Movie Download

Ghaur Bati Search

image ad

Chitika

Saturday, August 28, 2010

नहरें होंगी भूमिगत

http://garhwalbati.blogspot.कॉम
कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल)। यदि सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से चला, तो जल्द ही नगर व इससे जुड़े क्षेत्र में सिंचाई विभाग की तमाम नहरें भूमिगत हो जाएंगी। नहरों के भूमिगत होने से नगर की विभिन्न सड़कों की चौड़ाई बढ़ जाएगी। इससे यातायात व्यवस्था भी सुचारु हो जाएगी। विभाग ने मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक की घोषणा के अनुरूप नगर व आसपास के क्षेत्रों से गुजर रही चार नहरों के करीब दस किमी. हिस्से को भूमिगत करने के लिए 827.74 का प्रस्ताव शासन को भेज दिया है।
नगर व आसपास के क्षेत्रों में घनी आबादी के चलते क्षेत्र की नहरें कूड़ा निस्तारण का जरिया बनकर रह गई हैं। काश्तकार लंबे समय से नहरों को भूमिगत करने की मांग करते आ रहे थे। मुख्यमंत्री ने गत 24 मई को कोटद्वार भ्रमण के दौरान जीर्ण-शीर्ण नहरों की मरम्मत के साथ ही नहरों को भी भूमिगत करने की घोषणा की। घोषणा के अनुरूप सिंचाई विभाग की ओर से नगर व आस-पास के क्षेत्रों की नहरों को भूमिगत करने के लिए प्रस्ताव तैयार कर शासन में भेजा जा रहा है। इसके तहत दायीं खोह नहर में 0.846-1.18 किमी तक आरसीसी ह्यूम पाइप डालने, 1.18 किमी. से 2.57 किमी. के हिस्से में आरसीसी कवरिंग करने व 2.57 से 5.77 किमी. तक आरसीसी ह्यूम पाइप डाला जाना है। कौड़िया माइनर में 1.35 किमी तक, सुखरो नहर में 1.40 किमी. से 3.40 किमी. तक और शिवपुर माइनर में 1.65 किमी. तक आरसीसी ह्यूम पाइप डालकर भूमिगत किए जाने की योजना है। इसके अलावा नहर/ माइनर से जगह-जगह निकाले गए कुलाबों के सुलभ संचालन, सफाई, व परिचालन हेतु 50-50 मीटर की दूरी पर संपवैल बनाने की योजना भी है। कुलावों पर जल वितरण हेतु मुख्य लाइन से सड़क के किनारे तक जीआई पाइप व गेट वाल्व बनाने व कुलाबों की अतिरिक्त बढ़ी लंबाई में आरसीसी ह्यूम पाइप डालकर भूमिगत करने की योजना बनाई गई है।
जागरण.याहू.कॉम से साभार 

बच्चे एक-एक रोटी के मोहताज हो गए

बच्चे एक-एक रोटी के मोहताज हो गए
खटीमा(ऊधमसिंहनगर)। डेढ़ साल से पति का इंतजार करते-करते हीरा शर्मा की आंखें पथरा गई हैं। खेवनहार के लापता हो जाने से बच्चे एक-एक रोटी के मोहताज हो गए हैं। उन्हें पेट पालने के लिए दूसरों का मुंह देखना पड़ रहा है। घर भी ढहने की कगार पर पहुंच गया है। अब तो सिर छुपाने की भी जगह नहीं बची है। ये दुख भरी कहानी असम राईफल्स के जवान अशोक चंद्र शर्मा परिवार की है। वो डेढ़ वर्ष पूर्व घर में छुट्टी बिताने के बाद ड्यूटी के लिए रवाना हुआ था। तभी से वो लापता हो गया था। लापता होते ही उसका खुशहाल परिवार कंगाल हो गया है। दुर्भाग्य यह है कि सैनिक बाहुल्य क्षेत्र में इस परिवार की सुध लेने वाला तो दूर, इनके दर्द को सुनने वाला भी कोई नहीं है।
खटीमा शहर से आठ किलोमीटर दूर चकरपुर क्षेत्र के पचौरिया गांव के सैनिक अशोक चंद्र शर्मा का परिवार बहुत खुशहाल था। वह आसाम राईफल्स में तैनात था। उसके परिवार में पत्नी हीरा शर्मा व चार बच्चे मनीषा बारह, रीया छह, कल्पना चार व आयूष ढाई वर्ष के हैं। मां-बाप छोटे भाई के साथ रहते हैं। अशोक अपने परिवार से काफी खुश था। बारह साल नौकरी के हो गए थे। उसका जल्द ही नया घर बनाने का सपना था। वह 3 मार्च 2009 को चालीस दिन की छुट्टंी लेकर घर आया था। और छुट्टिंयों के दौरान बच्चों के साथ खुशी के पल बिताए थे। 8 अप्रैल 2009 को वह ड्यूटी पर जाने के लिए यूनिट के लिए घर से निकला। उसने जल्द ही दोबारा घर आने की बात कही थी। आठ दिन बाद परिजनों ने कुशलक्षेम के लिए यूनिट में अशोक को फोन किया। लेकिन यूनिट के अधिकारियों ने छुट्टी के बाद उसके वापस न लौटने की बात कही। यह सुनते ही पत्नी हीरा की पैरो तले जमीन खिसक गई। और घर में कोहराम मच गया। आखिर यह क्या हुआ। रिश्तेदार सैनिक की ढूंढखोज में निकल पड़े। खटीमा कोतवाली में इसकी गुमशुदगी भी दर्ज कराई। कुछ दिनों तक तो पति के लापता होने के वियोग में पत्नी बेसूध रही। समय बीतता गया और बच्चों के भरण पोषण में दिक्कतें बढ़ने लगी। इसके बाद पत्नी ने कई बार आसाम राईफल्स यूनिट के अधिकारियों से पति के जानकारी के लिए संपर्क साधा। और परिवार को पालने के लिए मिलने वाली सहायता मांगी। लेकिन मामला दूरभाष तक ही सीमित रह गया।
जागरण ने जब उसके हाल पूछे तो रुधें गले से हीरा शर्मा ने बताया कि उसका परिवार बेहद खुशहाल था। पता नहीं किस की इस घर पर बुरी नजर लग गई। इस वक्त हालात यह है कि दो वक्त की रोटी के लिए लाले पडे़ हुए हैं। अभी तक बच्चे दूसरों की दया पर जी रहे हैं। बच्चे छोटे हैं, इनका दुखदर्द नहीं देखा जा रहा है। वह लोगों के खेतों में काम काज करके पेट पाल रही है। लेकिन उसे बच्चों के भविष्य की चिंता सता रही है। उसने बताया कि एक ही कमरा है जो बरसात में टपक रहा। अब सर छुपाने के लिए भी जगह नहीं है। इतना कहते ही वो फफक-फफक कर रो पड़ी। हीरा को आज भी पति के सकुशल लौटने का इंतजार है। वो टकटकी लगाकर आज भी गांव के गलियारे की ओर देखा करती है।
साभार जागरण.याहू.कॉम 

Friday, August 27, 2010

वर्षों से लंबित पड़ा पर्यटन आवास गृह अधिकारियों की लापरवाही का भेट चढ़ा

 http://garhwalbati.blogspot.com
वर्षों से लंबित पड़ा पर्यटन आवास गृह अधिकारियों की लापरवाही का भेट चढ़ा 
सुदर्शन सिंह रावत | पौढ़ी गढ़वाल | उत्तराखंड पौड़ी गढ़वाल नैनिडाडा विकास खंड के अंतर्गत बनने वाली पर्यटन आवास गृह का वर्ष 2006 में शिलान्यास होने के बाद  भी अधिकारियों के लापरवाही के कारण अधर में लटका पड़ा है. ग्राम सभा उठिडा गाँव के ज़मीन पर बनने  वाले पर्यटन आवास पर्यटन मंत्री श्री तेजपाल सिंह रावत पूर्व उर्जा मंत्री अमृता रावत  वर्त्तमान सांसद व पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री सतपाल महाराज की उपस्थिती में खाली ढयां  उठिडा गाँव में किया गया था. कई वर्ष  बीत  जाने के बाद शिलान्यास स्थल पर कोई कार्य नहीं हुआ जबकि उत्तराखंड सरकार के ग्रामीण अभियत्रण विभाग ने भवन  निर्माण का पैसा भी आवंटित भी किया जा चुका है. सेवानिवृत अधिकारी श्री विक्रम  सिंह रावत का कहना है कि रोज़गार के लिए सपने पाले स्थानीय ग्रामीण बेरोजगार युवकों में कार्य ना होने के कारण असंतोष पैदा होने लगी है. अधिकारी इस क्षेत्र का विकास नहीं होने दे रही है. पूर्व पंचायत सदस्य भी चंदर सिंह रावत ने ग्रामीण अभियत्त्ना  विभाग व जिला पर्यटन विभाग के अधिकारियों से बातचीत की तो चौकाने वाली बातें अधिकारियों द्वारा कही गयी कि जिस भूमि  पर शिलान्यास किया गया उस भूमी को स्वीकृति नहीं मिली विस्तृत विवरण के लिए सक्रीय लोकसूचना कार्यकर्त्ता व समाज सेवी यशपाल सिंह रावत द्वारा जिला विकास अधिकारी पौड़ी गढ़वाल से सूचना मांगी गयी जिससे विभाग द्वारा पलाक संख्या 105 / लो. सू. अ./ पौड़ी 08 / 09 के द्वारा सूचना दी गयी पर्यटन विकास अधिकारी पौड़ी द्वारा पत्र के माध्यम से बताया गया कि ग्राम सभा उठिडा गाँव में पूर्व चयनित स्थल पर पानी उपलब्ध न होने के कारण योजना को श्री टी. पी. एस  रावत पूर्व विधायक द्वारा नैनिडाडा में अस्पताल के निकट राजस्व भूमी पर पर्यटक आवास गृह निर्माण के निर्देश दिये गए तथा योजना स्थल को विभाग के नाम हस्तांतरण व ग्राम सभा से अनापत्ति प्रमाण पत्र की कार्यवाही चल रही है. ग्राम सभा  प्रधान वीरा देवी रावत से बातचीत की गयी तो उनका कहना है कि आनापत्ति प्रमाण पत्र ग्राम सभा द्वारा 2009 में ही विभाग को दे दिया गया. स्थल पर निरिक्षण के दौरान जाँच कि गयी तो किसी भी तरह का कार्य विभाग द्वारा नहीं कराया गया है जबकि जिला पर्यटन अधिकारी द्वारा सूचना के तहत मार्च 2009 तक कार्य पूर्ण करने का वादा किया गया. अब इसे विभाग की लापरवाही कहे या कुछ और? 

Tuesday, August 17, 2010

ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात और पैदल आवागमन ठप

http://garhwalbati.blogspot.com
देहरादून। मूसलाधार बारिश से चमोली जिले में जोशीमठ व बदरीनाथ के बीच दो अलग-अलग स्थानों पर डेढ़ सौ मीटर सड़क पानी में बह गई। इससे ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात और पैदल आवागमन ठप हो गया है। साढ़े पांच हजार तीर्थ यात्री बदरीनाथ व हेमकुंट साहिब क्षेत्र में फंसे हैं। आपदा प्रबंधन राज्य मंत्री खजान दास ने जिलाधिकारी को मार्ग में फंसे यात्रियों के ठहरने और भोजन की उचित व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं। उधर, ऋषिकेश-गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग भटवाड़ी के पास भारी भूस्खलन के कारण पांचवें दिन भी बंद रहा।
चमोली जिले में भारी बारिश से अलकनंदा नदी और धौली गंगा का जलस्तर बढ़ गया। जोशीमठ और बदरीनाथ के बीच विष्णुप्रयाग के पास हुए भूमि कटाव से 100 मीटर सड़क पानी में बह गई। इसके अलावा, लामबगड़ के पास खचाचढ़ा नाले का पानी बढ़ने से उस पर बना पुल और 50 मीटर सड़क बह गई। जिला प्रशासन के मुताबिक लगभग चार हजार यात्री बदरीनाथ धाम व लगभग डेढ़ हजार यात्री हेमकुंट साहिब क्षेत्र में फंसे हुए हैं। अलकनंदा नदी का जलस्तर बढ़ने से पाण्डुकेश्वर के पास शेषधारा नामक स्थान पर नदी किनारे स्थित साधुओं की तीन कुटियाएं भी बह गई। तीनों साधु सुरक्षित बताए जा रहे हैं। माणा से बदरीनाथ की ओर आ रही एक बुलेरो जीप संख्या यूके 07 टीए-2987 पाटिया नाले में फंस गई। चालक व यात्रियों के बाहर उतरते ही यह जीप पानी के तेज बहाव में बहकर अलकनंदा नदी में समा गई। आपदा प्रबंधन राज्य मंत्री खजान दास ने जिलाधिकारी चमोली को यात्रियों के ठहरने और भोजन की उचित व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं। डीएम चमोली नीरज सेमवाल ने बताया कि राजमार्ग को खोलने का कार्य चल रहा है। दो-तीन दिन में यातायात सुचारू कर दिया जाएगा। दूसरी ओर, बारह अगस्त से भूस्खलन की जद में आए उत्तरकाशी जिले के भटवाड़ी बाजार में भूधंसाव अभी भी जारी है। देश विदेश से गंगोत्री धाम की यात्रा पर निकले यात्रियों के तकरीबन चार सौ वाहन गंगोत्री की तरफ फंसे हैं।
jagran se sabhar

Monday, August 16, 2010

नैनीडाडा मिनी स्टेडियम विकास के लिए अपने आसू रो रहा है?

नैनीडाडा मिनी स्टेडियम विकास के लिए अपने आसू रो रहा है?                   
सुदर्षन सिंह रावत |  पौड़ी गढ़वाल  |  उत्तराखंड, पौड़ी गढ़वाल के नैनीडांडा विकास खंड से आधा किलोमीटर दूर, ग्राम सभा उठिडा गंाव की जमीन पर बनने वाले (मंदरी खत्ता) मिनी स्टेडियम को सालो से बनते-बनते, आज भी विकास के लिए अपनेे अंासू रो रहा हैे इस योजना में भारत सरकार के लाखों रुपये बर्बाद हो चुके है। फिर भी सरकार का ध्यान इस तरफ नहीं गया। पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान विधायक श्री भुवनचन्द खण्डुरी जब केन्द्र में भूतल परिवहन मंत्री थे तो उन्होंने ही इस स्टेडियम का उद्घाटन किया था तथा घोषणा की थी कि नैनीडांडा विकास खंड में यह एक माॅडल स्टेडियम होगा। जिससे क्षेत्र के खेल प्रेमी पूरा आनन्द उठा पाएगें। खण्डूरी जी द्वारा लोक सभा सीट छोड़ने के बाद धुमाकोट विघान सभा केे चुनाव में नैनीडांडा विकास खण्ड की जनता ने भारी बहुमत से जीत दिलाई और मुख्यमंत्री का ताज भी पहनाया। जनता को लगा कि अब क्षेत्र का चैतरफा विकास होगा। लेकिन स्थिति आज भी वही है। जनता को उम्मीद थी कि बरसों से बन रहे मिनी स्टेडियम का कार्य पुरा होगा, नैनीडांडा-शंकरपुर मोटर मार्ग का चैडीकरण और डाबरीकरण होगा। तथा सालो से लम्बित पड़ी पेयजल योजना अब साकार होगी, क्षेत्र के बेरोजगार युवक/युवतियाॅं को रोजगार मिलेगा, छोटे लघु उद्योग, धंधे खुलेंगे, पलायन रुकेगा परन्तु दुर्भाग्य से कहा जा सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री श्री भुवनचन्द खण्डूरी मुख्यमंत्री रहते हुए कोई पहल नहीं कर पाए। आज आम जनता तथा बेरोजगार अपने आप को ठगा महसूस कर रहें।  समाज सेवी कार्यकर्ता यशपाल सिंह रावत व पूर्व क्षेत्रिय पंचायत सदस्य श्री चन्दर सिंह रावत से बातचीत की गयी तो उन्हांेने कहा कि जब प्रतिनिधी आते हैं तो यहांॅं कि जनता की आवाज नहीं सुनते। जनता नेताओं से त्रस्त हैं, नेता आते तो हैं परन्तु विकास कि बात नहीं करते। हमारे पड़ोस में जिला अल्मोड़ा है। यदि आप को विकास देखना है तो अलमोड़ा में जाकर देखिये। किस तरह वहाॅं के चुने हुए प्रतिनिधी अपने क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं? हमारे क्षेत्रिय प्रतिनिधी आम जनता से दूरी बनाऐ हुए हैं अब 2012 के चुनाव नजदीक आ रहे है नेताओ द्वारा वही घड़ियाली अंासू बहाना शुरु हो गऐ हैं। क्षेत्र की जो हालत बनीं हुई है उससे क्षेत्र की जनता आक्रोश में है।

Sunday, August 15, 2010

स्वतंत्रा दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं

स्वतंत्रा दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं

regards
jaydeo kainthola

jaklabs
garhwalbati
http://garhwalbati.blogspot.com

Tuesday, August 10, 2010

महंगे इलाज ने बढ़ाया मरीजों का मर्ज

महंगे इलाज ने बढ़ाया मरीजों का मर्ज
http;//garhwalbati.blogspot.com
सुदर्शन रावत | पौड़ी । सरकारी अस्पतालों की बदहाल चिकित्सा सुविधाओं में भले ही कोई सुधार नहीं न हो पाया होए लेकिन सरकार   ने सरकारी अस्पताल में बीमार लोगों को उपचार को अस्पताल के सामान्य वार्ड से लेकर विभिन्न वार्डो में भरती होने के लिए भी अब दस बार सोचना पड़ेगा। इन वार्डो की फीस भी आज से डेढ से दो गुना तक बढ़ चुकी है।  ने इनमें पर्ची बनाने से लेकर आपरेशन तक अन्य सभी जांचों के बृहस्पतिवार से दाम बढ़ा कर अब मरीजों का मर्ज और बढ़ा दिया है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में भी इलाज करना अब आम लोगों के बस से बाहर होता दिख रहा है।

जिला अस्पताल में पर्चा बनाने ए भरतीए आपरेशनए एक्सरेए अल्ट्रासाउंड और पैथालाजी समेत   रक्तए यूरीनए स्टूल समेत विभिन्न जांच कराने की फीस में इजाफा हो गया है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार एक्सरेए माइनर और मेजर आपरेशनए मेडिकल रिपोर्ट आदि की फीस भी बढ़ी है।अन्य सभी टेस्टों आदि की फीस में कई गुना तक वृद्धि कर दी गई है। है। प्राथमिकए सामुदायिकए संयुक्त और बेस अस्पताल इससे अछूते नहीं है। लोग का कहना है कि हाल ही में पेट्रो पदार्थों के दामों में की गई वृद्धि के बाद अब सरकारी अस्पतालों में भी इलाज महंगा करना आम आदमी की कमर तोड़ने जैसा है। सरकार से इस कदम से आम लोगों में सरकार से इस कदम से आम लोगों में सरकार के प्रति खासा आक्रोश देखने को मिला।

Friday, July 30, 2010

बाल विकास विभाग नैनीडांडा पौड़ी गढ़वाल में 89786 का गबन

उतराखंड। पौड़ी गढ़वाल जिले के नैनीडांडा ब्लाक क्षेत्र के बाल विकास विभाग में कनिष्क सहायक रामपाल सिंह बंागरी द्वारा वर्ष 2003 और 2004 में 89786 रुपये का घोटाला उजागर हुआ है। आगंनवाडी कार्यकर्ती/सहायिकाओं का नवम्बर और दिसम्बर 2003 तथा जनवरी 2004 का मानदेय अभी तक उनके खातो में जमा नही हुआ तथा तब से लेकर आज तक लगातार बाल विकास विभाग द्वारा आश्वासन दिया जा रहा है। समाज सेवी कार्यकर्ता श्री यशपाल सिंह रावत ने जब इस सम्बन्ध में स्वयं विकास परियोजना अधिकारी से बात की तो उनके द्वारा कोई संतोष जनक उत्तर नहीं दिया जा रहा है। अंागनबाडी कार्यकर्ती/सहायिकाओं के लगातार संघर्ष के को देखते हुए रावत ने सूचना अधिकार अधिनियम 2005 में सूचना मांगी तो इस सम्बन्ध में जिला कार्यक्रम अधिकारी (पौड़ी गढ़वाल) ने उपरोक्त गबन की जानकारी दी। जबकी 2003 से आज तक अंागनबाडी सहयोगी लगातार संघर्ष करते आये है। रामपाल सिंह बंागरी के अलावा जिम्मेदार अन्य व्यक्ति के ऊपर कोई कार्यवाही नहीं की गयी और आश्वासन के अलावा अभी तक किसी प्रकार मानदेय अंागनबाडी कार्यकर्ती/सहायिकाओं को भुगतान नही किया गया है इस कारण उनकी हालत दर दर भटकने की हो रही  है।
सुदर्शन सिंह रावत 
http://garhwalbati.blogspot.com

उत्तराखंड स्थाई राजधानी को लेकर आंदोलन की सुगबुगाहट

सुदर्शन सिंह  रावत 
 पर्वतीय क्षेत्र के विकास के नाम पर उत्तर प्रदेश से लंबी लड़ाई लड़ने के बाद बने उत्तराखंड राज्य में एक और आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। यह आंदोलन राज्य की राजधानी गैरसेण या किसी पर्वतीय जगह पर बनाने की मांग के साथ शुरू होगा।
 स्थाई राजधानी किसी पहाड़ी इलाके में बनाने को लेकर भले ही आमजन के मन में आशा की किरण बाकी हो, राज्य के सभी बड़े राजनीतिक दलों और विशेषकर पिछले एक दशक के दौरान सत्तारूढ़ रही भाजपा और कांग्रेस ने देहरादून को ही स्थाई राजधानी बनाने का पक्का निर्णय ले लिया है। हालांकि संवेदनशील मुद्दा होने के चलते कोई भी राजनेता स्पष्ट रूप से कुछ भी कहने से परहेज करता नजर आता है लेकिन पिछले दस वर्षों के दौरान बड़े पैमाने पर देहरादून में हुए सरकारी निर्माण कार्य यह साबित करने के लिए काफी हैं कि जनता को बरगला कर और दीक्षित आयोग के नाम पर झूठी आस को दिलाए रखने वाले राजनीतिक दलों की मिलीभगत के चलते इस पहाड़ी राज्य की राजधानी को देहरादून में ही बनाए रखने का षड्यंत्र रचा जा चुका है।
आंदोलन की पृष्ठभूमि दीक्षित कमीशन द्वारा गैरसेण को राज्य की राजधानी बनाने के लिए उपयुक्त ना माने जाने के बाद उपजे असंतोष से तैयार हुई है।
आंदोलन का तानाबाना बुन रहे देवभूमि संस्कृति रक्षा मंच के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रकाश हरबोला ने बताया कि उत्तराखंडवासी अलग राज्य पाकर भी ठगा महसूस कर रहे है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय राज्य की राजधानी पर्वतीय क्षेत्र में होनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि दशकों से पृथक पहाड़ी राज्य के लिए संद्घर्षरत रही जनता ने 1994 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव सरकार द्वारा गठित रमाशंकर कौशिक समिति के समक्ष पहाड़ी क्षेत्र में नई राजधानी बनाए जाने के लिए एकमत हो राय दी थी। समिति ने कुमाऊं, गढ़वाल और तराई क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, व्यापार मंडलों तथा आम जनता के साथ बैठकें कर अलग राज्य बनाने की बाबत जो संस्तुति की थी उसमें एक प्रश्न नए राज्य की राजधानी से संबंधित भी था।
कौशिक समिति की रिपोर्ट में बहुत साफ-साफ गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने की बाबत जनपक्ष होने की बात कही गई है। समिति के अध्यक्ष ने 30 अप्रैल 1994 को तत्कालीन मुख्यमंत्री को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से नए प्रस्तावित राज्य की राजधानी को कुमाऊं एवं गढ़वाल के मध्य स्थित क्षेत्र में बनाए जाने का उल्लेख करते हुए जनता की इस मांग को प्रमुखता दी थी। इसके बावजूद राज्य बनने के साथ ही देहरादून को स्थाई राजधानी बनाए जाने की मूक सहमति प्रदेश के बड़े राजनेताओं, बड़े जमीन मालिकों, व्यापारियों और नौकरशाहों के बीच बन गई। इसे कौशिक समिति के पहले सचिव रहे वरिष्ठ नौकरशाह आरएस टोलिया की टिप्पणी से समझा जा सकता है।
जब गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने के मुद्दे पर नौ अगस्त 2004 को 39 दिन अनशन पर रहने के बाद वयोवृद्ध आंदोलनकारी बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने प्राण त्याग दिए थे, तत्कालीन मुख्य सचिव टोलिया ने इसे एक असंभव मांग करार देते हुए आंदोलनकारियों को बिन मांगी सलाह दे डाली कि ऐसे मुद्दों पर आंदोलन नहीं किया जाता। डॉ टोलिया का कथन राज्य के पहाड़ी नौकरशाहों की सोच को स्पष्ट करने के लिए काफी है। यही वह सोच है जिसके चलते अस्थाई राजधानी होने के बावजूद देहरादून में अभी तक कुल  16749१  लाख रुपये के स्थाई निर्माण कार्य हो चुके हैं। चूंकि इन निर्माण कार्यों में राज्यपाल व मुख्यमंत्री के आवास, कई सरकारी भवन व विधायक के हॉस्टल इत्यादि शामिल हैं जिससे इस बात की पुष्टि हो जाती है कि राजधानी को देहरादून में ही बनाए रखने का मन वर्तमान सरकार बना चुकी है तथा इसमें सरकार को समर्थन दे रही उत्तराखण्ड क्रांति दल व मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की भी सहमति है। 
गैरसैंण को राजधानी न बनाए जाने के पीछे मुख्य रूप से राज्य की बेलगाम हो चुकी नौकरशाही जिम्मेदार है। देहरादून के ऐशो-आराम को छोड़कर दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र में राजधानी बनाए जाने का सबसे अधिक विरोध नौकरशाहों द्वारा ही किया जाता रहा है। नारायण दत्त तिवारी को बाबा मोहन उत्तराखण्डी की भूख हड़ताल से पूरी तरह अंधेरे में रखा जाना और प्रशासनिक अमले की संवेदनहीनता से यह बात और पुख्ता हो जाती है। तिवारी की राजनीति को जानने- समझने वाले कतई यह नहीं मान सकते कि वह बाबा मोहन उत्तराखण्डी के अनशन तुड़वाने के विरुद्ध थे। कई दशकों से राजनीति में सक्रिय तत्कालीन मुख्यमंत्री जनआंदोलनों और जनभावनाओं के उत्साह को अपने राजनीतिक कौशल से शांत करने की कला में पारंगत माने जाते हैं। ऐसे में उन्हें गलत जानकारी उपलब्ध करा नौकरशाहों ने गैरसैंण के मुद्दे को लेकर आंदोलनरत उत्तराखण्डियों के आक्रोश को भरसक दबाने का प्रयास किया
यहां इस पूरे प्रकरण पर जनता की उदासीनता भी एक बड़ा मुद्दा है। राज्य गठन के बाद उत्तराखण्ड के जनमानस में भारी बदलाव देखने में आ रहा है। जनआंदोलनों के प्रति अब वैसा उत्साह और जोश पूरी तरह से नदारद है रोजगार पृथक राज्य आंदोलन के दौर में देखने को मिलता था। इसकी एक बड़ी वजह शायद राज्य आंदोलनकारी शक्तियों का बिखराव तथा स्वयं उनकी प्रतिबद्धता को लेकर बन
दीक्षित कमीशन के सुझावों के खिलाफ रोष प्रकट करते हुए हरबोला ने कहा कि राज्य की राजधानी पर्वतीय क्षेत्र में बने, इसके लिए नवरात्र के प्रथम दिन से राज्यव्यापी आंदोलन की शुरुआत होगी। उन्होंने बताया कि आंदोलन की रूपरेखा बननी शुरू हो गई है। आंदोलन को एक तीसरा गैर राजनीतिक मोर्चा बनाकर चलाया जाएगा।
हरबोला ने बताया कि इस कार्य में उन्हें जनता सहित भाजपा, कांग्रेस और यूकेडी (उत्तराखंड क्रांति दल) के नेताओं का भी भारी समर्थन मिल रहा है। पर्वतीय क्षेत्र में राजधानी के लिए दलील पेश करते हुए हरबोला ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र में विकास का प्रवाह बहना चाहिए। यदि वास्तव में विकास पर्वतीय क्षेत्र का करना है तो उस दिशा में ही सरकार को आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने बताया कि अलग राज्य बनने के बावजूद भी पर्वतीय क्षेत्र में विकास की कमी होने के कारण लोगों का पलायन मैदानी इलाकों में हो रहा है। राज्य की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
जाने माने लोक गायक एन. एस. नेगी भी दीक्षित कमीशन के सुझावों से आहत हैं। उन्होंने हाल ही में दीक्षित कमीशन के सुझावों के खिलाफ एक गाना भी तैयार किया है। नेगी ने बताया कि वह किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कार्य नहीं करते, बल्कि जनता की वास्तविकता को अपने शब्दों में बयां करते हैं।
गौरतलब है कि नेगी उत्तराखंड के जानेमाने लोकगायक हैं। वर्ष 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार के खिलाफ सूबे की जनता में माहौल बनाने में इनके गाए गीतों का भारी योगदान रहा। नारायण दत्त तिवारी के क्रियाकलापों के खिलाफ गढ़वाली बोली में इनके गीत नौछमी नारायणने उन दिनों राज्य में धूम मचाई थी। राजनीतिक दलों ने तो उनके गीतों की सीडी तैयार कर जनता में मुफ्त में बंटवाई थी।
उत्तराखंड युवा क्रांति दल के अध्यक्ष एवं विधायक पुष्पेश त्रिपाठी का कहना है कि पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की राजधानी गैरसेण में होनी चाहिए। राज्य की जनता का भी यही मत है।
उन्होंने कहा कि स्वयं दीक्षित आयोग ने माना है कि राजधानी के लिए जनभावना गैरसेण के पक्ष में हैं, लेकिन स्थाई राजधानी के लिए जनभावना के खिलाफ जाते हुए उसने भौगोलिक परिस्थितियों को आधार बनाते हुए देहरादून और हरिद्वार के बीच स्थित हर्रावाला को राजधानी बनाने की सिफारिश की है।
त्रिपाठी ने गैरसेण को राजधानी बनाने के लिए हो रहे विलंब में भाजपा-कांग्रेस दोनों दलों को जिम्मेदार ठहराया है। साथ ही उन्होंने मांग की है कि दोनों ही दल राज्य की स्थाई राजधानी के बारे में अपनी राय स्पष्ट करें। गैरसेण के लिए चलने वाले आंदोलन के सवाल पर उन्होंने कहा कि आंदोलन से विकास पर असर पड़ता है, लेकिन अवसर आएगा तो वह आंदोलन से नहीं चूकेंगे।
गौरतलब हो कि नौ नवम्बर, 2000 को प्रभाव में आए उत्तराखंड राज्य में शुरू से ही यह मांग जोरशोर से उठती रही है कि राज्य की राजधानी किसी पर्वतीय क्षेत्र में बनें। किन्तु तत्कालीन सुविधाओं के लिहाज से देहरादून को अस्थाई राजधानी चुना गया। नई राजधानी के चयन हेतु सेवा निवृत न्यायाधीश विरेन्द्र दीक्षित के नेतृत्व में एक आयोग का गठन 11 जनवरी 2001 को किया गया था।
आयोग ने अपने दस सेवा विस्तार के बाद सात वर्षों में अपनी रिपोर्ट तैयार की। हाल ही में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। सरकार ने विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद रिपोर्ट को विधानसभा में प्रस्तुत किया था।
http://garhwalbati.blogspot.com

Friday, July 16, 2010

बटन मशरूम उगाने की विस्‍तृत जानकारी।

बटन मशरूम उगाने की विस्‍तृत जानकारी।
Cultivation technique of Button Mushroom

भारत जैसे देश में जहॉ की अधिकांश आबादी शाकाहारी है खुम्‍बी का महत्‍व पोषण की दृष्‍टी से बहुत अधिक हो गया है । यहां मशरूम का प्रयोग सब्‍जी के रूप में किया जाता है।
भारत में खुम्‍बी उत्‍पादकों के दो समुह हैं एक जो केवल मौसम में ही इसकी खेती करते हैं तथा दूसरे जो सारे साल मशरूम उगाते हैं। मौसमी खेती मुख्‍यत: हिमाचल प्रदेश, जम्‍मू-कशमीर, उत्‍तर प्रदेश की पहाडीयों, उत्‍तर-पश्चिमी पहाडी क्षेत्रों , तमिलनाडु के पहाडी भागों में 2-3 फसलों के लिए तथा उत्‍तर पश्चिमी समतल क्षेत्रो में केवल जाडे की फसल के रूप में की जाती है। पूरे साल खुम्‍बी की खेती सारे देश में की जाती है। चंडीगढ, देहरादून, गुडगावा, उंटी, पूना, चेनई तथा गोवा के आसपास 200 से 5000 टन प्रतिवर्ष खुम्‍बी उगाने वाली निर्यातोन्‍मुखी ईकाठयां लगी हुई है।

व्‍यवसायिक रूप से तीन प्रकार की खुम्‍बी उगाई जाती है। बटन (Button) खुम्‍बी, ढींगरी (Oyster) खुम्‍बी तथा धानपुआल या पैडीस्‍ट्रा (Paddystraw) खुम्‍बी। इनमे बटन खुम्‍बी सबसे ज्‍यादा लोकप्रि‍य है। तीनो प्रकार की खुम्‍बी को किसी भी हवादार कमरे या सेड में आसानी से उगाया जा सकता है।

भारत में बटन मशरूम उगाने का सही समय।
Sowing time of button mushroom in India

भारत में बटन मशरूम उगाने का उपयुक्‍त समय अक्‍तुबर से मार्च के महीने हैं। इन छ: महीनो में दो फसलें उगाई जाती हैं। बटन खुम्‍बी की फसल के लिए आरम्‍भ में 22 से 26 डिग्री सेंटीग्रेड ताप की आवश्‍यकता होती है इस ताप पर कवक जाल बहुत तेजी से बढता है। बाद मे इसके लिए 14 से 18 डिग्री ताप ही उपयुक्‍त रहता है। इससें कम तापमान पर फलनकाय की बढवार बहुत धीमी हो जाती है। 18 डिग्री से अधिक तापमान भी खुम्‍बी के लिए हानिकारक होता है।

बटन मशरूम उगाने के लिए कम्‍पोस्‍ट बनाना तथा उसे पेटीयों या थैलियों में भरना।
Compost filling in polybags or wooden box

बटन मशरूम की खेती के लिए विशेष विधि से तैयार की गई कम्‍पोस्‍ट खाद की आवश्‍यकता होती है। कम्‍पोस्‍ट साधारण विधि (Simple method) अथवा निर्जीविकरण विधि (Pasturization method) से बनाया जाता है।

कम्‍पोस्‍ट तैयार होने के बाद लकडी की पेटी या रैक में इसकी 6 से 8 इंच मोटी परत या तह बिछा देते हैं। यदि बटन खुम्‍बी की खेती पोलिथिन की थैलियों में करनी हो तो कम्‍पौस्‍ट खाद को बीजाई या स्‍पानिंग के बाद ही थैलियों मे भरें। थैलियों में 2 मिलीमीटर व्‍यास के छेद थोडी-थोडी दूरी पर कर दें।

बटन मशरूम बीजाई या स्‍पानिंग
Spaning of button mushroom

मशरूम के बीज को स्‍पान कहतें हैं। बीज की गुणवत्‍ता का उत्‍पादन पर बहुत असर होता है अत: खुम्‍बी का बीज या स्‍पान अच्‍छी भरोसेमदं दुकान से ही लेना चाहिए। बीज एक माह से अधिक पुराना भी नही होना चाहिए। बीज की मात्रा कम्‍पोस्‍ट खाद के वजन के 2-2.5 प्रतिशत के बराबर लें।

बीज को पेटी में भरी कम्‍पोस्‍ट पर बिखेर दें तथा उस पर 2 से 3 सेमी मोटी कम्‍पोस्‍ट की एक परत और चढा दे। अथवा पहले पेटी में कम्‍पोस्‍ट की 3 इचं मोटी परत लगाऐं और उसपर बीज की आधी मात्रा बिखेर दे। तत्‍पश्‍चात उस पर फिर से 3 इंच मोटी कम्‍पोस्‍ट की परत बिछा दें और बाकी बचे बीज उस पर बिखेर दें । इस पर कम्‍पोस्‍ट की एक पतली परत और बिछा दें।

बीजाई के बाद मशरूम की देखभाल
Post spaning care of button mushroom

कवक जाल का बनना:
बीजाई के पश्‍चाज पेटी अथवा थैलियों को खुम्‍बी कक्ष में रख दें तथा इन पर पुराने अखबार बिछाकर पानी से भिगो दें। कमरे मे पर्याप्‍त नमी बनाने के लिए कमरे के फर्स्ट व दीवारों पर भी पानी छिडकें। इस समय कमरे का तापमान 22 से 26 डिग्री सेंन्‍टीग्रेड तथा नमी 80 से 85 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए। अगले 15 से 20 दिनों में खुम्‍बी का कवक जाल पूरी तरह से कम्‍पोस्‍ट में फैल जाएगा। इन दिनों खुम्‍बी को ताजा हवा नही चाहिए अत: कमरे को बंद ही रखें।

परत चढाना या केसिंग करना:
गोबर की सडी हुई खाद एवं बाग की मिट्टी की बराबर मात्राा को छानकर अच्‍छी तरह से मिला लें। इस मिश्रण का 5 प्रतिशत फार्मलीन या भाप से निर्जीवीकरण कर लें। इस मिट्टी को परत चढाने के लिए प्रयोग करें।

कम्‍पोस्‍ट में जब कवक जाल पूरी तरह फैल जाए तो इसके उपर उपरोक्‍त विधि से तैयार की गई मिट्टी की 4-5 सेमी मोटी परत विछा दें। परत चढानें के 3 दिन बाद से कमरे का तापमान 14-18 डिग्री सेंटीग्रेड के बीच व आद्रता 80-85 प्रतिशत के बीच स्थिर रखें। यह समय फलनकाय बनने का होता है । इस समय बढवार के लिए ताजी हवा और प्रकाश की जरूरत होती है। इसलिए अब कमरे की खिडकीयां व रोशनदान खोलकर रखें।

खुम्‍बी फलनकाय का बनना तथा उनकी तुडवाई:
खुम्‍बी की बीजाई के 35-40 दिन बाद या मिट्टी चढानें के 15-20 दिन बाद कम्‍पोस्‍ट के उपर मशरूम के सफेद फलनकाय दिखाई देने लगते हैं जो अगले चार पॉच दिनों में बटन के आकार में बढ जाते हैं।

जब खुम्‍बी की टोपी कसी हुई अवस्‍था में हो तथा उसके नीचे की झिल्‍ली साबुत हो तब खुम्‍बी को हाथ की उंगलियों से हल्‍का दबाकर और घुमाकर तोड लेते हैं। कम्‍पोस्‍ट की सतह से खुम्‍बी को चाकू से काटकर भी निकाला जा सकता है। सामान्‍यत: एक फसलचक्र (6 से 8 सप्‍ताह) में खुम्‍बी के 5-6 फ्लस आते हैं।

मशरूम की पैदावार तथा भंडारण
Production and storage of button mushroom

सामान्‍यत: 8 से 9 किलोग्राम खुम्‍बी प्रतिवर्ग मीटर में पैदा होती है। 100 किलोग्राम कम्‍पोस्‍ट से लगभग 12 किलोग्राम खुम्‍बी आसानी से प्राप्‍त होती है।

खुम्‍बी तोडने के बाद साफ पानी में अच्‍छी तरह से धोयें तथा बाद मे 25 से 30 मिनट के लिए उनको ठंडे पानी में भीगो दें। खुम्‍बी को ताजा ही प्रयोग करना श्रेष्‍ठ होता है परन्‍तू फ्रिज में 5 डिग्री ताप पर 4-5 दिनों के लिए इनका भंडारण भी किया जा सकता है।

स्‍थानीय बिक्री के लिए पोलिथिन की थैलियों का प्रयोग किया जाता है। ज्‍यादा सफेद मशरूम की मॉग अधिक होने के कारण ताजा बिकने वाली अधिकांश खुम्‍बीयों को पोटेशियम मेटाबाइसल्‍फेट के घोल में उपचारित किया जाता है। बटन खुम्‍बी का खुदरा मुल्‍य 100-125 रूपये प्रति किलोग्राम रहता है। शादी-ब्‍याह के मौसम में कुछ समय के लिए तो यह 150 रूपये किलो तक भी आसानी से बिक जाती है।

मशरूम की खेती में सावधानी
Caution in button mushoom cultivation

मशरूम का उत्‍पादन अच्‍छी कम्‍पोस्‍ट खाद तथा अच्‍छे बीज पर निर्भर करता है अत: कम्‍पोस्‍ट बनाते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए । कुछ भुल चूक होने पर अथवा कीडा या बीमारी होने पर खुम्‍बी की फसल पूर्णतया या आंशिक रूप से खराब हो सकती है।

http://garhwalbati.blogspot.com
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...