अगस्त: कांग्रेस नेताओं ने "ब्रहद उत्तराखण्ड" राज्य बनाने की मांग की.१९९१: उ.प्र. भा.ज.पा. सरकार द्वारा प्रथक राज्य संबंधी प्रस्ताव संस्तुति के साथ केन्द्र सरकार के पास भेजा. भा.ज.पा. ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी प्रथक राज्य का वायदा किया
writer hitesh

Tuesday, April 21, 2009

News Updates

खतरे में नैनीताल: दरक सकता है बलिया नाला!

-करोड़ों खर्च होने के बाद भी भू-स्खलन का खतरा आशंका: कई गांव की करीब 20 हजार आबादी आ सकती है खतरे की जद में -भाजपा विधायक ने शासन को लिखी चिट्ठी, आशंका जताई हल्द्वानी: बलिया नाला एक बार फिर नैनीताल के लिए खतरा बन गया है। नाले के आसपास पहाड़ों में पड़ी दरारें बढ़ती जा रही हैैं। साथ ही धीमी गति से भू-स्खलन भी हो रहा है। खतरा नजर भले ही न आ रहा हो मगर बरसात के समय तबाही मचा सकता है। भाजपा विधायक ने भी भयावह होती स्थिति से शासन को अवगत करा दिया है। नैनीताल की विश्व प्रसिद्ध झाील का लुत्फ उठाने देश ही नहीं बल्कि विश्वभर के लोग हर साल और हर समय आते हैैं। इस झाील में पानी संतुलन से अधिक न हो, इसके लिए बलिया नाला निकाला गया है। जो झाील से ब्रेबरी पुल तक है। यह नाला अंग्र्रेजों ने निकाला था। इस नाले में होकर झाील का पानी रानीबाग में आकर गौला नदी में मिलता है। चार साल पहले इस नाले को 15.56 करोड़ के प्रोजेक्ट से तैयार किया गया है। बावजूद इसमें भू-स्खलन की स्थिति बनी रहने से इसकी गुणवत्ता पर उंगलियां उठा रही है। सिंचाई विभाग के सूत्र बताते हैैं कि वीरभट्टी, कृष्णापुर, रहीश होटल का क्षेत्र, राजकीय इंटर कालेज और आलूखेत में पड़ी दरारें अभी तक ज्यों की त्यों हैैं। यह हाल गरमी के समय में है। यह हाल बढ़ती आबादी और आवागमन से बढ़ते बोझा से पैदा हो रही है। स्थिति से भाजपा विधायक खडग़ सिंह बोहरा ने भी शासन को अवगत करा दिया है। उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि बलिया नाला नैनीताल की नींव है। उसमें करोड़ों खर्च के बावजूद भू-स्खलन की स्थिति बनी हुई है। नाले की तली और साइडें वीरभट्टी तक पक्की है। नाले की बुनियाद और उसके दोनों ओर की पहाडिय़ों का भारी कटाव व धसाव अभी भी हो रहा है, जो नैनीताल के लिए कभी खतरा बन सकता है। इस स्थिति को गंभीरता से लिए बिना अगर झाील संरक्षण योजना या फिर जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत कार्य कराये जा रहे हैैं, तो वह सभी कार्य व्यर्थ हैं। इधर, राज्य उद्यमिता विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष डा.रमेश पांडे ने फोन पर बताया कि आधा दर्जन इलाके खतरे में हैैं। इस बाबत तत्कालीन कांग्र्रेस सरकार में उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखकर दिया था, जिसमें उन्होंने रोप-वे की तर्ज पर स्वीडन अथवा और कहीं विदेश के इंजीनियर बुलाकर मजबूती से काम कराने की मांग की गई थी। इंसेट:::::::::शासन ने मांगी डीपीआर हल्द्वानी: सिंचाई विभाग उत्तर परिक्षेत्र के मुख्य अभियंता एबी पाठक भी नाले की कमजोरी स्वीकारते हैैं। उनका कहना है कि झाील से लेकर करीब डेढ़ किमी तक नाले का तल कुछ साल पहले पक्का कर दिया था। बाकी हिस्सा कच्चा है। जहां पहाड़ कमजोर हैैं वहां भू-स्खलन की स्थिति से हालत चिंताजनक हो जाती है। विभाग पूरी नजर रखे हुए है। शासन ने भी बलिया नाले की डीपीआर मांगी है, इस पर जल्द अध्ययन कर रिपोर्ट भेजी जा रही है।

-छोटे गधेरों में पनचक्की से बनाई जाए बिजली

बड़े बांधों का विरोध किया सुंदरलाल बहुगुणा : पर्यावरणविद् पद्मभूषण सुंदर लाल बहुगुणा का कहना है कि पहाड़ की चोटियों पर पानी ले जाना चाहिए, उनके ढालों पर पेड़ लगाने चाहिए और बड़े बांधों के बजाय छोटे-छोटे गाड-गधेरों में पनचक्की से बिजली पैदा की जानी चाहिए। (धार ऐंच पाणी, ढाल पर डाला, बिजली बणावा खाला-खाला) उन्होंने कहा कि चुनाव लड़ रहे सभी सियासी दलों के एजेंडा भी यह बात होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बांध पानीकी स्थायी समस्या का तात्कालिक हल है। रविवार को देहरादून के जीएमएस रोड स्थित एक होटल में 'चुनाव और हिमालय संसाधन एवं नीति' विषय पर पत्रकार वार्ता में सुंदर लाल बहुगुणा ने कहा कि राजनीति ही सब कुछ तय करती है, इसलिए चुनाव में आम जनता को जल, जंगल, जमीन के मुद्दों के सकारात्मक हल के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव डालना चाहिए। राजनीतिक दलों के एजेंडे में पर्यावरण के मुद्दे न होना चिंता की बात है। उन्होंने देश में प्रकृति से सामंजस्य बनाती एक हिमालय नीति की जरूरत पर बल दिया। सुंदरलाल बहुगुणा की पत्नी विमला बहुगुणा ने कहा कि राजस्व बढ़ोतरी के लिए शराब को प्रोत्साहन देने का विरोध करना चाहिए। पद्मश्री डा.अनिल जोशी ने कहा कि देश में अब तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना के लिए मूल प्राकृतिक संसाधनों के बजाय औद्योगिक वृद्धि, कृषि को आधार बनाया जाता रहा है। इस परंपरा को तोड़ते हुए जंगल, पानी, नदियों को जीडीपी का आधार बनाया जाना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो देश के जीडीपी में हिमालय की भागीदारी 40 प्रतिशत से भी ज्यादा हो जाएगी, मगर अफसोस कि राजनीतिक दल देश की आर्थिक, सामाजिक व सीमा की सुरक्षा करने वाले हिमालय पर ध्यान नहीं देते हैं। ंने कांग्रेस तथा यूपीए के खिलाफ भाजपा के मुददों के रूप में गिनाया।

क्या होगा दिवाकर के इस्तीफे का हश्र

सरकार से समर्थन वापसी पर जल्द फैसले के नहीं हालात सरकार में रहते हुए भी सरकार से बाहर रहने की उत्तराखंड क्रांति दल की रणनीति! उक्रांद नेता दिवाकर भट्ट ने मंत्री पद से इस्तीफा तो दे दिया है पर इसे मंजूरी नहीं मिली है। उनकी पार्टी सरकार से समर्थन वापसी की बात तो कर रही है पर पार्टी के नेता लोकसभा चुनाव को पहली प्राथमिकता बता रहे हैैं। जाहिर है कि इस मुद्दे पर जल्द फैसले के हालात नहीं हैं। ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि इस इस्तीफे क्या हश्र होगा और चुनाव तक कोई तस्वीर साफ होगी या नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस समय सूबे की भाजपा सरकार बहुमत के अंतिम पायदान पर खड़ी है। ऐसे में साथ चल रहे लोगों की सियासी चालें भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन रही हैं। काबीना मंत्री दिवाकर भट्ट को गत दिवस अचानक ही नैतिकता याद आ गई और उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे डाला। मजेदार बात यह है कि उक्रांद के एक मात्र मंत्री ने इस्तीफा दे दिया पर पार्टी नेताओं के पास सरकार से समर्थन वापसी के मुद्दे पर निर्णय लेने को समय ही नहीं है। कहा जा रहा है कि उनके लिए लोकसभा चुनाव पहली प्राथमिकता है। इसके पीछे मंशा चाहे जो भी हो पर इतना साफ है कि उक्रांद इस मामले में कोई जल्दबाजी के मूड में नहीं है।पहले बात यूकेडी की। सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या यह भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश है और अगर ऐसा है तो इस इस्तीफे का हश्र क्या होगा। अगर लोकसभा चुनाव होने तक उक्रांद नेताओं को समर्थन वापसी पर निर्णय का वक्त नहीं मिला तो यह क्षेत्रीय दल सरकार से बाहर होकर भी सरकार के साथ रहेगा। ऐसे में चुनाव में प्रचार के वक्त उक्रांद नेताओं के पास भाजपा पर तीखे प्रहार करने का मौका होगा। यानि मंशा 'सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे' वाली कहावत पर काम करने की है। अब यही स्टैंड पर कायम रहता है तो क्या यह माना जाएगा कि उसके रणनीतिकारों की नजर में वोटर के पास सोचने-समझाने की शक्ति नहीं और उक्रांद गठबंधन धर्म के साथ ही प्रतिपक्षी का धर्म भी निभाना चाहता है, लेकिन क्या यह मुमकिन है। इस सबके अलावा इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र बिंदु दिवाकर भट्ट की रणनीति क्या है, इसे लेकर भी कयास ही लगाए जा सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि जब कुछ अर्सा पहले उन पर इस्तीफे का भारी दबाव था तब उन्होंने न केवल इससे किनारा कर लिया था बल्कि परोक्ष रूप से अपनी ही पार्टी को चेतावनी भी दे डाली थी।अब एक नजर भाजपा पर, यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं लगता कि बहुमत की कगार पर खड़ी भाजपा में ऐन चुनाव के वक्त इस राजनैतिक घटनाक्रम से कोई खलबली नजर नहीं आ रही है। जाहिर है कि या तो पार्टी सब कुछ मैनेज करने को इस कदर भरोसेमंद है कि उसे सरकार के भविष्य की कोई चिंता ही नहीं, या फिर उसकी नजर में यह परिणति उक्रांद के अंदरूनी संघर्ष की है, जिसे नियंत्रित करना पार्टी की खुद की ही जिम्मेदारी है।---पहले विभाग से दिया था इस्तीफादेहरादून: लगता है दिवाकर को इस्तीफे से खासा लगाव है। आठ माह पहले ही दिवाकर ने इसी तरह अचानक ही खाद्य विभाग से इस्तीफा दे दिया था। कई रोज तक राजनीतिक नाटक चला और दिवाकर विभाग संभाले रहे। चर्चा है कि इस बार भी कहीं ऐसा ही तो नहीं होने वाला। ---------उक्रांद से चल रही है बातचीत: डा.जैन राज्य सरकार अपने दम पर अभी भी बहुमत में : भाजपा के प्रदेश सह प्रभारी डा.अनिल जैन ने कहा कि प्रदेश सरकार पर कोई संकट नहीं है। संख्या बल के आधार पर भाजपा अपने दम पर बहुमत में है। वैसे उक्रांद के साथ भी बातचीत चल रही है।प्रदेश कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत में डा.जैन ने कहा कि मौजूदा 68 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के 35 विधायक हैं। दो निर्दलियों का भी समर्थन है। यूकेडी से भी बातचीत चल रही है। ऐसे में कोई दिक्कत वाली बात नहीं है।उन्होंने कहा कि पहले फेज के चुनाव ने भाजपा तथा एनडीए खेमे को खुश होने का मौका दिया है, लालू यादव की तरह कुछ और लोग हैं जिन्हें झाल्लाते हुए देखा जा सकता है। उन्होंने एक बार फिर से भाजपा के मुद्दों को गिनाया। उन्होंने कहा कि स्विस बैंकों में भारतीयों के काले धन को वापस लाने में आखिर किसे दिक्कत हो सकती है। यूपीए का उत्तराखंड के साथ सौतेला व्यवहार और आतंकवादी हमलों को उन्होंने कांग्रेस तथा यूपीए के खिलाफ भाजपा के मुददों के रूप में गिनाया।

प्रदेश में हर साल बढ़ जाते हैं ५००० पेंशनरपेंशन बिल अब १००० करोड़

देहरादून। बढ़ता पेंशन बिल भी अब सरकार के आर्थिक मोरचे पर परेशानी का सबब बन रहा है। रिटायर होने वाले कर्मियों की सं2या में तेजी से इजाफा होने का अनुमान है। ऐसे में सरकार को पेंशन केलिए ही खासी धनराशि जुटानी पड़ सकती है। पेंशन रिवीजन के कारण ही सरकार को करीब ३०० करोड़ का अतिरि1त आर्थिक व्यय भार वहन करना पड़ रहा है।छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों के लागू होने के बाद से ही पेंशन पर करीब ४० प्रतिशत का इजाफा हुआ है। एरियर को छोड़ भी दिया जाए तो पेंशन पर ही हजार करोड़ से अधिक का व्यय भार है। यह राशि आने वाले समय में तेजी से बढ़ेगी। वि8ा विभाग के अनुमान के मुताबिक २००९-१० में ही करीब ४००० सरकारी कर्मचारी सेवानिवृत हो जाएंगे। इतने कर्मियों का पेंशन व्यय भार तो बढ़ेगा ही। खास बात यह है कि प्रदेश में प्रति वर्ष औसत ५००० पेंशनर बढऱहे हैं। २०१५ तक पेंशनरों की सं2या सवा ला2ा के करीब होगी। प्रदेश में इतने ही राज्य कर्मचारी भी हैं। इस समय करीब ९० हजार हैं और इनपर देयता भी १०३६ करोड़ बन रही है। राज्य गठन के समय करीब ४४ हजार पेंशनर राज्य में थे और देयता भी करीब १४५ करोड़ की ही बनी थी। साफ है कि पेंशन बिल भी आर्थिक मोरचे पर सरकार को परेशान कर सकते हैं। हालांकि, शासन का मानना है कि लगातार बढ़ रहे इस वर्ग को बोझा न मानकर संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए। १९, अप्रैलइस बार कष्टकारी नहीं होगी बदरी-केदार यात्राअधिकांश स्थानों पर सड़क निर्माण का कार्य हुआ पूरा अमर उजाला 4यूरोदेहरादून। बदरी-केदार धाम की यात्रा के लिए इस बार यात्रियों को खराब रास्तों की समस्या से नहीं जूझाना होगा। पूरे रूट पर केवल कुछ किमी के टुकड़े को छोड़ दिया जाए तो शेष यात्रा को निरापद बना दिया गया है। यही नहीं, पिछले सालों की तुलना में यात्रा मार्ग पर इस साल जोखिम भी कम हो गया है। हालांकि, प्रदेश में ५०० से अधिक स्थल चिक्षित किए गए थे। इनमें यात्रा रूट के अधिकांश स्थानों पर सुरक्षा उपाय भी पूरे कर लिए गए हैं। चार धाम यात्रा शुरू होने में मात्र एक सप्ताह बचा है। इस बीच यात्रा मार्ग को दुरुस्त किये जाने का काम भी अंतिम चरण में हैं। पिछले कुछ सालों से यात्रा मार्ग की हालत काफी बिगड़ी हुई थी। डलब लेन होने के कारण जगह-जगह निर्माण कार्य चल रहा है। प्रशासन को भी यात्रा सीजन के दौरान मार्गों के खराब हालत को लेकर खासी मुसीबत उठानी होती है। पिछला यात्रा सीजन तो जैसे-तैसे निपटने के बाद शासन और प्रशासन के स्तर पर यात्रा मार्ग को दुरुस्त करने के निर्देश जारी होते रहे हैं। हालांकि, अभी पूरा मार्ग पर काम समाप्त नहीं हुआ है। लेकिन स्थितियां पिछले साल के मुकाबले काफी बेहतर स्थिति में है। मंडलायु1त की ओर यात्रा प्रशासन की ओर से यात्रा शुरू होने से पूर्व अधिकांश स्थलों पर काम पूरा करने का दबाव बना हुआ है। यह माना जा रहा है कि यात्रियों के लिए इस बार की यात्रा पिछले साल की तरह कष्टकारी नहीं होगी।

प्रोटीन की खान हैं पहाड़ी अनाजनई टिहरी।

अल्पप्रयुक्त होने वाले मंडुवा, रामदाना एवं झांगोरा जैसे अनाज अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं। इनका प्रयोग बिस्कुट बनाने से लेकर हलुवा, क्रिस्पीज, गुलगुला, बड़ी और पापड़ बनाने में भी होने लगा है।मंडुवे का उपयोग पहले रोटी बनाने के लिए होता था। इसकी रोटी काली सी होती है। रानीचौरी परिसर के वैज्ञानिकों ने इसकी ब्रीड में परिवर्तन किया है। जिससे मंडुवे की रोटी भी गेहंू की तरह हो गई है। मंडुवे के बिस्कुट की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। इसकी वजह मंडुवे में अधिक पोषक तत्व होना है। रामदाने का हलवा भी गुणकारी मानते हुए वैज्ञानिकों ने इसे बहुत अच्छा बताया है। झांगोरा से स्नै1स, क्रिस्पजी, पापड़ आदि भी बनाए जा रहे हैं। पर्वतीय परिसर के कृषि वैज्ञानिक प्रो.एम द8ाा एवं डा. विजय यादव बताते हैं कि किसानों को मोटे अनाजों से वैज्ञानिक विधि के आधार पर नए दौर के भोज्य पदार्थं बनाने की जानकारी देने से उनकी आय बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि परिसर की ओर से परंपरागत फसलों से बने व्यंजनों की प्रतियोगिता में स्वाद, रंग और स्वरूप के आधार पर किए गए मूल्यांकन में भी इनका प्रतिशत बहुत अच्छा रहा है।

-गढ़वाल फिल्म से शुरू किया फिल्मों का सफर -माया नगरी में अलग पहचान बनाना चाहती है चारु -दर्शिल सफारी के साथ कर रही है एक फिल्म बालीवुड में देहरादून की एक और बाला ने दस्तक दी है। गढ़वाली फिल्म 'ब्यो' से शुरुआत करने वाली चारु शर्मा इन दिनों मशहूर फिल्म निर्देशक प्रियदर्शन के साथ 'बम-बम बोले' में अपनी अभिनय कला के जौहर दिखा रही हैं। इस फिल्म में 'तारे जमीन पर' फेम दर्शिल सफारी मुख्य भूमिका में हैं। रविवार को देहरादून में पत्रकारों से बातचीत में चारु ने बताया कि उन्होंने कैरियर की शुरूआत गढ़वाली फिल्म 'ब्यो' से की थी। इसके बाद वह चंडीगढ़ में एयरलाइंस कंपनी से जुड़ गई। वहां उनकी मुलाकात मनोज अग्रवाल से हुई। जिन्होंने उसे अपनी फिल्म 'शाबाश' में लीड रोल दिया। यह फिल्म जल्द रिलीज होने वाली है। मनोज अग्रवाल ने ही चारु को प्रियदर्शन से मिलाया। जिन्होंने उसे फिल्म 'बमबम बोले' में रोल दिया। चारू कहती हैं कि यह रोल आमिर खान के उस रोल की तरह है, जो उन्होंने तारे जमीन पर फिल्म में किया था। इससे पूर्व वह साउथ की दो फिल्मों व विक्रम भट्ट द्वारा निर्देशित छोटे परदे पर आने वाली एक शार्ट फिल्म 'शोहरत, नफरत और शो-बिज' में अपनी कला के जौहर दिखा चुकी हैं। वह बचपन से ही अमिताभ बच्चन, आमिर खान और श्रीदेवी की फैन रही हैं। अपनी मेहनत पर विश्वास करने वाली चारु का मानना है कि बालीवुड में यूथ को काफी स्ट्रगल करना पड़ता है। फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के लिए कोई शार्टकट नहीं होता। इसके लिए कड़ी मेहनत जरूरी है। प्रारंभिक शिक्षा जीजीआईसी इंटर कालेज राजपुर रोड और ग्रेजुएशन डीएवी पीजी से करने वाली चारू की माता हेमवंती शर्मा जूनियर हाई स्कूल में शिक्षिका हैं। उनसे बड़ी दो बहनें हैं तथा भाई सबसे छोटा है।


खतरे में नैनीताल: दरक सकता है बलिया नाला!

-करोड़ों खर्च होने के बाद भी भू-स्खलन का खतरा आशंका: कई गांव की करीब 20 हजार आबादी आ सकती है खतरे की जद में -भाजपा विधायक ने शासन को लिखी चिट्ठी, आशंका जताई हल्द्वानी: बलिया नाला एक बार फिर नैनीताल के लिए खतरा बन गया है। नाले के आसपास पहाड़ों में पड़ी दरारें बढ़ती जा रही हैैं। साथ ही धीमी गति से भू-स्खलन भी हो रहा है। खतरा नजर भले ही न आ रहा हो मगर बरसात के समय तबाही मचा सकता है। भाजपा विधायक ने भी भयावह होती स्थिति से शासन को अवगत करा दिया है। नैनीताल की विश्व प्रसिद्ध झाील का लुत्फ उठाने देश ही नहीं बल्कि विश्वभर के लोग हर साल और हर समय आते हैैं। इस झाील में पानी संतुलन से अधिक न हो, इसके लिए बलिया नाला निकाला गया है। जो झाील से ब्रेबरी पुल तक है। यह नाला अंग्र्रेजों ने निकाला था। इस नाले में होकर झाील का पानी रानीबाग में आकर गौला नदी में मिलता है। चार साल पहले इस नाले को 15.56 करोड़ के प्रोजेक्ट से तैयार किया गया है। बावजूद इसमें भू-स्खलन की स्थिति बनी रहने से इसकी गुणवत्ता पर उंगलियां उठा रही है। सिंचाई विभाग के सूत्र बताते हैैं कि वीरभट्टी, कृष्णापुर, रहीश होटल का क्षेत्र, राजकीय इंटर कालेज और आलूखेत में पड़ी दरारें अभी तक ज्यों की त्यों हैैं। यह हाल गरमी के समय में है। यह हाल बढ़ती आबादी और आवागमन से बढ़ते बोझा से पैदा हो रही है। स्थिति से भाजपा विधायक खडग़ सिंह बोहरा ने भी शासन को अवगत करा दिया है। उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि बलिया नाला नैनीताल की नींव है। उसमें करोड़ों खर्च के बावजूद भू-स्खलन की स्थिति बनी हुई है। नाले की तली और साइडें वीरभट्टी तक पक्की है। नाले की बुनियाद और उसके दोनों ओर की पहाडिय़ों का भारी कटाव व धसाव अभी भी हो रहा है, जो नैनीताल के लिए कभी खतरा बन सकता है। इस स्थिति को गंभीरता से लिए बिना अगर झाील संरक्षण योजना या फिर जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत कार्य कराये जा रहे हैैं, तो वह सभी कार्य व्यर्थ हैं। इधर, राज्य उद्यमिता विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष डा.रमेश पांडे ने फोन पर बताया कि आधा दर्जन इलाके खतरे में हैैं। इस बाबत तत्कालीन कांग्र्रेस सरकार में उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखकर दिया था, जिसमें उन्होंने रोप-वे की तर्ज पर स्वीडन अथवा और कहीं विदेश के इंजीनियर बुलाकर मजबूती से काम कराने की मांग की गई थी। इंसेट:::::::::शासन ने मांगी डीपीआर हल्द्वानी: सिंचाई विभाग उत्तर परिक्षेत्र के मुख्य अभियंता एबी पाठक भी नाले की कमजोरी स्वीकारते हैैं। उनका कहना है कि झाील से लेकर करीब डेढ़ किमी तक नाले का तल कुछ साल पहले पक्का कर दिया था। बाकी हिस्सा कच्चा है। जहां पहाड़ कमजोर हैैं वहां भू-स्खलन की स्थिति से हालत चिंताजनक हो जाती है। विभाग पूरी नजर रखे हुए है। शासन ने भी बलिया नाले की डीपीआर मांगी है, इस पर जल्द अध्ययन कर रिपोर्ट भेजी जा रही है।

-छोटे गधेरों में पनचक्की से बनाई जाए बिजली

बड़े बांधों का विरोध किया सुंदरलाल बहुगुणा : पर्यावरणविद् पद्मभूषण सुंदर लाल बहुगुणा का कहना है कि पहाड़ की चोटियों पर पानी ले जाना चाहिए, उनके ढालों पर पेड़ लगाने चाहिए और बड़े बांधों के बजाय छोटे-छोटे गाड-गधेरों में पनचक्की से बिजली पैदा की जानी चाहिए। (धार ऐंच पाणी, ढाल पर डाला, बिजली बणावा खाला-खाला) उन्होंने कहा कि चुनाव लड़ रहे सभी सियासी दलों के एजेंडा भी यह बात होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बांध पानीकी स्थायी समस्या का तात्कालिक हल है। रविवार को देहरादून के जीएमएस रोड स्थित एक होटल में 'चुनाव और हिमालय संसाधन एवं नीति' विषय पर पत्रकार वार्ता में सुंदर लाल बहुगुणा ने कहा कि राजनीति ही सब कुछ तय करती है, इसलिए चुनाव में आम जनता को जल, जंगल, जमीन के मुद्दों के सकारात्मक हल के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव डालना चाहिए। राजनीतिक दलों के एजेंडे में पर्यावरण के मुद्दे न होना चिंता की बात है। उन्होंने देश में प्रकृति से सामंजस्य बनाती एक हिमालय नीति की जरूरत पर बल दिया। सुंदरलाल बहुगुणा की पत्नी विमला बहुगुणा ने कहा कि राजस्व बढ़ोतरी के लिए शराब को प्रोत्साहन देने का विरोध करना चाहिए। पद्मश्री डा.अनिल जोशी ने कहा कि देश में अब तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना के लिए मूल प्राकृतिक संसाधनों के बजाय औद्योगिक वृद्धि, कृषि को आधार बनाया जाता रहा है। इस परंपरा को तोड़ते हुए जंगल, पानी, नदियों को जीडीपी का आधार बनाया जाना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो देश के जीडीपी में हिमालय की भागीदारी 40 प्रतिशत से भी ज्यादा हो जाएगी, मगर अफसोस कि राजनीतिक दल देश की आर्थिक, सामाजिक व सीमा की सुरक्षा करने वाले हिमालय पर ध्यान नहीं देते हैं। ंने कांग्रेस तथा यूपीए के खिलाफ भाजपा के मुददों के रूप में गिनाया।

क्या होगा दिवाकर के इस्तीफे का हश्र

सरकार से समर्थन वापसी पर जल्द फैसले के नहीं हालात सरकार में रहते हुए भी सरकार से बाहर रहने की उत्तराखंड क्रांति दल की रणनीति! उक्रांद नेता दिवाकर भट्ट ने मंत्री पद से इस्तीफा तो दे दिया है पर इसे मंजूरी नहीं मिली है। उनकी पार्टी सरकार से समर्थन वापसी की बात तो कर रही है पर पार्टी के नेता लोकसभा चुनाव को पहली प्राथमिकता बता रहे हैैं। जाहिर है कि इस मुद्दे पर जल्द फैसले के हालात नहीं हैं। ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि इस इस्तीफे क्या हश्र होगा और चुनाव तक कोई तस्वीर साफ होगी या नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस समय सूबे की भाजपा सरकार बहुमत के अंतिम पायदान पर खड़ी है। ऐसे में साथ चल रहे लोगों की सियासी चालें भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन रही हैं। काबीना मंत्री दिवाकर भट्ट को गत दिवस अचानक ही नैतिकता याद आ गई और उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे डाला। मजेदार बात यह है कि उक्रांद के एक मात्र मंत्री ने इस्तीफा दे दिया पर पार्टी नेताओं के पास सरकार से समर्थन वापसी के मुद्दे पर निर्णय लेने को समय ही नहीं है। कहा जा रहा है कि उनके लिए लोकसभा चुनाव पहली प्राथमिकता है। इसके पीछे मंशा चाहे जो भी हो पर इतना साफ है कि उक्रांद इस मामले में कोई जल्दबाजी के मूड में नहीं है।पहले बात यूकेडी की। सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या यह भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश है और अगर ऐसा है तो इस इस्तीफे का हश्र क्या होगा। अगर लोकसभा चुनाव होने तक उक्रांद नेताओं को समर्थन वापसी पर निर्णय का वक्त नहीं मिला तो यह क्षेत्रीय दल सरकार से बाहर होकर भी सरकार के साथ रहेगा। ऐसे में चुनाव में प्रचार के वक्त उक्रांद नेताओं के पास भाजपा पर तीखे प्रहार करने का मौका होगा। यानि मंशा 'सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे' वाली कहावत पर काम करने की है। अब यही स्टैंड पर कायम रहता है तो क्या यह माना जाएगा कि उसके रणनीतिकारों की नजर में वोटर के पास सोचने-समझाने की शक्ति नहीं और उक्रांद गठबंधन धर्म के साथ ही प्रतिपक्षी का धर्म भी निभाना चाहता है, लेकिन क्या यह मुमकिन है। इस सबके अलावा इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र बिंदु दिवाकर भट्ट की रणनीति क्या है, इसे लेकर भी कयास ही लगाए जा सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि जब कुछ अर्सा पहले उन पर इस्तीफे का भारी दबाव था तब उन्होंने न केवल इससे किनारा कर लिया था बल्कि परोक्ष रूप से अपनी ही पार्टी को चेतावनी भी दे डाली थी।अब एक नजर भाजपा पर, यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं लगता कि बहुमत की कगार पर खड़ी भाजपा में ऐन चुनाव के वक्त इस राजनैतिक घटनाक्रम से कोई खलबली नजर नहीं आ रही है। जाहिर है कि या तो पार्टी सब कुछ मैनेज करने को इस कदर भरोसेमंद है कि उसे सरकार के भविष्य की कोई चिंता ही नहीं, या फिर उसकी नजर में यह परिणति उक्रांद के अंदरूनी संघर्ष की है, जिसे नियंत्रित करना पार्टी की खुद की ही जिम्मेदारी है।---पहले विभाग से दिया था इस्तीफादेहरादून: लगता है दिवाकर को इस्तीफे से खासा लगाव है। आठ माह पहले ही दिवाकर ने इसी तरह अचानक ही खाद्य विभाग से इस्तीफा दे दिया था। कई रोज तक राजनीतिक नाटक चला और दिवाकर विभाग संभाले रहे। चर्चा है कि इस बार भी कहीं ऐसा ही तो नहीं होने वाला। ---------उक्रांद से चल रही है बातचीत: डा.जैन राज्य सरकार अपने दम पर अभी भी बहुमत में : भाजपा के प्रदेश सह प्रभारी डा.अनिल जैन ने कहा कि प्रदेश सरकार पर कोई संकट नहीं है। संख्या बल के आधार पर भाजपा अपने दम पर बहुमत में है। वैसे उक्रांद के साथ भी बातचीत चल रही है।प्रदेश कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत में डा.जैन ने कहा कि मौजूदा 68 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के 35 विधायक हैं। दो निर्दलियों का भी समर्थन है। यूकेडी से भी बातचीत चल रही है। ऐसे में कोई दिक्कत वाली बात नहीं है।उन्होंने कहा कि पहले फेज के चुनाव ने भाजपा तथा एनडीए खेमे को खुश होने का मौका दिया है, लालू यादव की तरह कुछ और लोग हैं जिन्हें झाल्लाते हुए देखा जा सकता है। उन्होंने एक बार फिर से भाजपा के मुद्दों को गिनाया। उन्होंने कहा कि स्विस बैंकों में भारतीयों के काले धन को वापस लाने में आखिर किसे दिक्कत हो सकती है। यूपीए का उत्तराखंड के साथ सौतेला व्यवहार और आतंकवादी हमलों को उन्होंने कांग्रेस तथा यूपीए के खिलाफ भाजपा के मुददों के रूप में गिनाया।

प्रदेश में हर साल बढ़ जाते हैं ५००० पेंशनरपेंशन बिल अब १००० करोड़

देहरादून। बढ़ता पेंशन बिल भी अब सरकार के आर्थिक मोरचे पर परेशानी का सबब बन रहा है। रिटायर होने वाले कर्मियों की सं2या में तेजी से इजाफा होने का अनुमान है। ऐसे में सरकार को पेंशन केलिए ही खासी धनराशि जुटानी पड़ सकती है। पेंशन रिवीजन के कारण ही सरकार को करीब ३०० करोड़ का अतिरि1त आर्थिक व्यय भार वहन करना पड़ रहा है।छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों के लागू होने के बाद से ही पेंशन पर करीब ४० प्रतिशत का इजाफा हुआ है। एरियर को छोड़ भी दिया जाए तो पेंशन पर ही हजार करोड़ से अधिक का व्यय भार है। यह राशि आने वाले समय में तेजी से बढ़ेगी। वि8ा विभाग के अनुमान के मुताबिक २००९-१० में ही करीब ४००० सरकारी कर्मचारी सेवानिवृत हो जाएंगे। इतने कर्मियों का पेंशन व्यय भार तो बढ़ेगा ही। खास बात यह है कि प्रदेश में प्रति वर्ष औसत ५००० पेंशनर बढऱहे हैं। २०१५ तक पेंशनरों की सं2या सवा ला2ा के करीब होगी। प्रदेश में इतने ही राज्य कर्मचारी भी हैं। इस समय करीब ९० हजार हैं और इनपर देयता भी १०३६ करोड़ बन रही है। राज्य गठन के समय करीब ४४ हजार पेंशनर राज्य में थे और देयता भी करीब १४५ करोड़ की ही बनी थी। साफ है कि पेंशन बिल भी आर्थिक मोरचे पर सरकार को परेशान कर सकते हैं। हालांकि, शासन का मानना है कि लगातार बढ़ रहे इस वर्ग को बोझा न मानकर संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए। १९, अप्रैलइस बार कष्टकारी नहीं होगी बदरी-केदार यात्राअधिकांश स्थानों पर सड़क निर्माण का कार्य हुआ पूरा अमर उजाला 4यूरोदेहरादून। बदरी-केदार धाम की यात्रा के लिए इस बार यात्रियों को खराब रास्तों की समस्या से नहीं जूझाना होगा। पूरे रूट पर केवल कुछ किमी के टुकड़े को छोड़ दिया जाए तो शेष यात्रा को निरापद बना दिया गया है। यही नहीं, पिछले सालों की तुलना में यात्रा मार्ग पर इस साल जोखिम भी कम हो गया है। हालांकि, प्रदेश में ५०० से अधिक स्थल चिक्षित किए गए थे। इनमें यात्रा रूट के अधिकांश स्थानों पर सुरक्षा उपाय भी पूरे कर लिए गए हैं। चार धाम यात्रा शुरू होने में मात्र एक सप्ताह बचा है। इस बीच यात्रा मार्ग को दुरुस्त किये जाने का काम भी अंतिम चरण में हैं। पिछले कुछ सालों से यात्रा मार्ग की हालत काफी बिगड़ी हुई थी। डलब लेन होने के कारण जगह-जगह निर्माण कार्य चल रहा है। प्रशासन को भी यात्रा सीजन के दौरान मार्गों के खराब हालत को लेकर खासी मुसीबत उठानी होती है। पिछला यात्रा सीजन तो जैसे-तैसे निपटने के बाद शासन और प्रशासन के स्तर पर यात्रा मार्ग को दुरुस्त करने के निर्देश जारी होते रहे हैं। हालांकि, अभी पूरा मार्ग पर काम समाप्त नहीं हुआ है। लेकिन स्थितियां पिछले साल के मुकाबले काफी बेहतर स्थिति में है। मंडलायु1त की ओर यात्रा प्रशासन की ओर से यात्रा शुरू होने से पूर्व अधिकांश स्थलों पर काम पूरा करने का दबाव बना हुआ है। यह माना जा रहा है कि यात्रियों के लिए इस बार की यात्रा पिछले साल की तरह कष्टकारी नहीं होगी।

प्रोटीन की खान हैं पहाड़ी अनाजनई टिहरी।

अल्पप्रयुक्त होने वाले मंडुवा, रामदाना एवं झांगोरा जैसे अनाज अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं। इनका प्रयोग बिस्कुट बनाने से लेकर हलुवा, क्रिस्पीज, गुलगुला, बड़ी और पापड़ बनाने में भी होने लगा है।मंडुवे का उपयोग पहले रोटी बनाने के लिए होता था। इसकी रोटी काली सी होती है। रानीचौरी परिसर के वैज्ञानिकों ने इसकी ब्रीड में परिवर्तन किया है। जिससे मंडुवे की रोटी भी गेहंू की तरह हो गई है। मंडुवे के बिस्कुट की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। इसकी वजह मंडुवे में अधिक पोषक तत्व होना है। रामदाने का हलवा भी गुणकारी मानते हुए वैज्ञानिकों ने इसे बहुत अच्छा बताया है। झांगोरा से स्नै1स, क्रिस्पजी, पापड़ आदि भी बनाए जा रहे हैं। पर्वतीय परिसर के कृषि वैज्ञानिक प्रो.एम द8ाा एवं डा. विजय यादव बताते हैं कि किसानों को मोटे अनाजों से वैज्ञानिक विधि के आधार पर नए दौर के भोज्य पदार्थं बनाने की जानकारी देने से उनकी आय बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि परिसर की ओर से परंपरागत फसलों से बने व्यंजनों की प्रतियोगिता में स्वाद, रंग और स्वरूप के आधार पर किए गए मूल्यांकन में भी इनका प्रतिशत बहुत अच्छा रहा है।

-गढ़वाल फिल्म से शुरू किया फिल्मों का सफर -माया नगरी में अलग पहचान बनाना चाहती है चारु -दर्शिल सफारी के साथ कर रही है एक फिल्म बालीवुड में देहरादून की एक और बाला ने दस्तक दी है। गढ़वाली फिल्म 'ब्यो' से शुरुआत करने वाली चारु शर्मा इन दिनों मशहूर फिल्म निर्देशक प्रियदर्शन के साथ 'बम-बम बोले' में अपनी अभिनय कला के जौहर दिखा रही हैं। इस फिल्म में 'तारे जमीन पर' फेम दर्शिल सफारी मुख्य भूमिका में हैं। रविवार को देहरादून में पत्रकारों से बातचीत में चारु ने बताया कि उन्होंने कैरियर की शुरूआत गढ़वाली फिल्म 'ब्यो' से की थी। इसके बाद वह चंडीगढ़ में एयरलाइंस कंपनी से जुड़ गई। वहां उनकी मुलाकात मनोज अग्रवाल से हुई। जिन्होंने उसे अपनी फिल्म 'शाबाश' में लीड रोल दिया। यह फिल्म जल्द रिलीज होने वाली है। मनोज अग्रवाल ने ही चारु को प्रियदर्शन से मिलाया। जिन्होंने उसे फिल्म 'बमबम बोले' में रोल दिया। चारू कहती हैं कि यह रोल आमिर खान के उस रोल की तरह है, जो उन्होंने तारे जमीन पर फिल्म में किया था। इससे पूर्व वह साउथ की दो फिल्मों व विक्रम भट्ट द्वारा निर्देशित छोटे परदे पर आने वाली एक शार्ट फिल्म 'शोहरत, नफरत और शो-बिज' में अपनी कला के जौहर दिखा चुकी हैं। वह बचपन से ही अमिताभ बच्चन, आमिर खान और श्रीदेवी की फैन रही हैं। अपनी मेहनत पर विश्वास करने वाली चारु का मानना है कि बालीवुड में यूथ को काफी स्ट्रगल करना पड़ता है। फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के लिए कोई शार्टकट नहीं होता। इसके लिए कड़ी मेहनत जरूरी है। प्रारंभिक शिक्षा जीजीआईसी इंटर कालेज राजपुर रोड और ग्रेजुएशन डीएवी पीजी से करने वाली चारू की माता हेमवंती शर्मा जूनियर हाई स्कूल में शिक्षिका हैं। उनसे बड़ी दो बहनें हैं तथा भाई सबसे छोटा है।


Thursday, April 9, 2009

                                                        pahar blogs se sabhar!!!!!

   ढोल को सम्मान मिलने लगा है


अंगरेजी साहित्य के प्रो. दाताराम पुरोहित लोककलाओं पर शोध में ऐसे खोए कि ढोल गले में डाल लिया। आज पहाड़ के तमाम लोकवाद्य उनसे बातें हैं और वह उन बातों को देश दुनिया को सुनाना चाहते हैं। पहाड़ के मेले, उत्सवों को वे नन्हें बच्चे के भोले कौतुक के साथ देखते हैं और दिखाना चाहते हैं। चाहते हैँ कि यहां नए नए प्रयोग हों। 1000 ही क्यों, अपने ढोल से और ताल निकलें। जब किसी एक कलाकार की मौत होती है ये शख्स बहुत टूटता है, क्योंकि वह उसकी कीमत जानता है। मेरी लोग ढ़ोल बजाने वाला कहकर मजाक बनाते मैं इससे और उत्साहित होता। आज गढ़वाल विश्वविद्यालय में ढ़ोल बजाने वाला गांव का कलाकार फैकल्टी है। विदेश से लोग उसको पूछने आ रहे हैं। ढ़ोल को सम्मान मिलने लगा है।

- ढोल को लेकर उनके इस प्रयास पर हुई हमारी बातचीत - ..... उत्तराखंड की संस्कृति पर अध्ययन करते हुए, कया समझा आया? इसको दो रूपों में देख सकते हैं। भौतिक व अध्यात्मिक। सामान्यतया उत्तराखंड की संस्कृति से आशय यहां की भौतिक संस्कृति से है। इसका उदभव जीवन की विविधता व दिनचर्या से हुआ है। इतिहास के विकास क्रम में कई चीजों का समागम हुआ है। इनके बारे में बहुत जानकारी नहीं है। पांडवों के हिमालय आगमन पर उत्सव संकेत से इसे समझा सकते हैं। बाद में मध्य एशिया से आये खस, कत्यूरी, नाग आदि का उस पर प्रभाव पड़ा। पूरब में काली नदी व पश्चिम में यमुना नदी के मार्ग से यहां प्रवेश बड़ा। मध्यम में स्थित गंगा की दुर्गम घाटियों में प्रवेश शंकराचार्य के आगमन के बाद ही संभव हो सका। निचोड़ के रूप में कहूं तो लोकधारा की संस्कृति व शास्त्रीयता की संस्कृति दोनों ने अपना स्थान बनाया। पर चाहे चितई के गोलू देवता हों या भगवान बद्रीनाथ इनके उत्सवों में परफार्मिंग आटर्स के कलाकार हावी हैं। यूं कह सकते हैं कि तमाम कठिनाईयों के बीच जो लोग कला को आगे बढ़ाते रहे कैसे देखते हैं इस योगदान को?

औरों की बनिस्पत इस वर्ग का श्रम से सबसे करीबी नाता रहा है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता। धरती, भूगोल व हिमालय की जटिलताओं के सर्वाधिक भुक्तभोगी वहीं हैं। इसलिए इस खंड की संस्कृति उनकी सांसों व पसीने से निकली। इस वर्ग को अब जाति की जगह कलाकार के रूप में देखना शुरु करें। जिस कला को हम उत्तराखंड की कला के रूप में प्रचारित करते हैँ उसके कलाकारों को सम्मान देना सीखें। हमने श्रीनगर विश्वविद्यालय में रंगमंडल बनाने के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा है। 15 लोक कलाकारों का रंगमंडल बने। उसमें ढ़ोली, हुड़किया, जगरिया आदि के उस्तादों को शामिल करें। उनहें पेशेवर बनाकर उन्हें सम्मानित करें। प्रोफेसरों की तरह उनहें तनख्वाह दें। नहीं तो कलाकारों की नई पीढ़ी इस कला को नहीं छुएगी7 मैंने देखा है पढ़े लिखे लोग इस कला से दूर भाग रहे हैं, जिसमें सम्मान नहीं है। न जीने लायक आजीविका। क्यों जीवित रहनी चाहिए यह कला? ऐसा कहा जा सकता है जो हवा है उसमें ऐसा लग सकता है। लेकिन यह अदभुत कला है। इसे किसी भी हाल में जीवित रखना होगा। मैंने इस पर इतने साल खपाए। मैँ ईमानदारी से कहता हूं। यह बेहद खूबसूरत है। हमारा ढोल से 600 से 1000 तक ताल निकलते हैं। जबकि तबले पर 300 ही बजते हैं। तबला पंडितों के हाथ में कोडिफाईड हो गया। लेकिन ढोल तो जनता का क्रिएशन है। आपको जैसे आनंद दे वैसे बजाओ। यहां नहीं के इस तरफ कुछ बजता है दूसरी तरफ कुछ और। भूगोल की विविधता से इसका प्रसार बढ़ता गया।अभी हम केवी छह जगह के ढ़ोल ही लिपिबद्ध कर पाये हैं। बहुत जगह के होने बाकी हैं। यह अंतरराष्ट्रीय क्षमता की कला है। मैँ अगर यहां का नहीं भी होता तो भी मेरा यही निरपेक्ष मूल्यांकन होता। धीमे स्वर में गायी जाने वाली सघई तो अदभुत है। हमें इस पर बहुत सीरियस एक्सपेरिमेंट भी करने हैं। पर कला के पारखी ही करें। रिसर्च करनी होगी। मछली मारने का उत्सव मौण कितना गजब है। पुरोला में इसमें हजारों लोग शामिल होते थे। 30 हजार लोग मछली मारने का दुनिया में ऐसा कोई उत्सव नहीं है। इसकी बुराईयां निकालकर इसे फिर शुरु किया जाए। गांव से कस्बों में आ गए लोग भी अपनी संस्कृति में लौटें तो उन्हें बाड़ा आनंद आएगा। संयोगवश गिर्दा ने झाूसिया दमाई का रिकार्ड बना लिया। नहीं तो भड़ गायन की यह महान कला कोई नहीं जान पाता। पीपलकोटी का नंदा सिंह नेगी मर गया। मैंने सरकार के पास पास बार बार प्रस्ताव भेजे कुछ नहीं हुआ। खुद भ नहीं कर पाया कुछ। लेनिक कई कलाओं का ज्ञाता यह कलाकार चल दिया। हर दिन कोई न कोई कला मर रही है। हजारों सालों की विरासत गुम हो रही है। युद्धस्तर पर काम करना होगा। हम डाक्यूमेंटेंशन तो कर ही सकते हैं। अगस्त्यमुनि के लोक महाभारत गायन का 100 घंटे का रिकार्ड किया हमने।ऐसे ही काम। केरल के कलाक्षेत्रम व राजस्थान के रूपायन की तरह। राजस्थान का फोक आज अंतरराष्ट्रीय मांग है, लेकिन जब कोमल कोठारी जैसे लोग आगे आये तब। राज्य की संस्कृति को उभारने व मंचों पर लाने के प्रयासों पर आपका मूल्यांकन ? सिर्फ नाज गाना करके कला जीवित नहीं रखी जा सकती। दूसरी तरफ इन प्रयासों का महत्व भी ळे। नए लड़के लड़कियों की अभिरुचि बनाए रखने में इन आयोजना की भूमिका रही है। इन्हें ट्रेनिंग मिली होती तो ये और अच्छा करते। लेकिन मैं कहूंगा संस्कृति चैंतोल व महासू जैसे मेलों ने सुरक्षित रखी है। महासू मंदिर में जब देवता एक जगह से दूसरे जगह प्रस्थान करता है तो एक करोड़ खर्च आता है। नंदा देवी में पिछली बार 56 करोड़ रुपये खर्च हुढ। छह छह मकहीने अलकनंदा की घाटियों में यात्राएं होती हैं। यह सब जनता के सामूहिक प्रयासों से होता है। सरकार आयोजनों के बदले इन गांव से निकले कर्मचारियेां को थोड़े दिन की छुट्टी दे दे। इसी से संस्कृति बचेगी। डंगारियों को गांव जाना ही पड़ेगा ना। मैकाले की शिक्षा पाये लोग आम लोगों की संस्कृति या लोक संस्कृति से नाक भौं सिकोड़ते हैं। आप तो फिर अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे, क्या जरूरत लगी ऐसी? बचपन से रंगमंच में रुचि रही। रामलीला में बहुत रोल किया। फिर रंगमंच से जुड़ गया थोड़े समय बाद महसूस हुआ कि लोक पर प्रो। मेहन उप्रेती व बृजेंद्रलाल साह के अलावाकिसी ने कोई काम नहीं किया। उनसे प्रभावित होकर मैंने 1985 से काम करना शुरु कर दिया। पिुर मेरी पीझएचडी का विष मध्यकालीन इंग्लैंड व गढ़वाल की लोकसंस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन था। मैंने इसे पूरा करने में जल्दी नहीं की। पूरे आठ साल लगाए। उसे एमझा। 1996 में मेरे काम से प्रभावित होकर बृजेंद्रलाल साह ने मुझासे नैनीताल में कहा बाबा तू बहुत आगे जाएगा। मेरे बाद तू ही इस काम को संभालेगा। मेरी लोग ढ़ोल बजाने वाला कहकर मजाक बनाते मैं इससे और उत्साहित होता। आज गढ़वाल विश्वविद्यालय में ढ़ोल बजाने वाला गांव का कलाकार फैकल्टी है। विदेश से लोग उसको पूछने आ रहे हैं। ढ़ोल को सम्मान मिलने लगा है। सम्पकॅ-प्रो. (अंगरेजी) दाताराम पुरोहित गढवाल विश्वविद्यालय -श्रीनगर गढवाल इस साक्षात्कार के बारे में अपनी राय दीजिएगां-jaydeo34@gmail.com

धधकते अंगारों पर नाचते हैं जाख देवता
केदारनाथ और मंदाकिनी घाटी में बैसाख माह विशेष रूप से पौराणिक मेलों के लिए जाना जाता है। गुप्तकाशी के जाखधार में लगने वाले जाख मेले की अलग ही पहचान है। इसके लिए नारायणकोटि, देवशाल और कोठेड़ा गांवों के लोग मेला शुरू होने के दस दिन पूर्व ही तैयारियों में जुट जाते हैं। मेले में प्रसिद्ध जाख देवता के पश्वा (जिस व्य1ित पर देवता अवतरित होता है।) मेले के दिन जलते आग के अंगारों में प्रविष्ठ होकर अद्भुत नृत्य प्रस्तुत करते हैं। बैसाख माह की दो गते यानि १५ अप्रैल को मेले का भव्य आयोजन होता है। देवशाल गांव के प्रसिद्ध विंधनिवासिनी मंदिर में जाख देवता के आचार्य देवशाली ब्राह्मण, कोठेड़ा के पुजारी और नारायणकोटि गांव के लोग सेवक के रूप में मां जगदंबा की पूजा-अर्चना करते हैं। इसी दौरान क्षेत्र में धान की बुआई का दिन भी तय किया जाता है। इस वर्ष २६ गते (८ अप्रैल) बुआई, २९ गते (११ अप्रैल) को पापड़ी त्यौहार और ३० गते (१२ अप्रैल) को अग्निकुंड हेतु लकड़ी लाने का दिन निश्चित किया गया है। देवशाल गांव में उपल4ध भोजपत्र पर अंकित लेखों में इस मेले की परंपरा का निर्वहन ग्रामीणों द्वारा वर्ष ११११ से करने का उल्लेख मिलता है। मेले के एक दिन पूर्व संक्रांति के दिन विधि-विधान और मंत्रोच्चारण के साथ अग्निकुंड में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। बाद में मेले के दिन जाख देवता के पश्वा इन धधकते अंगारों में अद्भुत नृत्य करते हैं। इस देवीय शक्ति को देखने के लिए दूर-दराज के गांवों से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़कर आती है। बाद में अग्निकुंड की अवशेष राख को लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

हेलीकॉप्टर से एक साथ होगी चार धाम की यात्रारुद्रप्रयाग।

इस वर्ष उ8ाराखंड के चारों धामों गंगोत्री, यमनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ में आने वाले तीथयात्रियों की यात्रा आसान होने जा रही है। इसके लिए पवन हंस हेलीकॉप्टर लिमिटेड देहरादून और फाटा से चारों धामों के लिए हेलीकॉप्टर सेवा शुरू करने जा रही है। हालांकि लोक सभा चुनाव होने के चलते सेवा १८ मई से शुरू होगी।२६ मई २००३ को अगस्त्यमुनि में स्थित अस्थाई हैलीपैड से पवन हंस के हेलीकॉप्टर ने उड़ान भरी थी। कंपनी इस बार देहरादून और फाटा से केदारनाथ धाम के साथ ही तीन अन्य धामों के लिए भी सेवा शुरू कर रही है। कंपनी ने फाटा से केदारनाथ धाम के यात्रा भाड़े को भी कम कर सात हजार रुपये कर दिया है। तीर्थयात्रियों के रुझाान को देखते हुए इस बार कंपनी द्वारा छह सीटर हैलीकॉप्टर की व्यवस्था की जा रही है। कंपनी के जनरल मैनेजर संजीव कुमार ने बताया १५ मई तक लोक सभा चुनाव होने के कारण सेवा देर से शुरू की जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि मौसम ने साथ दिया तो इस बार फाटा के साथ ही देहरादून और अगस्त्यमुनि से भी सेवा शुरू की जाएगी। हालांकि इसके लिए अभी किराया तय नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि यात्रियों के रुझाान को देखते हुए फाटा से दो और देहरादून से एक हेलीकॉप्टर सेवा देगा। ज्ञात हो कि केदारनाथ धाम के कपाट ३० अप्रैल को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खुल जाएंगे।

यात्रा से पहले जगमग होगा बदरीधामगोपेश्वर।

चमोली जिले में कम हिमपात के चलते इस बार जहां सीमा सड़क संगठन को बदरीनाथ तक पहुंचने के लिए राजमार्ग से ग्लेशियर नहीं हटाने पड़ेंगे, वहीं विद्युत लाइन को भी कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा है। जिससे बदरीनाथ में १५ से २० अप्रैल के बीच विद्युत आपूर्ती सुचारू कर दी जाएगी।जिले में हर साल भारी हिमपात के चलते यात्रा सीजन शुरू होने से पहले सीमा सड़क संगठन को राजमार्ग में कई स्थानों पर आए बड़े ग्लेशियरों को हटाने में काफी पसीना बहाना पड़ता था, लेकिन बताया गया है कि इस बार राजमार्ग में बदरीनाथ तक ग्लेशियर नहीं है। जबकि, विद्युत लाइन को भी कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा है। विद्युत लाइन का जायजा लेकर बदरीनाथ से लौटे अधिशासी अभियंता विद्युत वितरण खंड गोपेश्वर नंदन सिंह खाती के अनुसार इस बार कम हिमपात के चलते विद्युत लाइन को कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा है। विद्युत लाइनें ठीक हैं केवल हनुमानचट्टी के पास विद्युत विभाग के तीन पोल क्षतिग्रस्त हुए हैं। जिसे शीघ्र ठीक कर १५ से २० अप्रैल के बीच बदरीनाथ धाम में विद्युत आपूर्ति सुचारू कर दी जाएगी। राजमार्ग में ग्लेशियर के बारे में श्री खाती ने बताया कि जोशीमठ से बदरीनाथ तक राजमार्ग में कम हिमपात के चलते ग्लेशियर नहीं है। उधर, अन्य विभागों जल संस्थान, स्वास्थ्य विभाग आदि ने भी यात्रा सीजन शुरू होने से पहले अपनी ओर से की जाने वाली तैयारियां शुरू कर दी हैं।


चौदह सौ जवान मेडिकल के लिए चयनितगौचर। तीन दिनों तक चली सेना की भर्ती रैली में चौदह सौ नौजवान मेडिकल के लिए चयनित किए गए। भर्ती निर्देशक एके चौहान के अनुसार आठ अप्रैल तक गौचर में युवाओं का मेडिकल होगा।मेडिकल के बाद चयनित नौजवानों की २६ अप्रैल को लैंसडाउन में लिखित परीक्षा आयोजित होगी।तीन दिन तक चली थलसेना की भर्ती में २७ हजार से अधिक युवाओं ने भाग लिया। इतनी अधिक सं2या में भर्ती के लिए नौजवानों के पहुंचने से भर्ती अधिकारी भी हैरान दिखे। पुलिस और प्रशासन द्वारा भर्ती के दौरान रहने खाने और शांति सुरक्षा के प्रयासों के बावजूद भी अव्यवस्थाएं व्याप्त रही। स्थानीय जनप्रतिनिधियों, व्यवसायियों और सरस्वती शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य द्वारा किए गए रहने खाने की व्यवस्थाओं से कुछ युवाओं को राहत मिली। भर्ती में शिरकत करने वाले युवाओं में से अधिकांश ने भर्ती के दौरान सेना के जवानों द्वारा बदसलूकी और लाठियां भांजने की शिकायत की। कुछ नौजवान भीड़ में अपना सामान और शैक्षिक प्रमाण पत्र खोने से भी परेशान दिखे। तमाम अव्यवस्थाओं, मुसीबतों और हादसों के बावजूद भर्ती के लिए उमड़ी युवाओं की भीड़ ने पहाड़ के शिक्षित नौजवान की बेरोजगारी, मजबूरी और बेकारी की दास्तां बयां की है।

(पदम विभूषण से सम्मानित अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पर्यावरणविद्) हमें यह गर्व होना चाहिए कि हम लोकतांत्रिक प्रणाली के अंग हैं। लोकतंत्र में एक-एक वोट का अपना महत्व है। संविधान जनता को अपना नेता चुनने का अधिकार देता है। इस लोक जागरण का सबसे बड़ा पर्व चुनाव है। ऐसे में लक्ष्य यह होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की इस पर्व में भागीदारी हो। नागरिकों को उनके कत्र्तव्यों व अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोकतंत्र के सबसे बड़े दुश्मन भय और लालच ताकतवर हो चुके हैं। राजनीतिज्ञों से अपेक्षाएं बेमानी हैं, लिहाजा प्राय: तटस्थ रहने की मनोवृत्ति वाले लोगों को अपनी भूमिका समझानी होगी और 'पीपुल मेनिफेस्टो' बनना चाहिए। राजनैतिक पार्टियों के घोषणा पत्र महज वोट जुटाने के लिए तैयार किए जाते हैं। पीपुल मेनिफेस्टो में जनपक्षीय सवालों को उठाकर प्रत्याशियों से पूछा जाना चाहिए कि वह आम आदमी के लिए क्या करेंगे। विश्व के कई देशों में चुने हुए प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार जनता के पास है। हमारे देश में भी यह अधिकार जनता को मिलना चाहिए। होता यह है कि जीतने के बाद प्रतिनिधि के मन में यह बात घर कर जाती है कि पांच साल तक उसे कोई नहीं हटा सकता। इसलिए लोकतंत्र की मजबूती के लिए जनता को 'रिकाल का अधिकार' जरूरी हो गया है। तभी लोकतंत्र सही मायने में सफल होगा। नीतिनियंता जिस बात को समझाने के बावजूद अंजान बन रहे हैं, वह है भविष्य में होने वाला गंभीर जल संकट। देश को बचाने के लिए मैं लंबे समय से हिमालय नीति बनाने की मांग कर रहा हूं। दुर्भाग्य यह है कि अभी तक इस मामले में खास प्रगति नहीं हुई। हमारा स्लोगन है- 'धार ऐंच पाणी ढाल पर डाला, बिजली बनाओ खाला-खाला'। इससे पर्वतीय क्षेत्र के लोग संपन्न होंगे और देश के अन्य क्षेत्रों को जरूरत का पानी मिल पाएगा। बड़े बांध कभी पेयजल संकट का स्थायी हल नहीं हो सकते। ऐसे बांध बेहद खतरनाक हैं। जर्मनी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। गंगा को अविरल बहने देने व हिमालय नीति का मसला इस चुनाव में बतौर मुद्दा उठना चाहिए। छोटी-छोटी बातों पर लडऩे से बेहतर है कि बुनियादी सवालों को उठाया जाए। इसलिए चुनाव ही वह मौका है और मेरी सबसे अपील है कि वोट अवश्य दें।

ढोल को सम्मान मिलने लगा है।
जुनून है पहाड़ की लोककलाओं को देश-विदेश में एक अलग सम्मान मिले

गढ़वाल विश्वविद्यालय में अंगरेजी साहित्य प्रोफेसर अंगरेजी साहित्य के प्रो. दाताराम पुरोहित लोककलाओं पर शोध में ऐसे खोए कि ढोल गले में डाल लिया। आज पहाड़ के तमाम लोकवाद्य उनसे बातें हैं और वह उन बातों को देश दुनिया को सुनाना चाहते हैं। पहाड़ के मेले, उत्सवों को वे नन्हें बच्चे के भोले कौतुक के साथ देखते हैं और दिखाना चाहते हैं। चाहते हैँ कि यहां नए नए प्रयोग हों। 1000 ही क्यों, अपने ढोल से और ताल निकलें। जब किसी एक कलाकार की मौत होती है ये शख्स बहुत टूटता है, क्योंकि वह उसकी कीमत जानता है। .......ढोल को देश व विदेश में एक अलग पहचान दिलाने वाले प्रो. दाताराम पुरोहित से हुई सीधी बात शीघ्र ही पहाड़ 1 पर -


छात्रों का किया जा रहा मार्गदर्शन देहरादून, : करियर को लेकर चिंतित छत्रों को परेशान होने की जरूरत नहीं। इसका निदान परेड ग्राउंड में चल रहे दून फेयर-2009 में हो जाएगा। फेयर में तमाम शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थानों की ओर से विभिन्न कोर्सेज की जानकारी देने के साथ ही काउंसिलिंग भी की जा रही है। इसे देखते हुए शनिवार को भी फेयर में जबरदस्त भीड़ उमड़ी रही। निदान शिक्षा एवं जन कल्याण समिति के तत्वावधान में चल रहे दून फेयर-2009 में न केवल दून, बल्कि देश के अन्य क्षेत्रों के भी नामी-गिरामी शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान भाग ले रहे हैं। इन संस्थानों के स्टालों में उनके द्वारा संचालित कोर्सेज की जानकारी दी जा रही है, ताकि विद्यार्थी इन्हें करने के बाद भविष्य संवार सकें।

विश्र्व में सबसे सस्ती कार हल्द्वानी में उपलब्ध होगी।
आ ही गयी आम आदमी के सपनों की कार हल्द्वानी: आखिर इंतजार खत्म हुआ,टाटा की ड्रीम कार नैनो शनिवार को हल्द्वानी पहुंच गयी। गोला गणपति मोटर के स्वामी राजेश अग्रवाल व अंकित अग्रवाल ने बताया कि बुकिंग फार्म आ गए है, बुकिंग नौ अप्रैल से शुरू होगी। उसी दिन इसे लांच किया जायेगा। कार की खूबियों को बताते हुए श्री अग्रवाल ने कहा कि इसमें पांच लोगों के बैठने के साथ ही सामान रखने के लिए भी पर्याप्त जगह दी गई है। यह लाल, सफेद, नीले, पीले, ग्रे व गोल्डन छह रंगों में उपलब्ध होगी। नैनो का बेस माडल जहां एक लाख बारह हजार सात सौ का होगा वहां टाप माडल की कीमत करीब एक लाख 70 हजार होगी। कम्पनी के दावों को सच माने तो सस्ते दामों के साथ ही कार काफी किफायती साबित होगी। कम्पनी ने कार के 23.6 किमी प्रति लीटर के माइलेज का दावा किया है। उनका कहना है कि देश ही नहीं विश्र्व में सबसे सस्ती कार हल्द्वानी में उपलब्ध होगी। क्योंकि ट्रांसपोर्ट का खर्चा व टैक्स यहां कम पड़ेगा। इन खूबियों व कम दाम के चलते इस कार के प्रति लोगों में जबरदस्त क्रेज है। अबतक ढाई हजार लोगों ने इसके बारे में इंक्वायरी की है।

कुमाऊं में भी थ्रीजी सेवा शुरू
हल्द्वानी: देहरादून के बाद बीएसएनएल ने हल्द्वानी में थ्री जी सेवा शनिवार को लांच कर दी। इसे एक साल के भीतर राज्य के सभी पर्यटन स्थलों तक विस्तार कर दिया जाएगा। लांचिंग के साथ बीएसएनएल ने वीडियो कांफ्रेंसिंग शुरू की है। इसमें उपभोक्ता थ्री जी सेवा के किसी उपभोक्ता को फोन करते हैं, तो संपर्क होने पर आपको पता चल जाएगा। वह उपभोक्ता कहां खड़ा है और उसके आस-पास किस तरह की गतिविधियां हो रही हैं। साथ ही आप एक-दूसरे को अपने मोबाइल के स्क्रीन पर देखकर बातचीत का सिलसिला जारी रख सकेंगे।


राज्य में सबसे कम शहरी बेरोजगार
Apr 06, देहरादून। इस चुनाव में बेरोजगारी कम से कम उत्तराखंड में अहम मुद्दा नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक ताजा रिपोर्ट 'इंडियन लेबर मार्केट रिपोर्ट -2009' के मुताबिक उत्तराखंड के शहरी क्षेत्र में देश के सबसे कम बेरोजगार हैं। देश के जाने-माने संस्थान टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज की इस रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में शहरी बेरोजगारी देश में सबसे कम यानी उसकी आबादी के 0.5 प्रतिशत है। इसके बाद छत्तीसगढ़ का नंबर है, जहां महज 0.8 प्रतिशत शहरी बेरोजगार हैं। भारत सरकार के नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक गोवा में सबसे ज्यादा यानी 11.4 प्रतिशत और उसके बाद केरल में 9.1 फीसदी शहरी बेरोजगार हैं। देश के स्तर पर ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहरी महिलाएं ज्यादा बेरोजगार हैं। ग्रामीण 7.31 फीसदी की तुलना में 9.2 प्रतिशत शहरी महिलाएं बेरोजगार हैं। गांवों में जहां 60-70 फीसदी महिलाएं श्रम शक्ति का हिस्सा नहीं, शहरों में यह 70-80 प्रतिशत हैं। वैसे रिपोर्ट कुल मिलाकर यह कहती है कि देश में शहरी बेरोजगारी ग्रामीण बेरोजगारी से ज्यादा भयावह है। रिपोर्ट के मुताबिक जो प्रदेश ज्यादा पिछड़े हैं वहां के ज्यादा लोग स्वरोजगार में जुटे हैं। इतना ही नहीं आज खुदरा बाजार रोजगार देने में सबसे बड़े क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। जिसके बाद निर्माण क्षेत्र और फिर हास्पिटैलिटी, ट्रांसपोर्ट, कम्यूनिकेशन, माइनिंग, वित्त बाजार आदि के क्षेत्र अस्थायी रोजगार देने में सफल हुए हैं। ईमेल


पर्यटकों के लिए निगम को मिलीं सात बसें
हल्द्वानी : टूरिस्ट सीजन में पर्यटकों को पर्यटन स्थलों तक पहुंचाने के लिए उत्तराखंड परिवहन निगम के बेड़े में सात और बसें शामिल हुई हैं। यह पर्यटकों को विभिन्न पर्यटन स्थलों का भ्रमण कराएंगी। घाटे से जूझ रहे उत्तराखंड परिवहन निगम को उबारने के लिए पर्यटन सीजन बेहतर मौका है। इसको लेकर मुख्यालय कुमाऊं मंडलीय दफ्तर को सात बसें सौंपी हैं। यह बसें कल सांय तक देहरादून से चल कर हल्द्वानी पहुंच जाएंगी। अगले दिन से इन बसों का संचालन नैनीताल, भीमताल, भवाली, सूखाताल, खुर्पाताल, रानी खेत जैसे पर्यटन स्थलों के लिए शुरू कर दिया जाएगा। काफी लग्जरी बतायी जा रही इन बसों को विशेष तौर से पर्वतीय क्षेत्रों के लिए तैयार किया गया है। इन बसों में चालक-परिचालक सहित कुल 32 यात्री यात्रा कर सकते हैं। बहरहाल संचालन की दिशा में अभी यह नहीं तय हो सका है कि इन बसों का टाइम टेबल क्या होगा? किस डिपो से कितनी बसें चलायी जाएंगी। निगम के प्रबंधक संचालन मुकुल पंत ने बताया कि टूरिस्ट सीजन को देखते हुए इनमे से अधिकांश बसों का संचालन नैनीताल डिपो से किया जाएगा। श्री पंत के मुताबिक एक-दो बसें हल्द्वानी डिपो से भी चलायी जाएंगी। इन बसों की खासियत यह है कि छोटी होने की वजह से पहाड़ पर यह आसानी से घूम जाएंगी। डीजल की खपत कम होगी और पर्यटक भी काफी आराम महसूस करेंगे।

सूबे के वन बरसाएंगे धन
देहरादून उत्तराखंड को जल्द ही अपने विस्तृत वन क्षेत्र का आर्थिक फायदा मिल सकेगा। केंद्र सरकार ने उन राज्यों को आर्थिक मदद देने की योजना बनाई है, जिन्होंने अपना वनावरण राष्ट्रीय औसत से ज्यादा बनाए रखने और उसमें वृद्धि करने में कामयाबी हासिल की है। इस योजना के तहत अगले वित्तीय वर्ष यानी 2009-10 से वित्तीय मदद मिलने की उम्मीद है। योजना आयोग के फार्मूले के हिसाब से उत्तराखंड सभी राज्यों को मिलने वाले धन का सबसे ज्यादा हिस्सा पाने वाले राज्यों में से एक रहेगा। पिछले हफ्ते यानी 23 मार्च को देहरादून में भारतीय वन अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई)में आयोजित बैठक में योजना आयोग की सदस्या इंद्राणी चंद्रशेखर ने यह आश्वासन दिया है। बैठक में आईसीएफआरई के महानिदेशक जगदीश किशवान, एफआरआई के निदेशक डा. एसएस नेगी, विस्तार प्रभाग व शताब्दी वन विज्ञान केंद्र के निदेशक ओमकार सिंह, उत्तराखंड वन विभाग के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक डा. आरवीएस रावत, हिमाचल, अरुणाचल, असोम, छत्तीसगढ़, समेत उन राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जहां वन क्षेत्र राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। मालूम हो कि अब तक देश में कोई ऐसी व्यवस्था नहींहै, जिसके तहत वन संरक्षण की दिशा में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को किसी तरह से आर्थिक लाभ दिए जा सके। केंद्र सरकार देश में कुल वन क्षेत्र कम से कम 33 फीसदी करना चाहती है। उत्तराखंड के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक डॉ. आरवीएस रावत ने बताया कि भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग की वन स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के पास देश के कुल वन क्षेत्र का 1.6 प्रतिशत वन हैं। प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 45.70 प्रतिशत वनावरण है। इनमें 7.48 प्रतिशत अत्यंत सघन वन, 26.92 फीसदी सामान्य सघन वन, 11.30 प्रतिशत खुले वन हैं। प्रदेश के 19 फीसदी क्षेत्र में बर्फ, हिमनद या तेज ढाल हैं जहां वृक्ष उगाना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में उत्तराखंड कुल आवंटित धन का तीन से चार प्रतिशत तक धन पा सकेगा। एफआरआई के निदेशक डॉ. एसएस नेगी ने बताया कि यह धन, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के जरिए मिलेगा। एक बार वित्तीय मदद शुरू हो जाने पर वह लगातार आठ वर्ष तक जारी रहेगी।

बीएड काउंसलिंग की कराएगी सरकार
नैनीताल: राजकीय महाविद्यालय राठ (पौड़ी गढ़वाल) को राज्य कोटे की बीएड सीटों की काउंसलिंग का रास्ता खुल गया है। सरकार की सहमति के बाद इस संबंध में महाविद्यालय प्रशासन द्वारा दायर अवमानना याचिका को हाईकोर्ट ने निस्तारित कर दिया है। राजकीय महाविद्यालय राठ (पौड़ी गढ़वाल) को राज्य कोटे की 50 सीटों का आवंटन सरकार द्वारा किया गया था, जिसकी काउंसलिंग पर सरकार द्वारा रोक लगाई गई थी। इसके बाद महाविद्यालय प्रशासन ने हाईकोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट ने आवंटित सीटों पर काउंसलिंग कराने के निर्देश पारित किए थे। जिसका सरकार द्वारा अनुपालन न होने पर महाविद्यालय प्रशासन ने पुन: हाईकोर्ट में एक अवमानना याचिका दायर की गई थी। याचिका कर्ता द्वारा कहा गया था कि पूर्व में कोर्ट ने सरकार को महाविद्यालय को आवंटित 50 सीटों पर बीएड काउंसिलिंग कराने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद काउंसलिंग नहीं कराई जा रही है। सरकार की ओर से 3 मार्च 09 को अदालत में उच्च शिक्षा सचिव अंजली प्रसाद का एक हलफनामा दायर किया गया। जिसमें बताया गया कि सरकार स्टेट कोटे की 50 सीटों की काउंसिलिंग कराने जा रही हैं। उक्त प्रतिशपथ पत्र से संतुष्ट होकर हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका को निस्तारित कर समाप्त कर दिया।


भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने पार्टी को अलविदा कह ही दिया।
देहरादून, कभी हां, कभी ना के बाद आखिरकार आज भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने पार्टी को अलविदा कह ही दिया। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष हरबंस कपूर को विधानसभा सदस्यता से भी इस्तीफा सौंप दिया है। श्री कपूर ने इस्तीफे के परीक्षण के उपरांत कार्यवाही की बात कही। शुक्रवार शाम करीब साढ़े सात बजे विधायक मुन्ना सिंह चौहान विधानसभा अध्यक्ष हरबंस कपूर से उनके आवास पर मिले। करीब 48 मिनट तक श्री चौहान अध्यक्ष के कक्ष में बैठे। बाहर निकलने के बाद श्री चौहान ने पार्टी व विधानसभा सदस्यता से इस्तीफे की घोषणा की।

अरमान पर भाड़ी न पड़ जाए फरमान
गढ़वाल विवि ने स्ववित्त पोषित कालेजों में प्रवेश पर फिलहाल लगाई रोक देहरादून, : गढ़वाल विश्वविद्यालय की ओर से हाल में जारी किए गए फरमान से यूपीएमटी की प्रवेश परीक्षा प्रभावित हो सकती है। प्रदेश के ग्यारह मेडिकल कालेजों में विभिन्न स्नातक उपाधियों के लिए यूपीएमटी के जरिए छात्रों को प्रवेश दिया जाता है। इनमें नौ कालेज गढ़वाल विवि से संबद्ध हैं। विवि ने पिछले सप्ताह एक फरमान में सभी स्ववित्त पोषित कालजों में प्रवेश पर रोक लगाई है। अभी यह साफ नहीं है कि इन कालेजों में कब तक प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो पाएगी। प्रदेश में एमबीबीएस, बीडीएस, बीएएमएस व बीएचएमएस की उपाधियों के लिए सरकारी, सहायता प्राप्त और स्ववित्त पोषित संस्थानों की संख्या ग्यारह है। इन कालेजों में सरकारी कोटे की सीटों पर प्रवेश के लिए शासन यूपीएमटी के जरिए छात्र चुनता है। ग्यारह कालेजों में से तीन सरकारी, एक सहायता प्राप्त और सात स्ववित्त पोषित हैं। इनमें से नौ कालेज गढ़वाल विवि से और दो कुमाऊं विवि से संबद्ध हैं। इन कालेजों की कुल 760 सीटों में से 505 सरकारी कोटे की हैं। इनमें से 610 सीटों पर प्रवेश देने वाले कालेज गढ़वाल विवि से संबद्ध है। गढ़वाल विवि से संबद्ध स्ववित्त पोषित कालेज में एमबीबीएस की 35, बीएएमएस की 50, बीडीएस की 100 सीटों के लिए छात्र प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं। वहीं, कुमाऊं विवि से संबद्ध सहायता प्राप्त एक कालेज में एमबीबीएस की 85 और स्ववित्त पोषित एक कालेज में बीएचएमएस की 25 सीटों के लिए छात्र यूपीएमटी की परीक्षा में शामिल होते हैं। सरकारी कालेज की बात करें तो प्रदेश में एमबीबीएस के लिए एकमात्र श्रीनगर स्थित कालेज ही है, जो अभी मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया से अनुमति मिलने का इंतजार कर रहा है। बीएएमएस के लिए हरिद्वार स्थित दो सरकारी कालेज हैं, जिनमें 110 छात्रों को प्रवेश मिलेगा। बीडीएस और बीएचएमएस के लिए कोई सरकारी कालेज नहीं है, इसमें प्रवेश लिए छात्रों के पास स्ववित्त पोषित कालेजों का ही विकल्प है। गढ़वाल विवि ने 24 मार्च को स्ववित्त पोषित कालेजों व संस्थानों को पत्र जारी कर कहा कि उनकी संबद्धता रखने या न रखने को लेकर दिशा निर्देश तय किए जाने तक कोई भी कालेज या संस्थान नए सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू नहीं करेगा। विवि द्वारा जारी पत्र मेडिकल की शिक्षा देने वाले संस्थानों को भी मिले हैं। उधर, शासन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार 31 मई से पहले यूपीएमटी की परीक्षा कराने जा रहा है। ऐसे में जब केवल सरकारी या अन्य विवि से संबद्ध कालेजों में ही प्रवेश संभव होगा तो इसका प्रवेश परीक्षा पर प्रभाव पड़ना तय है। उधर, उत्तरांचल आयुर्वेदिक कालेज के निदेशक अश्वनी कांबोज का कहना है कि विवि परीक्षा का आयोजन करता है, प्रवेश शासन और कालेज के बीच का मामला है। उन्होंने कहा कि प्रवेश परीक्षा पर कोई प्रभाव नहीं पडे़गा। यदि गढ़वाल विवि संबद्धता नहीं देता है तो किसी अन्य विवि से सरकार संबद्ध कराएगी। छात्रों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

ग्रामीण महिलाओं ने स्थानीय उत्पादों से किया तैयार किया

ग्यारवे ज्योतिर्लिग भगवान केदारनाथ के दर्शनाथ पंहुचने वाले लोगों को इस बार केदारनाथ में लीचीदाना ,दाल,चने की बजाय ग्र्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार स्थानीय उत्पादों के पंचामृत को प्रसाद के रुप में चढाएंगे। खाद्य प्रसंसकरण विभाग की लाइसेंस अथॉरटी सीएफटीआई मैसूर द्वारा प्रमाणित इस प्रसाद को स्वराज सहकारी समिति मस्ता के स्वयं सहायता समूहोंकी महिलाओं द्वारा तैयार किया गया हैैं

दोहन से बुरांश का अस्तित्व खतरे में
Apr 03, नई टिहरी (टिहरी गढ़वाल)। अपनी खूबियों व औषधीय गुणों के कारण राज्य वृक्ष बुरांस का अस्तित्व खतरे में है। लगातार दोहन से बुरांस के जंगल धीरे-धीरे सिमटते जा रहे है। बुरांस के फूलों से बने जूस में अनेक औषधीय गुण मौजूद है। इन्हीं गुणों के कारण बुरांस के जूस की मांग बढ़ती जा रही है। इससे जहां बुरांस के फूलों का अनियंत्रित दोहन हो रहा है, वहीं इसके लिए अभी तक कोई नीति नहीं बनी गई है। लगातार फूलों की दोहन से जहां नई पौध उगना बंद हो गई है, वहीं पेड़ों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। पहाड़ में भले ही बुरांस से लोगों की आजीविका बढ़ी हो पर इसके दोहन से पर्यावरणीय खतरा पैदा हो गया है। पादप विशेषज्ञों प्रेम सिंह चौहान का कहना है कि बुरांस की पूरी दुनिया में 850 प्रजातियां है, जिनमें से भारत में 80 प्रजातियां है। पांच प्रजातियां हिमालयी क्षेत्र में उगती है। बुरांस की सबसे महत्वपूर्ण प्रजाति रोडो डेनड्रोन आरपोरिया है। अपने गुणों और औषधीय उपयोगिता के चलते इसका लगातार दोहन हो रहा है। बुरांस के अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए समय-समय पर वन विभाग व मंत्रालय को भी लिखा गया, लेकिन वन अधिनियम में फूलों के दोहन को रोकने का प्रावधान न होने से इसका गलत फायदा उठाया जा रहा है।

जयहरिखाल: रोशनी पर मंडराए संकट के बादल
Apr 03, लैंसडौन (पौड़ी गढ़वाल)। विवादों के चलते जयहरिखाल प्रखंड के मेंटेनेंस फ्रैंचाइजी ने विद्युत व्यवस्था से अपने हाथ खींच लिए हैं। फ्रैंचाइजी ने विद्युत विभाग की रसीदों समेत अन्य जरूरी दस्तावेज विभाग में जमा करवा दिए हैं। साथ ही फ्रैंचाइजी ने अधिशासी अभियंता कोटद्वार समेत विभाग के आला अधिकारियों को भी इसकी सूचना दे दी है। फ्रैंचाइजी का आरोप है कि विभागीय अधिकारियों के उपेक्षात्मक बर्ताव के चलते यह कदम उठाया गया है। वहीं, इसके बाद से जयहरिखाल क्षेत्र पर विद्युत संकट मंडराने की आशंका बढ़ गई है।


उक्रांद: नैनीताल से जंतवाल प्रत्याशी
Apr 03, देहरादून। उक्रांद ने नैनीताल से पार्टी अध्यक्ष डा.नारायण सिंह जंतवाल को प्रत्याशी घोषित किया है। साथ ही पांचों सीटों पर चुनाव प्रबंधन को प्रभारी बनाए हैं। कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट ने आज पत्रकार वार्ता में कहा कि उक्रांद पांचों सीटों पर चुनाव लड़ेगा। उन्होंने नैनीताल सीट से पार्टी अध्यक्ष को उम्मीदवार घोषित करने के साथ ही प्रभारियों के नाम भी घोषित किए। हरिद्वार सीट पर दिवाकर भट्ट, अल्मोड़ा पर काशी सिंह ऐरी, नैनीताल पर लक्ष्मण सिंह चुफाल, पौड़ी पर पीएस कठैत और टिहरी पर बीडी रतूड़ी को बतौर प्रभारी नियुक्त किया गया है। श्री भट्ट ने कहा कि भाजपा समझौते को तैयार नहीं हुई। अब उक्रांद पांचों सीटों पर चुनाव लड़ेगा। समर्थन जारी रखने बिंदु पर उन्होंने कहा कि उक्रांद इस समय सरकार को अस्थिर करने को तैयार नहीं है। राजधानी आयोग की रिपोर्ट गैरसैंण के पक्ष में आई तो ठीक है, अन्यथा उक्रांद गैरसैंण राजधानी के लिए संघर्ष जारी रखेगा।


बीएसएनएल ने पेश किए स्पेशल टैरिफ वाउचर
Apr 03, देहरादून। बीएसएनएल उत्तरांचल परिमंडल ने घटी कॉल दरों वाले स्पेशल टैरिफ वाउचर पेश किए हैं। ये वाउचर 90 दिनों तक उपलब्ध रहेंगे। महाप्रबंधक महेन्द्र कुमार के मुताबिक 60 रुपये टैरिफ वाउचर का उपयोग करने पर लोकल कॉल 30 पैसे प्रति मिनट, 130 रुपये के वाउचर पर लोकल कॉल 10 पैसे प्रति मिनट, 35 रुपये के वाउचर पर एसटीडी कॉल एक रुपये प्रति मिनट, 95 रुपये के वाउचर पर लोकल कॉल 30 पैसे व एसटीडी काल 60 पैसे प्रति मिनट तथा तीन सौ रुपये के वाउचर पर मुफ्त लोकल काल का लुत्फ लिया जा सकता है। स्पेशल टैरिफ वाउचर की वैधता अवधि 30 दिन होगी। बीएसएनएल के नार्मल प्रीपेड प्लान के ग्राहक इसका लाभ सी टॉपअप के जरिए ले सकते हैं।


Apr 03, देहरादून। परिवहन निगम ने चंडीगढ़ के बाद अब सात पर्वतीय मार्गो के लिए भी रिजर्वेशन व्यवस्था शुरू कर दी है। पर्वतीय मार्गो पर यात्रा करने वाले यात्री एक सप्ताह पूर्व आरक्षण करा सकते हैं। उत्तराखंड परिवहन निगम अब दिल्ली व चंडीगढ़ के बाद पर्वतीय मार्गो पर भी आरक्षण व्यवस्था लागू कर दी है। इसके तहत उत्तरकाशी, बड़कोट, पुरोला, बागेश्वर, गोपेश्वर, तिरपाली सैंण व बीरोंखाल जाने वाले यात्री एक सप्ताह पूर्व बसों के लिए रिजर्वेशन करा सकते हैं। यह बुकिंग फोन पर अथवा रेलवे स्टेशन के पास स्थित मसूरी बस डिपो में की जा सकती है। परिवहन निगम के उप महाप्रबंधक संचालन दीपक जैन ने बताया कि यात्रियों को बेहतर सुविधा देने के उद्देश्य से निगम ने यह कदम उठाया है।


आस्था का केंद्र है मां कोट भ्रामरी मंदिर
Apr 03, गरुड़ (बागेश्वर)। कत्यूर घाटी के बीचों बीच स्थित मां कोट भ्रामरी मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र होने के साथ ही ऐतिहासिक महत्व का प्रमुख क्षेत्र है। मां नंदा सुनंदा के इस धार्मिक केंद्र में शुक्रवार को चैत्राष्टमी का विशाल मेला लगता है तथा श्रद्धालुओं द्वारा विशेष पूजा अर्चना की जाती है। समझा जाता है कि 2500 वर्ष ईसा पूर्व से लेकर वर्ष 700 तक यहां पर कत्यूरियां का शासन रहा। इस बीच काशगर, खोतान में दर्रो से भारत की सीमा में होने वाले लकुलीश, खस, कुषाण आदि वंशवलियों के साथ यहां प्रविष्ट हुए। इसी कत्यूरी राजाओं ने महत्वपूर्ण स्थानों में किले व गढ़ी की स्थापना की जिसमें कत्यूर घाटी में भी एक किला यहां स्थापित है। यहीं पर स्थित है मां भगवती मंदिर जिसमें मां नंदा की मूर्ति स्थापित है जो कि श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। इस मंदिर में मां नंदा की मूर्ति किसने स्थापित की यह इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है। परंतु जन श्रुतियों के अनुसार कत्यूरी राजाओं की कुल देवी भ्रामरी व चंद वंशावलियों की प्रतिस्थापित नंदा देवी की पूजा अर्चना इस मंदिर में की जाती है। मंदिर में भ्रामरी रूप में देवी की पूजा अर्चना मूर्ति के रूप में नहीं बल्कि मूल शक्ति के अनुसार की जाती है। जबकि नंदा के रूप में इस स्थल पर मूर्ति पूजन, डोला स्थापना व विसर्जन का प्राविधान है। बुजुर्गो के अनुसार कोट के मंदिर में तोपाकार लोहे के टुकड़े यहां पर पड़े मिले। मंदिरों की देखरेख के लिए तत्कालीन राजाओं द्वारा यहां पर पुजारी व महंत नियुक्त किए गए थे जिनके वंशज आज भी इस मंदिर में पूजा अर्चना करते है। यहां पर चैत्राष्टमी व भादो मास की अष्टमी में मेला लगता है जिसमें दूर दराज से श्रद्धालु मां की विशेष पूजा अर्चना करते हुए मन्नतें मांगते है तथा मन्नतें पूरी होने पर पुन: यहां पर पूजा अर्चना के लिए आते है।

Wednesday, April 1, 2009


सरकारी कालेजों की परीक्षा निजी संस्थानों में

, हल्द्वानी: विवादों में रहना कुमाऊं विश्र्वविद्यालय की नियति बन गयी है। बीएड परीक्षा की तिथि घोषित हो गयी है। इसके साथ ही एक नया विवाद भी खड़ा हो गया है। अब एमबी पीजी कालेज में बीएड परीक्षार्थियों ने कुलपति व उच्च शिक्षा सचिव को पत्र भेजकर निजी कालेज में परीक्षा न कराने का अनुरोध किया है। कुमाऊं विश्र्वविद्यालय की ओर से संचालित बीएड-2007 की परीक्षा 11 अप्रैल से होनी है। मंडल में पांच कालेजों को परीक्षा केन्द्र बनाया गया है। इसमें एसएसजे परिसर अल्मोड़ा व राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय पिथौरागढ़ की परीक्षा एसएसजे परिसर अल्मोड़ा में, एमबी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय हल्द्वानी, जेएन कौल भीमताल, जय अरिहंत, लालबहादुर शास्त्री तकनीकी कालेज, हल्दूचौड़, इन्सपीरेशन कालेज काठगोदाम की परीक्षा आम्रपाली संस्थान में होगी। चन्द्रावती तिवारी कन्या महाविद्यालय काशीपुर, श्रीराम संस्थान काशीपुर और सल्ट संस्थान, सल्ट की परीक्षा श्रीराम संस्थान काशीपुर में होगी। देवभूमि संस्थान रुद्रपुर, द्रोण बीएड कालेज रुद्रपुर, सरस्वती संस्थान रुद्रपुर की परीक्षा सरस्वती संस्थान रुद्रपुर में होगी। देवभूमि संस्थान बनबसा, गुरुनानक डिग्री कालेज नानकमत्ता व डा. सुशीला तिवारी डिग्री कालेज सितारगंज की परीक्षा देवभूमि संस्थान बनबसा में आयोजित होगी। परीक्षायें 11 अप्रैल से शुरू होंगी और 25 अप्रैल तक होंगी। इधर एमबी पीजी कालेज के बीएड परीक्षार्थियों ने शहर से दूर परीक्षा केन्द्र बनाये जाने पर आपत्ति जाहिर की है। इसके लिये उन्होंने कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के कुलपति और उच्च शिक्षा सचिव को पत्र भेजकर स्ववित्तपोषित केन्द्र में परीक्षा न कराये जाने की मांग की है। कुमाऊं विश्र्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव पीएन पंत इस पर किसी भी तरह की टिप्पणी देने से इंकार कर दिया।


राज्य को रोशन करेगा खंदूखाल

श्रीनगर गढ़वाल: सब कुछ ठीक चला तो अगले कुछ सालों में श्रीनगर का खंदूखाल उत्तराखंड सहित देशभर को रोशन करने में बड़ी भूमिका निभाएगा। यहां लगभग दो सौ करोड़ की लागत से अलग-अलग क्षमताओं के तीन विद्युत स्टेशन शुरू करने की योजना है। अच्छी बात यह है कि इन पर कार्य शुरू भी किया जा चुका है। अधिकारियों की मानें, तो वर्ष 2011 तक यह क्षेत्र इलेक्टि्रसिटी हब के तौर पर पहचान बना लेगा। उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश के तौर पर विकसित करने के लिए विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग क्षमताओं वाली परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है। इनमें श्रीनगर में 330 मेगावाट, लाता तपोवन में 171 मेगावाट, बदरीनाथ में 140 मेगावाट, विष्णुगाड़ में 520 मेगावाट, पीपलकोटी में 444 मेगावाट, बावला (नंदप्रयाग) में 300 मेगावाट, लंगासू में 141 मेगावाट, देवसारी में 300 मेगावाट, रामबाड़ा में 76 मेगावाट, सिगनौली में 99 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं प्रस्तावित या निर्माणाधीन हैं। ऊर्जा निगम इन परियोजनाओं को लेकर तो उत्साहित है, लेकिन अब तक यहां से मिलने वाली बिजली की आपूर्ति की व्यवस्था न होना उसकी परेशानी का सबब बनी हुई थी। अब उसकी यह समस्या हल होने वाली है। निगम ने श्रीनगर के खंदूखाल को विद्युत आपूर्ति स्टेशन के लिए चुना है। जानकारी के मुताबिक यहां करीब 18 हेक्टेअर क्षेत्र में 180 करोड़ रुपये की लागत से विद्युत स्टेशन स्थापित करने की योजना है। 400, 200 और 132 केवी क्षमता के तीन स्टेशन यहां बनने हैं। इस बारे में अधिशासी अभियंता राजकुमार ने बताया कि जलविद्युत परियोजनाओं से मिलने वाली बिजली इसी विद्युत स्टेशन के माध्यम से नेशनल ग्रिड को भेजी जाएगी। इसके लिए खंदूखाल से काशीपुर तक 400 केवी विद्युत लाइन बिछाई जाएगी। उन्होंने बताया कि यहां से 12 प्रतिशत बिजली उत्तराखंड को नि:शुल्क मिलेगी, जबकि शेष बिजली नेशनल ग्रिड में जाएगी। उन्होंने बताया कि खंदूखाल में अभी लैंड डवलपमेंट कार्य चल रहा है। खंदूखाल के अलावा पीपलकोट, कर्णप्रयाग, तपोवन, घनसाली, कौडि़याला, सतपुली और शिमली में भी अलग-अलग क्षमताओं के स्टेशन बनाए जाने की योजना है।


दरकते पहाड़, खिसकते खेत और सिसकती जिंदगी।

यहां लोक ढो रहा तंत्र का बोझ
उत्तरकाशी दरकते पहाड़, खिसकते खेत और सिसकती जिंदगी। यही है पहाड़ का सच। देश आजाद हुआ तो लगा अपना राज आ गया। देखते ही देखते साठ साल गुजर गए, लेकिन यह सिलसिला नहीं टूटा। इस बीच उत्तराखंड भी बन गया, लेकिन रिसते जख्म पर मरहम तब भी नहीं लगा। आज भी उत्तरकाशी के सेवा गांव के लोग पीठ पर लोकतंत्र का बोझ ढो रहे हैं। ठेठ चढ़ाई पर चलते वक्त पैर पर फूटते छालों का दर्द इस गांव के लोग ही सह सकते हैं। पीढि़यां ऐसे ही गुजर गई और अब भविष्य भी वहीं कहानी दोहरा रहा है। चिमनी के उजाले में रेडियो पर नेताओं के भाषण उनके मनोरंजन के साधन बना हुआ है। तहसील पुरोला के ब्लाक मोरी का सेवा गांव समुद्र तल से 26 सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मुख्यालय से 178 किमी. दूर 5 सौ वर्ग मीटर में फैले गांव की कुल 382 महिला पुरुषों में मात्र 30 प्रतिशत महिला पुरुष ही साक्षर हैं, बालिका शिक्षा का यहां हाल बेहाल है। 16 फीसदी साक्षर महिलाओं में से 5वीं के बाद बालिकाएं स्कूल ही नहीं जाती। शीतकाल में यह गांव 4 से 5 महीने के बर्फ में ढक जाता है और ऐसे में गांव के लोग अपने लड़कियों को 12 किमी. दूर जूनियर शिक्षा के लिए दोणी नहीं भेजते। सड़क से 12 किमी. दूर इस गांव में बिजली आज भी नहीं पहुंची है और संचार के नाम पर यहां सिर्फ रेडियो बजता है। सेब, नाशपाती और आडू उत्पादन यहां के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन है लेकिन गांव सड़क से दूर होने के कारण उत्पादन का बड़ा हिस्सा बाजार तक नहीं पहुंच पाता। ओलावृष्टि, सूखा, वनाग्नि के समय इस गांव के लोगों के सामने पहाड़ जैसी मुश्किलें होती है और ये लोग तब गेंहू, दाल, मंडवा व आलू पर ही निर्भर रहते हैं। चांद-सितारों की बातें और विकास का ढोल पीटने वाले नेता भी सेवा गांव के पैदल रास्ते नापने से कतराते हैं। उनकी कोशिश होती है कि गांव के मतदाताओं किसी तरह वोट उन्हें दें दे। अंगूठे के बाद अब इलैक्ट्रानिक वोटिंग मशीन तक मतदान पहुंच चुका है किन्तु सेवा के ग्रामीण आज भी अंगूठा टेक ही रह गए हैं।


आजादी के छह दशक बाद भी कृषि प्रधान देश में किसानों से जुड़े मुद्दे हाशिये पर हैं। लोकशाही के नुमाइंदे हों या व्यवस्था तंत्र, उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। राजधानी देहरादून से करीब 15 किमी दूर निर्माणाधीन सहस्त्रधारा-चामासारी मोटर मार्ग से पटेरू पटाली गांव के साथ ही ग्रामीणों के खेत भी खतरे की जद में आ चुके हैं।


हरीश रावत के खिलाफ मंगलौर में मामला दर्ज


हरिद्वार, : सौ गाडि़यों के काफिले के साथ चुनाव प्रचार कांग्रेस प्रत्याशी हरीश रावत को महंगा पड़ गया। सोमवार को उनके जुलूस में बिना अनुमति सैकड़ों गाडि़यां शामिल होने के चलते मंगलौर में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई है। इसके अलावा आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने पर नगर पालिकाध्यक्ष कमल जौरा समेत तीन अन्य की गाडि़यां भी प्रशासन ने सीज कर दी हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी शैलेश बगोली ने बताया कि उनके काफिले के लिए पांच गाडि़यों की आयोग ने परमीशन दी थी, लेकिन काफिले में सौ गाडि़यों से ज्यादा शामिल थीं।


पंतनगर विवि देश के सर्वश्रेष्ठ तीन संस्थानों में शामिल

देहरादून, : तकनीकी शिक्षा का स्तर सुधारने को विश्र्व बैंक की मदद दूसरे फेज में जारी रहे, इसके लिए राज्य के तकनीकी शिक्षण संस्थानों को एकेडमिक आटोनामी देनी होगी। इस संबंध में महकमे के प्रस्ताव का परीक्षण सरकार कर रही है। परफारमेंस में पंतनगर विवि देश के सर्वश्रेष्ठ तीन संस्थानों में शामिल है। राज्य को विश्र्व बैंक की प्रस्तावित दूसरे चरण की इस योजना में आर्थिक मदद पाने को कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। प्रोजेक्ट के दूसरे चरण का बेसब्री से इंतजार तो किया जा रहा है, लेकिन मदद पाने के लिए उक्त सरकारी संस्थानों को एकेडमिक आटोनामी की दरकार है। महकमे के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक इस संबंध में प्रस्ताव सरकार को सौंपा गया है। इस प्रस्ताव का परीक्षण कराया जा रहा है। प्रोजेक्ट का दूसरा चरण शुरू होने की स्थिति में परफारमेंस के आधार पर पंतनगर विवि का दावा ज्यादा पुख्ता माना जा रहा है। तकनीकी शिक्षा गुणवत्ता सुधार कार्यक्रम (टीईक्यूआईपी) के तहत पहले चरण में राज्य के पांच शिक्षण संस्थानों को विश्र्व बैंक ने करोड़ों रुपये की आर्थिक मदद मुहैया कराई। संस्थानों को यह राशि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, फैकल्टी ट्रेनिंग, नेटवर्किंग व कम्युनिटी सर्विस में सदुपयोग करनी थी। सबसे ज्यादा राशि करीब 18 करोड़ गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्र्वविद्यालय पंतनगर को मिली। राज्य के लिए राहत की बात यह है कि उक्त योजना के तहत राज्य की परफारमेंस राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रही है। इसमें पंतनगर विवि का योगदान ज्यादा है। तीन बार हुए आडिट में विवि ने दस में से औसतन 7.4 स्कोर किया। प्रोजेक्ट में चुने गए देशभर के 127 संस्थानों में भी बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले तीन संस्थानों में पंतनगर भी शामिल है। निजी संस्थान डीआईटी देहरादून को 5.5 करोड़, जीबी पंत इंजीनियरिंग कालेज घुड़दौड़ी पौड़ी को 5.3 करोड़ व राजकीय पालीटेक्निक देहरादून को 2.5 करोड़ की राशि मुहैया कराई गई। उक्त संस्थानों ने आडिट में औसत क्रमश: 5.9, 5.7 व 5.7 स्कोर किया। कुमाऊं इंजीनियरिंग कालेज द्वाराहाट को भी पहले चरण में तकरीबन 2.5 करोड़ की सहायता मिली, लेकिन बाद में प्रदर्शन दुरुस्त नहीं रहने पर उक्त कालेज लंबे समय तक प्रोजेक्ट से नहीं जुड़ सका। अब पहले चरण का प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है। इसकी रिपोर्ट 31 मार्च तक केंद्र सरकार को भेज दी जाएगी।

Monday, March 30, 2009

साथियो - कविताओ के लिए एक नया कालम/थ्रेड आरम्भ कर रहा हु/ आप सभी सुधि जनो से आग्रह है कि कविता पोस्ट करे/ कविता स्वरचित हो तो अछ्छा होगा/ किसी अन्य की हो तो लेखक क नाम जरूर दे / श्रीगणेश मै अपनी कविता क्लर्क से कर रहा हू :-

मै क्लर्क हू , सरकारी श्रस्टी का आधार स्तम्भ,
अनपढो के लिये पूर्ण ब्रह्म ,
अनादि काल से मेरा अस्तित्व है ,
यम राज के यहा भी ( चित्रगुप्त) मेरा प्रभुत्व है,
समय के साथ साथ मैने भी विकास किया है,
काय्स्थ , ्मुनिम , लिपिक से कलर्क तक का सफर तय किया है,
चम्चागिरी धर्म है मेरा , ओवरटाइम कर्म है मेरा,
बगल मे फाइलो की ढेरी, सामने कम्प्यूटर की भेरी,

भारतीय परजातन्त्र तेरे लिए पुन्य प्रसाद हू मै ,
लार्ड मैकाले की आखरी याद हु मै
अर्थशास्त्री मुझसे खौफ खाते है,
पन्च वर्शीय योजनाओ की विफल्ता का मुझे प्रमुख कारण ठ्हराते है.

सुबह देर से दफतर जाना, शाम को जल्दी घर आना,
आधा घन्टा चाय पीने मे तो घन्टा भर लगाना,
उस पर भी बोनस बोनस , डीए- डीए चिल्लाना

उन्हे कौन बताए मै सब कुछ कर सकता हु
क्लर्क से गवर्नर- जनरल बन सकता हू
बस की क्यू मे अडे अडे , विस्व राजनीति पर बहस कर सकता हू खडे खडे,
परमाणु कार्यकर्म , ड्ब्लूटीओ वार्ता, भारतीय हाकी - किर्केट,
कौन कैसे जीतता, कैसे हारता,

मै सब जानता हू , कैसे? चलो बताता हू, एक क्लर्क के ज्न्म की कथा सुनाता हू,

जब एक भावी क्लर्क पैदा होता है, जग हसता है वो रोता है,
माता लोरी देती है, पिता तान सुनाएगे-
हम अपने लाड्ले को डाक्टर , इन्जिनियर, आए ए एस बनाएगे,
प्बलिक स्कूल की खोज होती है,
पर उनकी जेब रोती है
हारकर- झकमारकर , सन्तोस कर लेते है,
लाड्ले को म्युनिसिप्ळ्टी के स्कूल मे डालकर
दस्वी मे साठ प्रतिसत, १२वी मे ५० और बीए मे ४५ प्रतिसत प्राप्त कर ,
वह लाल नाम कमाता है,
पढा लिखा बेरोजगार कहलाता है,
ओर दे डालता है ,
अधिकारी वर्ग की सैकडो प्रतियोगी प्ररीक्छाए ,
और वह किसी को भी लक्छ्म्ण रेखा की तरह पार नही कर पाता, और
टूटता है , वह बाद हर इम्तिहान के,
बामियान बुद्ध जैसे हाथ तालिबान के,
और तब वह सर्व ग्यानी होकर, अपना चार्म खोकर,
उतरता है स्टाफ सिलेक्स्न कमीशन के समरान्ग्न मे,
और पहूचता है, सरकारी कार्यालयो के प्रान्ग्न मे

रोज्गार पाते ही दोपाये से चौपाया होता है,
फिर सन्त्तती होती है , फिर जेब रोती है-----


और एक बार फिर वही स्ब कुछ दोहराया जाता है,
ओर तब वक्त की याज्सेना (द्रोप्दी) हस कर कह्ती है,
अन्धो के अन्धे और क्लर्को के क्लर्क

और चलता रह्ता है नियती चक्र - चलता रहता है नियती चक्र

Saturday, March 28, 2009

संस्थान का कार्यालय सीज
देहरादून: नगर निगम ने टैक्स जमा न करने पर राज प्लाजा में कुर्की की कार्रवाई करते हुए राज प्लाजा स्थित एक संस्थान और हिमालयन अपार्टमेंट स्थित एक बिल्डर के आफिस को सीज कर दिया है। इन पर लाखों रुपये बकाया था। नगर निगम के इस कदम से बकायेदारों में हड़कंप है। इन दिनों नगर निगम का कर वसूली पर खासा जोर है। इसके तहत टैक्स जमा न किए जाने पर गुरुवार को निगम की टीम ने दो के खिलाफ सीज करने की कार्रवाई की। राज प्लाजा स्थित आईएएफडी को नगर निगम ने सीज कर कर दिया। इस दौरान कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने हल्का विरोध भी किया। राज प्लाजा पर कुल तकरीबन साढ़े छह लाख का टैक्स बनता है।

झंडा मेले में दो पक्ष भिडे़, तीन धरे
देहरादून, जागरण संवाददाता: झंडे मेले में दो पक्षों के बीच जमकर संघर्ष हुआ। इस दौरान कुछ दुकानों में तोड़फोड़ भी की गई। बताया गया कि लेनदेन को लेकर यह घटना हुई। पुलिस ने मौके पर तीन लोगों को गिरफ्तार कर मामला शांत कराया। इन दिनों कोतवाली क्षेत्र में झंडा मेला चल रहा है। पुलिस के मुताबिक गुरुवार को लेनदेन को लेकर दो गुटों के बीच विवाद हो गया। इनमें से एक ने मेले में खिलौनों की दुकान लगाई हुई है। पुलिस के मुताबिक दोनों गुटों में पैदा हुए विवाद के मारपीट हो गई। एक गुट ने दूसरे गुट की दुकान और अन्य दुकानों में तोड़फोड़ कर डाली। इससे मेला परिसर में बवाल हो गया। पुलिस को देखते ही कई लोग फरार हो गए, लेकिन पुलिस ने एक मेला दुकानदार व एक गुट के दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इन तीनों लोगों के मारपीट में चोटें भी लगीं। पुलिस तीनों का दून अस्पताल में मेडिकल कराकर कोतवाली ले गई। एक गुट के आरोपी का नाम लक्ष्मण सिंह निवासी ग्राम नारंगी, चमोली और दूसरे गुट के आरोपियों के नाम सोनू निवासी शालीमार गार्डन थाना कोतवाली देहात जनपद सहारनपुर व दिनेश निवासी दीप नगर (देहरादून) बताए जा रहे हैं। पुलिस के मुताबिक लक्ष्मण ने मेले में दुकान लगाई हुई है। पुलिस के मुताबिक सोनू शातिर बदमाश है और पूर्व में भी जेल जा चुका है। तीस तक संपूर्ण होगा मेला लोकसभा चुनाव की तैयारियों और शहर में बढ़ रही चोरियों की घटनाओं के मद्देनजर कोतवाली पुलिस ने झंडा मेके को 30 मार्च तक संपूर्ण करने के निर्देश दिए हैं। कोतवाल जेपी जुयाल ने मेला प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि सुरक्षा के कारण 30 मार्च तक मेला संपूर्ण कर लिया जाए। मालूम हो कि मेले में बाहरी तत्त्‍‌वों की भीड़ लगी हुई है और शहर में चोरियों का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। पुलिस को संदेह है कि मेले के बहाने यहां पहुंचे कुछ अपराधी तत्त्‍‌व वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

एशियन शूटिंग के लए पूनम का चयन
देहरादून: अपनी प्रतिभा एवं अचूक निशाने के बूते विकलांग निशानेबाज पूनम कवि का कोरिया में 23 अप्रैल से होने वाली एशियन शूटिंग चैंपियनशिप में चयन हुआ है। इससे पूर्व पूनम केरल में हुई 52वीं राष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिता में स्वर्ण जीत चुकी हैं। साथ ही उन्होंने राज्य स्तरीय स्पर्धा में स्वर्ण व अखिल भारतीय स्पर्धा में रजत पदक भी हासिल किए। पूनम ने इस मुकाम को हासिल करने के लिए लगातार कड़ी मेहनत की। उनकी सफलता में विकलांगता कभी रोड़ा नहीं बनी। बावजूद इसके प्रदेश सरकार की ओर से उन्हें कोई प्रोत्साहन नहीं मिला है। पूनम का कहना है कि निशानेबाजी एक महंगा खेल है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए उसे आर्थिक कठिनाइयों से जूझना पड़ रहा है। पूनम ने बताया कि जसपाल राणा शूटिंग अकेडमी के सहयोग से वह अभ्यास जारी रखे हुए है। जसपाल राणा और राज्य निशानेबाजी संघ के अध्यक्ष नारायण सिंह राणा समय-समय पर उसे निशानेबाजी के गुर सिखाते हंै।

दोस्तों के सहयोग से शेखर ने छुआ शिखर
देहरादून, जागरण संवाददाता: छह दोस्तों का समूह, कुछ कर दिखाने की लगन और एक-दूसरे को पूरा सपोर्ट। कोई भी हिम्मत न हारे, इसलिए हर रोज एक-दूसरे की परेशानियों पर होती है चर्चा। इन्हीं दोस्तों में से एक हैं- शेखर रमोला। शेखर ने सहायक कमांडेंट परीक्षा में राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा स्थान प्राप्त किया। शेखर इस सफलता का श्रेय दोस्तों को देते हैं। उनका कहना है कि मंजिल अभी दूर है, लेकिन यहां तक का सफर दोस्तों के सपोर्ट से ही पूरा हुआ है। उनका सपना आईएएस अधिकारी बनकर देश की सेवा करना है। देहरादून के शास्त्री नगर निवासी शेखर रमोला के पिता प्रकाश चंद रमोला सेना से सेवानिवृत्त हैं। उनकी माता गृहणी हैं। शेखर ने सीबीएसई बोर्ड से दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई की और डीबीएस कालेज से स्नातक किया। उन्होंने यूपीएसई द्वारा 2007 में आयोजित सहायक कमांडेंट परीक्षा पास की थी। इसके बाद ग्रुप डिस्कशन और साक्षात्कार में कामयाबी हासिल कर राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा स्थान प्राप्त किया। शेखर को सीआईएसएफ में सहायक कमांडेंट के पद पर नियुक्ति मिली है। वे 18 अप्रैल को हैदराबाद में सीआईएसएफ ज्वाइन करेंगे। इससे पहले शेखर आठ बार सीडीएस, एक बार आईबी और तीन बार एसआई परीक्षा पास कर चुके हैं। उन्होंने 2008 की सिविल सेवा परीक्षा (प्री) में सफलता प्राप्त की है और वे मुख्य परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। दैनिक जागरण से बातचीत में उन्होंने कहा कि उनके छह दोस्तों के समूह ने हमेशा एक-दूसरे को मानसिक स्तर पर मजबूत बनाया। जब भी कोई परेशानी आई, एकजुट होकर सामना किया और सफलता प्राप्त की। उन्होंने कहा कि शिक्षक अनूप चौहान के मार्गदर्शन, माता-पिता के आशीर्वाद और दोस्तों के सपोर्ट ने उनकी राह आसान की। शेखर ने कहा कि मंजिल अभी दूर है। उन्होंने कहा कि उन्हें अब नौकरी के साथ-साथ आईएएस मुख्य परीक्षा की तैयारी करनी है।

दून से निकला क्रिकेट का द्रोणाचार्य
देहरादून, जागरण प्रतिनिधि: सूबे के क्रिकेटर भी अब राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटरों की तरह मनमाफिक कोचिंग हासिल कर प्रतिभा निखार सकेंगे। सूबे के वरिष्ठ क्रिकेटर मनोज रावत ने बीसीसीआई द्वारा संचालित लेवल वन कोचिंग कोर्स उत्तीर्ण कर यहां की क्रिकेट को ऊंचाइयों तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। मनोज को इस कोर्स में द्वितीय स्थान हासिल हुआ। यह उपलब्धि हासिल करने वाले वह सूबे के एकमात्र क्रिकेटर हैं। बीसीसीआई की इकाई नेशनल क्रिकेट अकेडमी (एनसीए) के तत्वावधान में तीन से आठ फरवरी तक चले लेवल वन कोचिंग कोर्स में देशभर से 32 खिलाडि़यों ने भाग लिया, जिनमें से 18 ही परीक्षा उत्तीर्ण कर पाए। श्री रावत को इसमें द्वितीय स्थान मिला। एनसीए के निदेशक डेव व्हाटमोर ने इस कोर्स की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य देशभर में युवा क्रिकेटरों को एकरूप कोचिंग देना है। श्री रावत ने बताया कि कोर्स के दौरान एनसीए के बालिंग कोच बी.अरुण, बैटिंग कोच अमित असवाह, आर.वेंकटराम व किंजल सूरतवाला ने खेल की तकनीकी जानकारी दी। कोर्स में क्रिकेट के बेसिक गुर सिखाए गए। उन्होंने बताया कि टेस्ट में रिटर्न और प्रैक्टिकल दोनों ही तरह परीक्षण किया गया। मनोज रावत ने बताया कि सीएयू की यूपीसीए से संबद्धता होने के कारण एसोसिएशन के सचिव पीसी वर्मा से कोर्स के लिए नाम मांगे गए थे। अगर श्री वर्मा रिकमंड नहीं करते तो शायद वह यह कोर्स नहीं कर पाते। उन्होंने बताया कि पूर्व में वह एनआईएस, एमपीएड और स्पो‌र्ट्स मैनेजमेंट का कोर्स कर चुके हैं। इसका फायदा उन्हें लेवल वन कोचिंग कोर्स में मिला। एसीए के निदेशक आरपी ईश्र्वरन का भी इसमें काफी सहयोग रहा। एसीए में बतौर कोच कार्यरत मनोज रावत ने कहा कि सूबे को मान्यता मिल जाती है तो अन्य लोग भी यह कोर्स कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के क्रिकेट के विकास में यह काफी सहायक साबित होगा। साथ ही प्रतिभाओं का पलायन रुकेगा।


ढाई करोड़ लीटर पानी जमा करना है 15 तक
मसूरी, जागरण कार्यालय: पहाड़ों की रानी मसूरी में पर्यटन सीजन की तैयारियां में जल संस्थान भी लग गया है। सीजन के लिए पंपों की मरम्मत की जा चुकी है। संस्थान 15 अप्रैल तक 2 करोड़ 46 लाख लीटर जल का भंडारण करने में जुटा है। संस्थान ने बकायेदारों से वसूली में भी तेजी कर दी है। पर्यटन सीजन में पहाड़ों की रानी मसूरी में पेयजल किल्लत से बचने के लिए जल संस्थान ने हाथ-पैर मारना शुरू कर दिया है। जल संस्थान के अधिशासी अभियंता एसके शर्मा का कहना है कि पर्यटन सीजन में पेयजल संकट से बचने के लिए कोल्टी पंप, मरे पंप, धोबी घाट समेत अन्य पंपों की मरम्मत की गई है। 15 अप्रैल तक 2 करोड़ 46 लाख लीटर का जल भंडारण किया जाएगा। गनहिल में सर्वाधिक एक करोड़ 58 लाख लीटर, राधाभवन क्रेगटॉप में 80 लाख लीटर, लंढौर कैंट में 8 लाख लीटर पानी का भंडारण किया जाना है। उन्होंने बताया कि जल संस्थान ने बकाएदारों से 31 मार्च तक तीन करोड़ 75 लाख रुपये की वसूली का लक्ष्य रखा है। अभी तक दो करोड़ से अधिक की वसूली की जा चुकी है। संस्थान के सहायक अभियंता पीबी भट्ट ने बताया कि कोल्टी पंप में अकसर बिजली समस्या रहती थी। इसके लिए 11 केवी की लाइन लगाने को आकलन किया गया है। केंद्र सरकार से पेजयल व्यवस्था के लिए हाल ही में 16 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए हैं, जिनमें कोल्टी पंप के लिए डबल पंपिंग योजना पर तीन करोड़रुपये खर्च किए जाएंगे।


बाजार में लौटी बसंत बहार
मुंबई, एजेंसियां : तमाम सकारात्मक संकेतों के बीच दलाल स्ट्रीट में फिर से वसंत की बहार लौट आई है। शेयर बाजार का बैरोमीटर माना जाने वाला सेंसेक्स करीब तीन महीने बाद गुरुवार को फिर से 10 हजार का स्तर पार कर गया। इस तेजी में अमेरिका में आवास व उपभोक्ता बाजार में आए सुधार का बड़ा हाथ रहा। इसकी वजह से ही विदेशी बाजारों में खासा उछाल आया। इसे देख सटोरियों ने दलाल स्ट्रीट में जमकर लिवाली की। इस दिन बंबई शेयर बाजार (बीएसई) के संवेदी सूचकांक ने 335.20 अंकों यानी 3.47 फीसदी की छलांग लगाई। यह 10003.10 अंक पर बंद हुआ। 5 जनवरी, 09 के बाद सेंसेक्स पहली बार इस स्तर पर पहुंचा है। एक दिन पहले यह 9667.90 अंक पर बंद हुआ था। चार सत्रों की लगातार तेजी के चलते इस हफ्ते संवेदी सूचकांक 1036.42 अंक यानी 11.56 फीसदी की बढ़त बना चुका है। इसी तरह नेशनल स्टाक एक्सचेंज का निफ्टी भी तीन महीने बाद पहली बार 3000 के ऊपर गया। यह 97.90 अंक यानी 3.28 फीसदी उछलकर 3082.25 पर बंद हुआ। बुधवार को यह 2984.35 अंक पर था। बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स मजबूती के साथ खुला। सत्र के दौरान यह 10061.36 अंक के ऊंचे स्तर तक गया, वहीं इसने 9739.93 अंक का दिन का निचला स्तर छुआ। निफ्टी एक दिन पहले के मुकाबले नीचे खुला, लेकिन कारोबार के दौरान ऊपर में 3103.35 अंक तक गया। बाद में यह नीचे में 2982.25 के स्तर तक लुढ़का। विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिका में एक दिन पहले आए नए घरों की बिक्री और उपभोक्ता बाजार के आंकड़े उम्मीद से अच्छे रहे हैं। इसके चलते विश्व की इस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में मंदी को लेकर बढ़ रही चिंताएं कम हुईं तो वाल स्ट्रीट में एक दिन पहले खासी तेजी आई। इसकी देखादेखी एशियाई बाजार भी मजबूत रहे। इसके अलावा मुद्रास्फीति दर के गिरकर 0.27 फीसदी आने से रिजर्व बैंक द्वारा दरों में और कटौती करने के आसार बढ़ गए हैं। इन सब कारणों से दलाल स्ट्रीट के निवेशक भी जोश में आ गए और जमकर खरीद कर डाली। घरेलू बाजार को विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से भी लगातार लिवाली का सहारा मिल रहा है। एक दिन पहले उन्होंने 348.65 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। रीयल एस्टेट को छोड़कर इस दिन बीएसई के सभी सूचकांकों में तेजी दर्ज की गई। रीयल एस्टेट कंपनी आकृति सिटी की शेयरों में आई 55 फीसदी से ज्यादा की गिरावट इस वर्ग के सूचकांक पर भारी पड़ी। बीएसई में कारोबार का आकार भी बढ़कर 4635.28 करोड़ रहा।


चार धाम यात्रा के लिए कंप्यूटरीकृत ग्रीन कार्ड होंगे इस बार
देहरादून: चार धाम यात्रा के लिए परिवहन विभाग की तैयारियां जोरों पर हैं। इस बार विभाग ने यात्रा पर चलने वाले व्यावसायिक वाहनों के लिए कंप्यूटरीकृत ग्रीन कार्ड बनाने का निर्णय लिया है। इससे विभाग के पास यात्रा पर जाने वाली गाड़ी का पूरा ब्योरा उपलब्ध रहेगा। यात्रा के दौरान परिवहन विभाग गाडि़यों के लिए ग्रीन कार्ड जारी करता है। पूर्व में ये कार्ड हाथों से बनाए जाते थे। ऐसे में इनमें गड़बड़ी होने की आशंका भी रहती थी। जांच के दौरान कई ग्रीन कार्ड फर्जी भी पाए गए। ऐसे में फर्जी ग्रीन कार्ड को रोकने और वाहन व चालक का संपूर्ण विवरण एक ही कार्ड में डालने के लिए विभाग ने इस बार ग्रीन कार्डो को पूरी तरह कंप्यूटरीकृत बनाने का निर्णय लिया है। ग्रीन कार्ड में ड्राइवर के डीएल के साथ ही वाहन संबंधित जानकारी जैसे प्रदूषण प्रमाणपत्र की वैधता अवधि, रजिस्ट्रेशन, टैक्स, परमिट, फिटनेस और यात्रा फिटनेस आदि की संपूर्ण जानकारी होगी। यह जानकारी जानकारी कंप्यूटर में भी दर्ज होगी। यात्रा पर चलने वाले स्थानीय वाहनों के अलावा बाहर से आने वाले वाहनों को भी ये कार्ड जारी किए जाएंगे। ग्रीन कार्ड की पहली वैधता तीस जून तक रहेगी। इसके बाद आगे दो-दो माह तक इसकी समय सीमा बढ़ाए जाने का प्रस्ताव है। अपर परिवहन सचिव व अपर आयुक्त विनोद शर्मा ने बताया कि ग्रीन कार्ड का मकसद यह है कि वाहन चालक को एक बार ही सारे कागजात प्रस्तुत न करने पड़ें और जांच में भी विभाग का ज्यादा समय व्यर्थ न हो।

रास्ते के बारे में पता नहीं, चले मंजिल को
विकास गुसाई, देहरादून चार धाम यात्रा के लिए भले ही तैयारियां जोरो पर हों, लेकिन सचाई यह है कि इस बार मार्गो के बिना ठोस सर्वे किए ही यह यात्रा शुरू की जा रही है। बीते वर्ष इन मार्गो पर साढ़े पांच सौ से ज्यादा डेंजर जोन चिह्नित किए गए थे। इन्हीं के आधार पर सुरक्षा की तैयारी की जा रही है। पिछले यात्रा सीजन के बाद हुई बरसात में कई और नए स्थान डेंजर जोन के रूप में उभरे हैं, लेकिन इसकी जानकारी शायद ही विभाग के पास हो। ऐसे में चार धाम यात्रा कितनी सुरक्षित होगी, यह अंदाजा लगाया जा सकता है। चार धाम यात्रा को कुछ ही समय रह गया है। इसके लिए संबंधित महकमों की तैयारियां जोरों पर है। बसों की व्यवस्था से लेकर सड़कों की मरम्मत के लिए परिवहन विभाग, लोक निर्माण विभाग व सीमा सड़क संगठन को निर्देश जारी कर दिए गए हैं, लेकिन इस वर्ष यात्रा से पहले यात्रा रूटों का ठोस सर्वे न तो पुलिस और न ही परिवहन विभाग ने किया है। अभी तक रूट प्लानिंग पुराने डेंजर जोन को ध्यान में रख कर ही की गई है। प्रतिवर्ष परिवहन विभाग और पुलिस अपने-अपने स्तर से चार धाम यात्रा रूटों का सर्वे कराकर तैयारी करते हैं। महकमे इसकी रिपोर्ट शासन को सौंपते हैं। रिपोर्ट में सड़कों की स्थिति, चौड़ीकरण, पिटवाल, रेलिंग, पैराफिट आदि की स्थिति का उल्लेख होता है। इसी हिसाब से तैयारियां की जाती हैं। देहरादून-गंगोत्री, उत्तरकाशी- यमनोत्री, ऋषिकेश-सोनप्रयाग और हरिद्वार-बदरीनाथ मार्ग का सर्वे किया जाता है। हर वर्ष इन मार्गो पर डेंजर जोनों की संख्या घटती-बढ़ती है। इससे रूट की स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इसी आधार पर तैयारियां की जाती हैं। इस वर्ष यात्रा मार्गो पर कितने डेंजर जोन घटे व बढ़े, इसकी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है। बीते वर्ष के हिसाब से ही तैयारियां की जा रही हैं। हालांकि अपर परिवहन आयुक्त विनोद शर्मा कहते हैं कि परिवहन आयुक्त व अन्य अधिकारियों के अलावा वे भी यात्रा रूटों की स्थिति का निरीक्षण कर चुके हैं। सीमा सड़क संगठन और लोनिवि को दस अप्रैल तक सभी कार्य दुरुस्त करने के निर्देश दिए जा
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