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Monday, March 28, 2011

भावों की संपदा बढ़ाने से मिटते हैं मनोरोग

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उत्तराखंड मुक्त विवि के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने कहा कि पश्चिम का दर्शन समाज व दुनिया को बाजार मानता है जबकि भारतीय संस्कृति परिवार। पश्चिमी अभाव को जन्म देता है और भारत भावों की संपदा को विकसित करता है। जो मनोरोगों से मुक्ति दिलाता है।
रविवार को देव संस्कृति विवि के भारतीय मनोचिकित्सा की विधियां की अवधारणा व प्रयोग विषयक सेमिनार के समापन अवसर पर प्रो. विनय कुमार पाठक ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि देव संस्कृति विवि की ओर से आयोजित यह सेमिनार मनोरोगों की समस्या से छुटकारा दिलाने को मजबूत आधार तैयार करेगा। प्रो. पाठक ने कहा कि पश्चिम उपभोग सिखाता है और भारत उपयोग पर बल देता है। उन्होंने कहा कि भारतीय मनोविज्ञान चिकित्सा में ही मनोरोगों का समूल उपचार है। जिसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास की जरुरत है। सेमिनार में देव संस्कृति विवि के कुलपति डा. एसपी मिश्र ने कहा कि परिष्कृत चेतना ऐसी मानसिकता को जन्म देती है, जो अपने साथ सुख-समृद्ध एवं लेकर आती है। उन्होंने कहा कि मनोरोगों के निदान के लिए हमें चेतना के परिष्कार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। माखन लाल चतुर्वेदी विवि भोपाल के कुलपति प्रो. वीके कुठियाल ने कहा कि धर्मनगरी में भारतीय जीवन-दर्शन को संरक्षित करने के सराहनीय प्रयास हो रहे हैं और इसी दर्शन में मनोरोगों का निदान शामिल है। देव संस्कृति विवि की यह पहल निश्चित तौर पर अनुकरणीय है। जिनको आत्मसात करने पर परिणाम स्वयं ही मिलेंगे। चीन के जियांस्की विवि के प्रो. यू. जिंग ने कहा कि भारतीय जीवन-दर्शन अपने आप अनूठा व वैभवशाली है। इसको आत्मसात करने मात्र से ही मनोरोगों का समाधान संभव है। समापन अवसर पर मनोविज्ञान विषय के शोधार्थियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इस मौके पर देव संस्कृति विवि के डा. चिन्मय पंड्या, कालीचरण, वीरेश्वर उपाध्याय, डा. हिमाद्री साव के अलावा प्रो. सीपी खाखर, प्रो. ईश्वर भारद्वाज, प्रो. सुनिंदर तुंग, प्रो. यामा खोखर आदि ने भी विचार रखे।
 in.jagran.yahoo.com se sabhar

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