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Thursday, May 13, 2010

याद आली टिहरी


फिल्म " याद आली टिहरी" एक बहुत सुंदर और भावुक फिल्म है जो की टिहरी बाँध से बिस्थापित लोगों की कहानी है..., वर्ष २०१० में अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्म है.., 
 
फिल्म समीक्षा
विस्थापितूं कि आंख्यों मा तैरली ‘याद आली टिहरी’
हिमालयन फिल्मस् कि गढ़वाली फिल्म ‘याद आली टिहरी’ ऐतिहासिक टिरी बांध की पृष्‍ठभूमि मा विस्थापित ‘लोकजीवन’ का अनसुलझ्यां सवालों कि पड़ताल का
दगड़ डामूं से जुड़्यां जोखिमूं, जरूरतूं अर औचित्य पर बहस जुटौण कि कोशिश निश्‍चित कर्दी।
   फिल्म कि कहानी दिल्ली बटि अखबारूं मा छपिं पैला पन्ना पर टिरी डुबण कि बैनर न्यूज से शुरू होंदी। जख बटि प्रवासी उद्योगपति राकेश सकलानी डुबदा टिरी कि ‘मुखजातरा’ कू लौटदू। अट्ठारह वर्ष पैलि वू अपणि मां की मौत अर प्रेमिका से बिछुड़न्‌ का बाद टिरी से दिल्ली चलिगे छौ। लौटण पर वे थैं ‘चौं-छ्वड़ी’ भ्वरेंदी झील अपणा हिस्सा(लोक) कू इतिहास, भूगोल, संस्कृति, जन-आस्था, विश्‍वास अर जैव संपदा डुबदी नजर ऐ। अर तब खुलदी वेकि बिसरांईं यादूं कि गठरी। झील मा तैरदा दिखेन्‌ कत्तगि अनुत्तरित प्रश्न। अपणा ‘लोक’ का बिखर्‌यां रिश्ता। यिं झील मा सुणिन्‌‍ वेन्‌ मौन स्वरुं मा अपणि माँ का जरिया विस्थापन से उपजदी पीड़ा का करौंदा शब्द, प्रेमिका सरिता का दगड़ बितायां खुशी का पलछिन अर बिछड़न्‌ कि वज्‍है।
   डुबदी टिरी दुनियावी तमाशबीनों खुणि चा रोमांचक घटना रै हो। लेकिन राकेश का चश्मा देखां त बढ़दी आबादी कि बिजली कि जरुरतूं तैं डाम विकल्प का तौर पर उभरदन्‌, त  दूसरु- आबाद गौं खोळौं का उजड़न्‌ कि त्रासद घटनौं कू साक्षी भी बणदू डाम। जैमा सिर्फ जगा-जमीन ही जल समाधि नि लेन्दी; बल्कि मानवीय रिश्ता बि ‘पहाड़’ से ‘मैदान’ ह्‍वेक रै जांदन्‌। यूं मैदानूं मा न पिपली का ओजलदास का ढोल सुणेदन्‌, न मैधर कि बणाईं ‘सिंगोरी’, न रैठू हलवै कि पकोड़ी कू स्वाद, न अमरशाह सुनार कि बणाईं नथ कि खूबसूरत गढ़थ, न हफीजन फूफू कि हात सजौंदी चुड़ी अर न सरैं का रामू कू घोड़ा मिल्दू। जु दुन्या खुणि एंटिक न बि रै ह्‍वोन्‌। लेकिन टिरी डुबण तक ये ‘लोक’ की पछाण अवश्य था।
   यादूं मा अपणा पितरूं कि जमीन मा हिट्द-हिट्द राकेश थैं माँ का दगड़ का अपणा खेल्वार्‌या दिन, सरिता का दगड़ पैलि मुखाभेंट, ब्योला बणिक औण कू वायदू, मुआवजा हड़पण का वास्ता चैतू-बैसाखू कि ‘तीन-पत्ती’ जन कोशिश झील का हर्‌यां पाणि मा तैरदा लगदन्‌। वक्‍खि विस्थापितूं का गैल पर्यावरणविदों कि बहसूं से ह्‍वेक राकेश टिरी का उजड़न्‌-बसण का बीच सरकारी कारिन्दौं कि असल अन्वार थैं देखण कू प्रयास बि कर्द। डाम थैं लेकि सवाल-जवाब कि यिं गहमागहमी मा बहस जुटदेन्‌ अर अनुत्तरित ह्‍वेक ये पाणि मा ही मोटर बोट से उठदी लहरुं कि तरां फिर शांत ह्‍वे जांदिन्‌। बग्त कि लम्बी जात्रा मा यादूं थैं बिरैक वे तैं सरिता मिल जांदी। पण, तब तक दिल्ली थैं अपणु माण चुकी राकेश सरिता का द्वारा जल्मभूमि नि छ्‌वडण कि जिद्‍द पर वे सणि बि  ‘टिहरी से दिल्ली’ कि दूरी कू अहसास होन्द।
   अनुज जोशीन्‌ उत्तराखण्ड आन्दोलन पर बणी फिल्म ‘तेरी सौं’ का एक बार फेर संवेदनशील मुद्‍दा थैं अपणि फिल्म कू विषय बणै। याद आली टिहरी की कथा-पटकथा का गैल ही निर्देशन का फ्रंट पर अनुजन्‌ फिल्म कि कहानी तैं बांधी रखण मा अबैदां समझदारी दिखै। आखिरी तक तारतम्य का दगड़ अगनै बढ़दी फिल्म मा हलांकि कुछ सवाल उठदन्‌ अर अनुत्तरित रैक ही टिरी की तरां झील मा समै जांदन्‌। निश्चित ही संवेदनशील कथानकूं पर एक दगड़ सब कुछ परोसण कू लोभ का चलद्‍ अधूरी छुटदी बहसूं थैं भी समझे सकेन्द च। उनै, गढ़वाली फिल्म निर्माताओं का बीच जम चुकी यू कथित भ्रम बि अखर्दू च कि, पौड़ी, टिहरी, चमोली, उत्तरकाशी, देहरादून का लोग एक दूसरा कि भाषा तैं बिलकुल नि समझदन्‌। अर तब उपजदी एक नई भाषा। जैमा जुड़दन्‌ ‘आण्यां-जाण्यां, पता नि कू नौना थौ अर था कि जगा थै जना कई अपभ्रंशित शब्द। 
   प्रेमकथा का इर्दगिर्द बुणिं फिल्म याद आली टिरी मा नायक मदन डुकलान, रोशन धस्माना, मंजू बहुगुणा, कुलानन्द घनसाला अर सोबन पुण्डीरन्‌ अपणा किरदार बखूबी निभैन्‌। जबकि उमा का अभिनय मा अब्बि गुंजैश बाकी लगदी। हलांकि डुकलान बि युवा चरित्र मा असहज दिखेंदन्‌। फिल्म का गीत नरेन्द्र सिंह नेगी, मदन डुकलान, जितेन्द्र पंवार अर जसपाल राणा का लेख्यां छन। आलोक मलासी का संगीत मा नेगी, जितेन्द्र, आलोक, जसपाल का गैल किशन महिपाल अर मीना राणान्‌ ई गीत गैन। फिल्म का संवाद कुलानन्द घनसालान्‌ लिखेन्‌ अर कैमरा जयदेव भट्टाचार्यन्‌ संभाळी।
   अंतत्वोगत्वा बोलां कि ‘याद आली टिहरी’ जख विस्थापितूं कि आंख्यों मा तैरली वखि बांध वळा बि समझला कि विकास कि कीमत पर बण्यां यना ‘डाम‘ मानवीय हितूं का  कथगा करीब छन।

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