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Tuesday, November 9, 2010

कितनी कारगर है उत्तराखण्ड की महिला बाल विकास योजना

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(सुदर्शन सिंह रावत) | उत्तराखण्ड में महिला सशक्तिकरण और बाल विकास योजना के तहत राज्य सरकार ने नंदादेवी कन्या योजना के तहत चालू वित्त वर्ष में करीब 16 करोड़ रुपए आवंटित किए। आँकड़े के अनुसार महिला सशक्तिकरण के नाम पर 4 हजार करोड़ रूपये खर्च किए गए। मुख्यमंत्री आर पी निशंक के द्वारा राज्य सभा में लैंगिक मामलों से संबंधित एक बजट प्रस्तुत किया गया, जिसमें बजट को 2007-08 में 333 करोड़ रु. से बढ़ाकर 1 हजार 205 करोड़ रुपये कर दिया गया। पिछले वर्ष लिंग बजट के 20 विभाग थे, परंतु इस वर्ष चार और विभाग को इसमें शामिल किया गया, जिसमें महिलाओं की सुख समृद्धि और कल्याण को प्रमुखता दी जाएगी। महिलाओं के कल्याण से सम्बंधित गौरा देवी कन्याधान योजना, नंदा देवी योजना और इस प्रकार की अन्य योजनाओं की शुरूआत की गई। इस योजना को दो वर्गो में विभाजित किया गया। पहला महिलाओं के लिए और दूसरे वर्ग में 30 प्रतिशत लाभ महिला आबादी के लिए रखा गया है। नंदादेवी कन्या योजना, बालिकाओं को आर्थिक एवं शिक्षित सुरक्षा प्रदान करने के लिए की गई। इसके अन्तर्गत लैंगिक असमानता को दूर करने कन्या भ्रूण हत्या को रोकने, बाल विवाह को रोकने, कन्या शिशु को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है। इस योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों में जन्मी लड़कियों के नाम 5 हजार रुपये का एक फिक्स डिपाजिट चैक दिया जाता है। अगर लड़की 18 साल की हो जाती है तो यह  राशि  उसके द्वारा प्राप्त की जा सकेगी। यदि 18 साल से पहले किसी कारण से कन्या की मृत्यु हो जाती है तो यह राशि वापस सरकार के खजाने में जमा करा ली जाएगी।
नंदादेवी योजना का मुख्य उदेश्य राज्य में लिंग अनुपात में आई कमी को ठीक करना है। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार लिंग अनुपात की दृष्टि से उत्तराखण्ड में एक हजार पुरुषों पर वर्तमान में 962 महिलाएं है। इस योजना का उद्देश्य परिवार व समाज में बालिकाओं की स्थिति को समानता पर लाना, बाल विवाह पर रोक लगाना, कन्या की गंभीर बीमारी का इलाज कराना, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना, जन्म पंजीकरण को बढ़ावा देना, टीकाकरण के प्रति जागरुकता पैदा करना और गर्भवती माहिलाओं का सौ फीसदी पंजीकरण कराना शामिल है।
महिला सशक्तिकरण के ऊपर 48.73 करोड़ रूपये खर्च किए गए। सरकार महिलाओं के विकास के लिए विशेष ध्यान दे रही है। इसके अलावा राज्य में बच्चों के विकास के लिए देव भूमि मुस्कान योजना, मोनाल परियोजनाएं भी चला रही है, इतनी कल्याणकारी योजनाएं होने के बावजूद भी दूरदराज पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली गरीब महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

हार्दिक शुभकामनाये

दोस्तों / साथियों

आज उत्तराखंड बने पूरे दस साल (एक दसक)  होने पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाये  और नमन उन शहीदों को जिन्होंने राज्य निर्माण में अपनी प्राणों की आहुति दी!

जयदेव कैंथोला 
गढ़वाल बटी / घौर बटी 
BAZAARDEKHO.COM  

Tuesday, November 2, 2010

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|| Sudershan Singh Rawat || कोटद्वार  नैनीडांडा  कांग्रेस  कार्यकर्ताओं  की  न्याय पंचायत  स्तर पर बैठक  की गई  ज़िसमें  सेक्टर अध्यक्ष यशपाल सिंह  रावत ने  पिछले  दिनों  हुई  अतिवृष्टि व भूस्खलन  से हुऐ नुक्सान  की  भरपाई  न कर पाने  के  लिए  सरकार को  दोषी  ठहराया  गया   प्रदेश  में  सितंबर माह में हुई अतिवृष्टि से  धुमाकोट.किनगोड़ीखाल ए दीव खाल नैनिडांडा.शंकरपुर मार्ग के  संचालन के लिए रोड  नहीं खुलपाने पर लोक निर्माण  विभाग  व स्थानीय  विधायक  पर उदासीनता  का आरोप   लगाया  गया  है ए  यहाँ  तक  की  यशपाल  सिंह  ने सरकार  पर गंभीर  आरोप   लगाये  हैं कि क्षेत्र में  रसोई  गैस  व मिटी तेल की  किलत  पर  भी  खाद्य  निगम  की  कार्य प्रणाली  पर दोष  दिया  गया मिटी तेल से  व्यवसायिक  बाहन   चलाये  जा रहे  हैं ए किन्तु  गरीब  जनता  को घर में चिमनी  जलाने  के  लिए  शीशी भर तेल  भी  उपलब्ध  नहीं  हो  पा रहा है ए यहाँ  तक की बी पी एल एब अन्तोदय  का राशन  भी  समय  पर    लाभार्थीयों    को नहीं  दिया जा  रहा  है  साथ  ही  सरकार  को समय रहते  उचित कार्यवाही  न  करने  पर धुमाकोट में जनाक्रोश  रैली  के लिए  कांग्रेश  कार्यकर्ताओं    को  तैयार  रहने  के  लिए  कहा  गया  है  रैली  में  छेत्र   कि विभिन  समस्याओं  व  जिले के  आधिकारियो  की कार्यगुजारिओं  का पर्दाफास किया  जाऐगा  अध्यक्षता  जंगबहादुर सिंह  नेगी  कुलदीप  सिंह  चंदर सिंह  प्रेम सिंह  गोपाल सिंह मोहन लाल भोपाल लाल  दिलबर सिंह गजेंदर  सिंह  व कई  कार्याकर्ता  उपस्थित  थे

Saturday, October 23, 2010

हरिद्वार से पटना तक नावों से गंगा अभियान

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साहसिक खेलों को बढ़ावा देने और गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश पुलिस स्पोर्टस श्रृंखला के तहत हरिद्वार से पटना तक गंगा अभियान का आयोजन किया गया है। आगामी 24 अक्टूबर से 21 नवम्बर तक चलने वाले गंगा अभियान को उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक ज्योति स्वरूप पांडे हरिद्वार में हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे।
उत्तर प्रदेश पुलिस स्पोर्टस कंट्रोल बोर्ड के सचिव और पुलिस महानिरीक्षक (पीएसी) अरूण कुमार ने शुक्रवार को कहा कि साहसिक खेलों को बढ़ावा देने, गंगा नदी को प्रदूषण से मुक्त रखने और पर्यावरण संरक्षण इस अभियान का मुख्य लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक 11 फाइबर की बनी नावें (क्याक) और कैनों को हरी झंडी दिखाएंगे।
गंगा अभियान को (निर्मल गंगा अविरल प्रवाह) का नाम दिया गया है। हरिद्वार से शुरू होकर यह अभियान गढ़ मुक्तेश्वर, बुलंदशहर, फतेहगढ़, कन्नौज.कानपुर, उन्नाव, प्रतापगढ़, इलाहाबाद, मिर्जापुर, विंध्याचल, चुनार, वाराणसी होते हुए पटना के वंशघाट पर खत्म होगा।
अरूण कुमार ने कहा कि तेरह सौ किलोमीटर की दूरी 27 दिन में गंगा के 26 घाटों पर रूकेगी। गंगा अभियान के दूसरे चरण में रोइंग नाव का इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि गंगा अभियान का दूसरा चरण वाराणसी से पटना तक का होगा। वाराणसी से अभियान की शुरूआत आगामी 16 नवम्बर को होगी। पटना में खासपुर इलाके के वंशघाट पर अभियान खत्म होगा। घाटों पर विराम में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन होगा। उन्होंने कहा कि सुरक्षा के लिए पीएसी की मोटर वोट भी साथ साथ चलेगी।
 sabhar  livehindustan.com

पुलिसवालों को मिल सकता है दीवाली का तोहफा

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मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ पुलिसवालों के लिए दिल्ली पुलिस के समान वेतन और सुविधाओं की घोषणा कर सकते हैं। पुलिस मुख्यालय ने दिल्ली के समकक्ष वेतन के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा है। राज्य के 21 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों को उम्मीद है कि गुरुवार को सीएम दीवाली के तोहफे के रूप में स्मृति परेड पर यह घोषणा कर सकते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके पास ऐसा प्रस्ताव आया है जिस पर विचार किया जा रहा है।

उत्तराखंड पुलिस में कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर संवर्ग तक लगभग 21 हजार पांच सौ पुलिसकर्मी हैं। इनमें सर्वाधिक 17 हजार से अधिक कांस्टेबल हैं। छठा वेतन मिलने से पहले दिल्ली और उत्तराखंड पुलिस के कांस्टेबल और इंस्पेक्टर का वेतन समान था, लेकिन इसके लागू होते ही इसमे अंतर आ गया। दोनों का पे स्केल समान है, परंतु पे बैंड में अंतर है।
हालांकि उत्तराखंड में कांस्टेबल भर्ती के लिए शैक्षिक योग्यता हाईस्कूल है, जबकि दिल्ली में इंटरमीडिएट निर्धारित है, लेकिन यह कोई बड़ा सवाल नहीं है। क्योंकि उत्तराखंड में योग्यता हाईस्कूल होने के बावजूद 90 फीसदी अभ्यर्थी इंटर, स्नातक व स्नात्तकोतर कांस्टेबल में भर्ती होते हैं। दिल्ली में सब इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर का पे बैंड अलग -अलग है, जबकि उत्तराखंड में दोनों का समान है, जिससे यहां के इंस्पेक्टर दिल्ली के पुलिस इंस्पेक्टर के कम वेतन पाता है।

इस असमानता को दूर करने के लिए पुलिस मुख्यालय ने शासन को प्रस्ताव भेजा है। इसके अलावा मुख्यालय ने ग्राम चौकीदारों का मानदेय 200 से एक हजार और थाने व चौकियों के सफाईकर्मियों का मानदेय प्रतिमाह तीन सौ से एक हजार रुपये करने का आग्रह किया है। गुरुवार को पुलिस लाइन में आयोजित स्मृति परेड पर सीएम शहीद पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजलि देंगे। इस मौके पर वे पिछले साल की तरह पुलिसकर्मियों को दीवाली के तोहफे के रूप में कुछ घोषणाएं कर सकते हैं।

दिल्ली पुलिस
संवर्ग पे स्केल ग्रेड पे
कांस्टेबल  5200-20200 2000
हेड कांस्टेबल 5200-20200 2400
एएसआई 9300-34800 4200
इंसपेक्टर 9300 -34800 4600

उत्तराखंड पुलिस

संवर्ग  पे स्केल ग्रेड पे
कांस्टेबल 5200-20200  1900
हेड कांस्टेबल 5200-20200 2000
एएसआई 9300-34800 4200
इंस्पेक्टर 9300-34800 4200
 sabhar LiveHindustan.com

Monday, October 18, 2010

आई विल मीट यू ऑन मार्स इन 2030

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'आई विल मीट यू ऑन मार्स इन 2030'। दून पहुंचे पूर्व राष्ट्रपति मिसाइलमैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने कुछ इसी तरह किया बच्चों से मंगल पर मिलने का वादा। यूनेस्को की ओर से आयोजित 'घुमक्कड़ नारायण' कार्यक्रम के समापन समारोह में पहुंचे डॉ. कलाम बच्चों के बीच भाव-विह्वल नजर आए। उन्होंने एक पिता की तरह बच्चों के साथ चर्चा की और उन्हें आशीर्वाद दिया। उन्होंने बच्चों से उनकी रुचियों के बारे में पूछा तो बच्चों ने चाचा कलाम से मंगल ग्रह पर जाने की इच्छा जताई। इस पर उन्होंने कहा कि भारत इस ओर से तेजी से आगे बढ़ रहा है और अगले दो दशक में हम इसमें सफल हो जाएंगे।
रविवार को राजधानी के एक स्कूल में आयोजित समारोह में आयोजित उक्त कार्यक्रम में भाग लेने आए डॉ. कलाम बच्चों के साथ अपने पुराने रूप और चिर-परिचित अंदाज में ही दिखे। बच्चों के बीच उनके चेहरे की चमक, उत्साह और बच्चों के साथ उनके सीधे संवाद का अंदाज देखने लायक था। उन्होंने बच्चों से पूछा कि वे किस क्षेत्र में जाना चाहते हैं तो बच्चों के जवाब से लगा कि अधिकांश की रुचि मेडिकल व इंजीनियरिंग में है, राजनीति में जाने वाले भी काफी छात्र हैं, पर शिक्षक बनने में किसी की रुचि नहीं है। डॉ. कलाम के एक सवाल पर पूरे पंडाल के हाथ हवा में नजर आए। यह सवाल था कि चांद व मंगल पर कितने छात्र जाने चाहते हैं तो हर किसी ने इच्छा जताई। इस सवाल पर डॉ. कलाम ने कहा कि 'आई विल मीट यू ऑन मार्स इन 2030'। इस पर पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। डॉ. कलाम ने कहा कि भारत तेजी से इस दिशा में आगे बढ़ रहा है और अगले 20 वर्षो में हमारी पहुंच मंगल तक होगी।
उन्होंने बच्चों को सफलता के चार सूत्र बताए-आम आदमी की तरह जीना, लगातार ज्ञान प्राप्त करना, कठिन परिश्रम व जीतने की चाह। उन्होंने बच्चों से वादा कराया कि देश का भविष्य मजबूत बनाने के लिए छात्र इनका पालन करेंगे।
पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि पुस्तकें किसी भी व्यक्ति की सबसे अच्छी साथी होती हैं। उन्होंने पंडाल में मौजूद छात्र व उनके अभिभावकों को शपथ दिलाई की वे अपने घरों में कम से कम 20 किताबों की एक लाइब्रेरी स्थापित करेंगे। इस दौरान डॉ.कलाम ने बच्चों के कई सवालों के जवाब दिए, स्कूल को बच्चों के लिए किताबें भेंट कीं और कहा कि व्यक्ति, समूह, समाज या संप्रदाय से बढ़कर है देश। इसलिए आगे बढ़ो और देश के लिए काम करो।
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सुदर्शन सिंह रावत |  
शायद कम ही  लोग  जानते 1990 के दशक में गढ़वाल विश्वविद्यालय में हरक  सिंह  रावत शिक्षक रहते ही  राजनीति को अपना पेशा बना चुके थे। तब  कवि और  पत्रकार आज के  मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक व  विपक्ष  के  नेता  हरक सिंह  रावत  में घनिष्ट  दोस्ती   होने  के कारण  कभी -कभी विपक्ष  व सत्ता  के  नेता पहले तो यह बात भाजपा और कांग्रेस के भीतर खुसफुसाहट के रुप में कही जा रही थी उनके और मुख्यमंत्री के बीच  कोई  गुप्त संधि तो नहीं  हैं राजनिती   में पुराने बातो को  खूब  उछाला  जाता  है  हरक  सिंह रावत  स्कूटर  के  आगे और उनके  पीछे की सीट पर आज के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक हुआ करते थे। लेकिन वक्त ने करवट बदली और आज मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक  आगे और उनके  पीछे की सीट हरक सिंह रावत  दोनों  स्कूटरिया यार निशंक को भाजपा आलाकमान ने उत्तराखंड को चलाने का जिम्मा सौंप दिया। हरक सिंह के पास विधानसभा के भीतर कांग्रेस को चलाने का भार है। स्कूटर वाली दोस्ती कायम है। इसे कहते हैं सच्ची  दोस्ती! सीटें बदल गईं पर दोस्ती नहीं बदली। प्रदेश हैरान है। पौड़ी विधानसभा क्षेत्र से राजनीति शुरु करने वाले हरक सिंह रावत । राजनिती  के  उस्ताद माने जाते। पहले मनोहर कांत ध्यानी फिर बीसी खंडूड़ी की उंगली थाम कर भाजपा की राजनीति में ऐसे जमे कि भाजपा के भीतर कईयों को उनसे खतरा महसूस होने लगा। बीजेपी की नई पीढ़ी के नेताओं में उन्होने सबको पीछे छोड़ दिया। उनकी महत्वाकांक्षाओं को भांप रहे नेताओं ने उन्हे भाजपा से बाहर करवा दिया।भाजपा से निकलकर उन्होने सतपाल महाराज की उंगली थामी और 1996 के लोकसभा चुनाव में उनकी सोशल इंजीनियरी और चुनावी तिकड़मों ने मिलकर भाजपा के जनरल को चित कर दिया। सतपाल महाराज को राजनीति में भी चेले चाहिए या फिर भक्त। वह खुद ही गढ़वाल में ठाकुर राजनीति के कर्णधार होना चाहते थे हरक सिंह राजनीति में महाराज का संप्रदाय बनाने तो नहीं आए थे। वह गढ़वाल विवि की शिक्षक राजनीति के गुरुकुल में प्रशिक्षित थे। गुरु को गुड़ बनाए रखने व खुद शक्कर बन जाने की टेक्नोलॉजी में दक्ष हरक सिंह सतपाल के कंधे पर सवार होकर राजनीति में लंबी छलांग मारने को आतुर थे। लिहाजा ठाकुर क़ी यह हिट जोड़ी भी टूट गई। हरक सिंह बसपा में गए और वहां भी उन्होने अपना लोहा मनवाया। एक दशक से ज्यादा समय तक राजनीति में घुमक्कड़ की तरह इधर उधर आते जाते रहे हरक फिर कांग्रेस में पहुंचे तो वहां उन्होने डेरा जमा लिया।अदम्य महत्वाकांक्षा और दबंग राजनीति हरक की राजनीति की बुनियादी ताकत है। अपने समर्थकों के लिए किसी से भी भिड़ जाने की उनकी खासियत से ही उनके पास कुछ कर गुजरने वाले समर्थकों की पल्टन है। राजनीति की यह खासियत ही उनकी सीमा भी है।उनके विरोधी भी उतने ही कट्टर हैं जो किसी भी कीमत पर उन्हे आगे नहीं आने देना चाहते। इसीलिए विवादों से उनका पुराना नाता रहा है। पटवारी भर्ती कांड, जेनी कांड समेत कई विवादों से घिरे हरक अब भूमि घोटाले में घिर गए हैं। मुख्यमंत्री के सबसे तगड़े दावेदार माने जा रहे हरक सिंह रावत को दौड़ से बाहर करने के लिए इनके  विरोधी  इसे साजिस की  तरह  उछाला जा सकता  है |

Friday, September 24, 2010

परिसीमन से परेशान उत्तराखंड

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|| सुदर्शन सिंह रावत ||
उत्तराखण्ड राज्य में परिसीमन लागू होने से क्षेत्रीय असन्तुलन विकास में मुख्य समस्या बन गया है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के पीछे पहाड़ों के विकास सम्बन्धी जो मूल भूत कारण रहे है आज वे धीरे-धीरे वह विकास के रास्ते के बहुत पीछे छूट गये हैं। चाहे वो  राजधानी का मसला हो या परिसीमन का मुदा, आज भी वैसे है हाँलकि परिसीमन का मुदा तो पूरे देश के लिए सिरदर्द बना हुआ है। समय-समय पर लाकेसभा और विधान सभा में परिसीमन की सीमाओं को लकेर पुननिर्धारण की मांग उठती रही है जिसका आधार होता है जनसंख्या का बढ़ना या कम होना। जिसके कारण सीटो का क्षेत्र बदल दिया जाता है हांलाकि राज्यों में सीटो की संख्या यथावत रहती है लेकिन सीमांए बदले जाने से सीटठो के अन्तर्गत कई ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों की अदला-बदी हो जाती है यहां तक अनारक्षित सीट आरक्षित सीट में बदल जाती है और पहाडी क्षेत्र की सीटें मैदानी क्षेत्र में आ जाती है।
उत्तराखण्ड की भौगोलिक स्थिति अन्य राज्यों से अलग है जब परिसीमन आयोग उत्तराखण्ड आया तो यहां कि प्रमुख पार्टी (उत्तराखण्ड क्रान्तिदल-उक्रद) ने इसकी तीनों बैठकों (देहरादून, नैनीताल, पौड़ी) में इसका विरोध किया था तथा आयोग को उत्तराखण्ड की वास्ताविक स्थिति से अवगत कराया। वहा के स्थानीय लोगों में समाजसेवी यशपाल सिंह रावत का कहना है कि राज्य में परिसीमन भौगोलिक आधार पर या 2002 के परिसीमन के आधार पर हो क्योंकि नये परिसीमन में कई पहाड़ी विधानसभा क्षेत्र समाप्त होकर मैदानी क्षेत्रों मिल रहे है। जबकि उत्तराखण्ड में नए परिसीमन की आवश्यकता ही नही है उसे यथावत ही रहने देना चाहिए। जिसे पहाड़ी क्षेत्रों का और विकास होगा।
नए परिसीमन लागू होने के बाद जिला चमोली गढ़वाल से एक सीट (नन्द प्रयाग), पौड़ी गढ़वाल से दो सीट (घुमाकोट, वीरोखाल), पिथोरागढ़ से एक सीट (बागेश्वर) तथा अल्मोड़ा से भी एक सीट मिलाकर कुल छः सीटे पर्वतीय क्षेत्रों से कम हुई है जिन्हे मैदानी क्षेत्रों में जोड़ दिया गया रूदप्रयाग और चम्पावत जैसे दुर्गम इलाको में 1 लाख 14 हजार की आबादी विधायक बनाए गये है जबकि देहरादून के 55000 की आबादी की आबादी पर एक विधायक बना दिया गया। हऱिद्वार जिले में हर 16 किलोमीटर पर एक विधायक ह जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में 120 किलोमीटर से भी अधिक पर एक विधायक है यहा तक की पर्वतीय क्षेत्र के विधायक के लिए चीनी सीमा से लगे जोहर व्यास और दरमावैली की 300 किलोमीटर की दूरी तय करना एक चुनोती पूर्ण कार्य है।
आज राज्य में फिर से परिसीमन लागू किये जाने से उस क्षेत्र की समस्या और भी बढ़ गयी है मैदानी क्षेत्र में 26 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक विधायक है वही पर्वतीय क्षेत्रों में दस गुना क्षेत्रफल पर एक विधायक है पहाड़ों की भोगोलिक स्थिति विषम है। यहां तक सुविधाओं का भी आभाव है इस आलोक में उत्तराखण्ड की परिसीमन किसे क्यों और कैस मान्य हो सकता है जो कि बहुत बड़ी पीड़ा है?
वर्तमान मिह में ये देखा जाय तो पर्वतीय क्षेत्रों में लागे इस परिसीमन से विधायको के लिए लोकवित में निर्धारतिरत निधि का सदुप्रयोग प्रभावित हो सकता है इस प्रक्रिया में सरकार के लगभग नौ करोड़ रुपये का नुकसान होने की सम्भावना है। नैनीडांडा के चन्दर सिंह रावत व बिक्रम सिंह रावत का कहना है कि सरकार की ना समझाी भरी नीतियों के कारण ही पहाड़ी क्षेत्रों से जनता के पलायन के चलते मैदानी क्षेत्रों के जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है रोजगार के लिए पलायन करना यहां के लोगों की मजबूरी बन गयी है घनस्याली, टिहरी बी. एन. डंगवाल का कहना है कि हिमालयी राज्यों में परिसीमन क्षेत्र के आधार पर किया जाना चाहिऐ क्योंकि 2 गांव का फासला लगभग 3 से चार किलोमीटर से ज्यादा है और यातायत के साधन न होने के कारण यह फासला पैदल ही तय करना पड़ता है अगर यह परिसीमन जनसंख्या के आधार पर हो गया तो सदूर इलाकों में विकास होना लगभग अब असभ्य हो जायेगा।
वास्ताविक उत्तराखण्ड तो गांव में ही निवास करता है। उत्तराखण्ड की संस्कृति गांव में ही है यदि इसका सरक्षण करना है तो गाव का विकास करना जरूरी है परिसीमन लागू होना हो अब गावों की दृदर्शा होनी वक्त का तकाजा है कि परिसीमन के मुददे को लकेर सविधान में ससोधन किया जाये। संविधान में संसोधन से ही परिसीमन से होने वाले नुकसान से बचने का एक मात्र रास्ता है यदि निकट भविश्य में ऐसा नही हुआ तो पर्वतीय क्षेत्र की स्थिति और भी भयावह हो सकती है, लोग रोजगार की तलाश में मैदानी क्षेत्रों  में पलायन करते है और वही बस जाते है जबकि पहाड़ी ़क्षेत्रों की स्थिति आज के समय में अनुकूल नही है, क्योंकि यहां पानी लाने के लिए भी 4 किलोमीटर दूर तक जोते हैं तथा फसल बोने और सूखाने तक हाड तोड मेहनत करने के बाद राशन की दुकान व बच्चों को स्कूल जाने के लिए 5 किलोमीटर तक पैदल जाना पड़ता है। ऐसी परिस्थिति में गांव को मिलने वाली सुविधा भी छीन ली गयी है इसे बड़ा अन्याय उत्तराखण्ड पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए और क्या होगा?

Sunday, September 19, 2010

कोटद्वार में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस डाइग्नोस्टिक सेंटर को मंजूरी


कोटद्वार, जागरण कार्यालय: सिर सहित अन्य अंदरूनी बीमारियों के परीक्षण के लिए अब रोगियों को दिल्ली, देहरादून की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी। क्षेत्रीय जनता की मांग पर शासन ने कोटद्वार में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस डाइग्नोस्टिक सेंटर को मंजूरी प्रदान कर दी है। करीब 16 करोड़ की लागत से बनने वाले इस सेंटर का निर्माण चिकित्सालय परिसर में ही होगा।
कोटद्वार क्षेत्र की जनता पिछले लंबे समय से राजकीय संयुक्त चिकित्सालय में सीटी स्कैन, एमआरआई सहित अन्य सुविधाएं शुरू करने की मांग कर रही थी। राजकीय संयुक्तचिकित्सालय में सीटी स्कैन सहित अन्य चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिससे सिर सहित शरीर के अन्य हिस्सों में लगने वाली मामूली अंदरूनी चोटों के लिए मरीज को दिल्ली, देहरादून ले जाना तीमारदारों की मजबूरी बन जाता है। हालांकि, क्षेत्रीय जनता की इस मांग पर अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया गया। अब शासन ने जनता की इस मांग को जायज मानते हुए कोटद्वार में पीपीपी मोड में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस डाइग्नोस्टिक सेंटर खोलने का निर्णय लिया है।
जानकारी के अनुसार, चार चरणों में बनने वाले इस सेंटर में प्रथम चरण में एमआरआई व सिटी स्कैन, द्वितीय चरण में एक्स-रे, फ्लोरोस्कॉपी, मेमोग्राफी, तृतीय चरण में पैथोलॉजी से संबंधित विभिन्न उपकरणों व चतुर्थ चरण में ईसीजी, ईसीएचओ, ऑडियोमैट्री आदि मशीनें स्थापित की जाएंगी। डाइग्नोस्टिक सेंटर की स्थापना चिकित्सालय परिसर में ही टीबी वार्ड के स्थान पर होगी।

वर्षा ने किया ऋशिकेष-बदरीनाथ राश्ट्रीय राजमार्ग बन्द

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वर्षा ने किया ऋशिकेष-बदरीनाथ राश्ट्रीय राजमार्ग बन्द
लगातार हो रही तेज वर्शा ने प्रान्त की सभी सड़कों को अवरोध कर दिया है। सड़कों पर कई जगह भूस्खलन हो गया जिसके कारण वाहनों का आवागमन लगभग बन्द सा हो गया है और लोगों को कई किलोमीटर तक पैदल ही चलना पड़ रहा है। बदरीनाथ राश्ट्रीय राजमार्ग कई जगहों पर बन्द है तो केदारनाथ राजमार्ग में भी भूस्खलन होने के कारण आवागमन बन्द है। अलकनंदा और मंदाकिनी भी खतरे के निशान  पर बह रही है जिसके कारण लोग दहषत में है ऋशिकेष-बदरीनाथ राश्ट्रीय राजमार्ग बन्द होने से आवष्यक सामग्री की आपूर्ति नही हो पा रही है। इस मार्ग में कई जगहों पर वाहन फंसे है पर सड़क मार्ग कब खुले किसी को मालूम नहीं। पूर्व से बन्द पड़े मार्गों की स्थिति और भी खौफनाक होगी है अब तो पैदल चलने मंे भी परेषानी हो रही है। अलकनंदा एवं मंदाकिनी का जलस्तर खतरे के निषान तक पहुंचने से नदी किनारे बसे गांव के लोग अपने घरोन्दे छोड़ने को मजबूर हो गये है और गांव में भी लोग अपने घरों छिपे बैठे हैं पर उन्हंे भी भूस्खलन का डर सता रहा। बिजली भी आंख मिचैली खेल रही है जिससे लोगों का जीवन और भी अस्त-ब्यस्त हो गया है।
बारिश के चलते अलकनंदा ने उग्र रूप दिखा दिया है। नदी का जलस्तर खतरे निशान पर जा पहुंचा है। जलस्तर बढ़ने से नदी किनारे बसे कई परिवारों ने अन्यत्र शरण ले ली है। जलस्तर बढ़ने से नगर पालिका के स्नानघाट और भोलेनाथ की मूर्ति जलमग्न हो गई और नदी किनारे बसे भवनों को खतरा पैदा हो गया है। 72 घंटे से अधिक की तेज बरसात से कुमाऊंभर में दो सौ से अधिक मकान ध्वस्त हो गये है और सभी मोटर मार्ग बंद है। इससे कुमाऊं के सभी पांच जनपद शेष दुनिया से अलग-थलग हो गये है। हल्द्वानी में गौला नदी के उफान पर आने के कारण काठगोदाम से गौलापार-सितारगंज रोड का लौह पुल खतरे की जद में आ गया है। प्रशासन ने पुल पर आवाजाही बंद कर दी है। भारी वर्षा से पूरा शहर जलमग्न हो गया है। नवाबी रोड, कालाढूंगी रोड, नैनीताल, बरेली, रामपुर रोड समेत शहर जलमग्न रहा। काठगोदाम से रामपुर रोड तक बरसाती नहर के उफान में रहने से आसपास के सैकड़ों घरों में पानी घुस गया। लोग दिनभर अपने घरों का पानी बाहर निकालते रहे। बरसात के कारण अधिकांश स्कूल और कालेज बंद रहे। सरकारी कार्यालयों में भी उपस्थिति नहीं के बराबर थी। सड़कों में पानी का बहाव ही दिखाई दे रहा था। दुकानें भी बंद थी। कुमाऊं भर में बिजली और पानी की आपूर्ति भी ठप हो गई है। नैनीताल में बारिस ने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिये है। पिछले 72 घंटें में नैनीताल में रिकार्ड 225.86 मिमी वष्रा रिकार्ड की गई है। जबकि अब तक 3782.53 मिमी वर्षा हो गई है। यह पिछले दस साल में सर्वाधिक रिकार्ड है। नैनीझील का जल स्तर खतरे के निशान के ऊपर आ गया है। इससे पूरा पानी माल रोड में आ गया है। कालाढूंगी में भाखड़ा पुल के पास से पानी का बहाव कालाढूंगी नगर की ओर हो गया है। इससे करीब पांच घंटे सड़क पर आवागमन बाधित रहा। नैनीताल- कालाढूंगी मार्ग पर घटगड़-मंगोली के बीच जगह-जगह मलबा आने से यातायात बाधित है। लोनिवि ने डोजर द्वारा लगातार मलबा हटाने से बाद आवागमन सुचारू हो सका।
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