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Tuesday, October 20, 2009

राजेंदर प्रसाद चमोली

नरु-बिजुला रची प्रेम कहानी
उत्तरकाशी। पहली नजर का प्यार, इकरार, प्यार को पाने की कोशिश, दो इलाकों की परंपरागत दुश्मनी, रार और फिर प्यार करने वालों की जीत, यानी हर वो मसाला इस कहानी में है, जो बालीवुड फिल्मों के लिए अनिवार्य माना जाता है। अंतर है तो सिर्फ इतना कि बालीवुड में बनने वाली फिल्में काल्पनिक कहानियों पर आधारित होती हैं, जबकि यह एक सच्ची कहानी है। बात हो रही है उत्तरकाशी के दो भाइयों नरु और बिजुला की। इन दोनों ने आज से करीब छह सौ साल पहले प्यार की खातिर कुछ ऐसा किया, जो प्रेम डगर पर पग धरने वालों के लिए नजीर बन गया।

कहानी शुरू होती है पंद्रहवीं सदी से। उत्तरकाशी के तिलोथ गांव में रहने वाले दो भाई नरु और बिजुला गंगा घाटी में अपनी वीरता के लिए विख्यात थे। उन दिनों गंगा घाटी और यमुना घाटी के लोगों में परस्पर परंपरागत तौर पर दुश्मनी थी। इस बीच बाड़ाहाट के मेले ने नरु और बिजुला की जिंदगी बदलकर रख दी। दरअसल दोनों भाई मेले में गए थे, यहां उन्हें एक युवती दिखी, नजरें मिली और दोनों भाई उसे दिल दे बैठे। आंखों ही आंखों में युवती भी इकरार का इजहार कर वापस लौट गई। भाइयों ने युवती के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि युवती यमुना पार रवांई इलाके के डख्याट गांव की रहने वाली थी। इसके बाद दोनों भाई डख्याट गांव पहुंचे तथा युवती को तिलोथ लेकर आए।

उधर, डख्याट से युवती को उठाने की सूचना मिलते ही यमुना घाटी रवांई के कई गांवों के लोग इकट्ठा हो गए। उन्हें यह मंजूर नहीं था कि गंगा घाटी वाला उनकी बेटी को उठा ले जाए। सैकड़ों लोग हथियार लेकर नरु- बिजुला को तलाशने लगे। उनका पीछा करते हुए यह लोग ज्ञानसू पहुंचे और रात को यहीं विश्राम किया। ज्ञानसू में रवांई के लोगों के जमा होने की सूचना मिलते ही नरु-बिजुला ने अपने गांव की महिलाओं को अन्न-धन के भंडार समेत डुण्डा के उदालका गांव की ओर रवाना कर दिया और दोनों खुद ही रवांई वालों से लोहा लेने ज्ञानसू पहुंच गए। बताया जाता है कि इस लड़ाई में नरु-बिजुला ने रवांई घाटी के सैकड़ों लोगों की पिटाई कर उन्हें भागने पर विवश कर दिया। इसके बाद दोनों ने अपनी पत्नी के साथ सुखद जीवन जिया। नरु-बिजुला की पीढि़यां आज भी तिलोथ गांव में रहती हैं। इस परिवार के बुजुर्ग बलदेव सिंह गुसाई ने जब यह कहानी सुनाई, तो उनकी आंखों की चमक और चौड़ा होता सीना गवाही दे रहा था कि उन्हें नरु-बिजुला का वंशज होने पर उन्हें गर्व है। उन्होंने बताया कि ज्ञानसू की लड़ाई गंगा-यमुना घाटी की अंतिम लड़ाई थी। एक खास बात यह कि तिलोथ में नरु-बिजुला का छह सौ साल पुराना चार मंजिला भवन आज भी सुरक्षित है। आठ हाल व आठ छोटे कक्ष वाले भवन की हर मंजिल के चारों ओर खूबसूरत अटारियां बनी हैं। इसकी मजबूती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तरकाशी में 1991 में आया भीषण भूकंप भी इसे नुकसान नहीं पहुंचा सका। हालांकि सरकार इस हवेली के संरक्षण को कुछ नहीं कर रही है। नरु-बिजुला परिवार के सतीश गुसांई ने इसे लेकर मई, 2009 में जिलाधिकारी उत्तरकाशी को पत्र दिया, जिस पर डीएम ने संस्कृति निदेशालय से इस ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित करने जरूरत जताई। संस्कृति निदेशालय के सहायक निदेशक योगेश पंत ने पुरातत्व विभाग को आदेश दिए कि भवन का निरीक्षण कर आख्या भेजें, लेकिन पुरातत्व विभाग ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है।

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